भगवान श्री कृष्ण का परम निवास स्थान: गोलोक वृंदावण (Goloka Vrindavan) सनातन शास्त्र, श्रीमद्भागवत पुराण और ब्रह्म संहिता के अनुसार, भगवान श्री कृष्ण का शाश्वत, परम और सर्वोच्च निवास स्थान गोलोक वृंदावन (Goloka) है। यह दिव्य धाम भौतिक संसार (ब्रह्मांड) और बैकुंठ लोक (Vaikuntha) से भी ऊपर आध्यात्मिक आकाश में स्थित 'नित्य धाम' है। गोलोक वृंदावन में भगवान श्री कृष्ण अपनी आद्या शक्ति श्री राधा रानी, गोपियों, ग्वाल-बालों और कामधेनु गायों के साथ आनंदमयी रासलीला और प्रेम-लीला रचाते हैं। धरती पर स्थित मथुरा-वृंदावन को इसी दिव्य गोलोक धाम का भूलोक रूप (प्रकट स्वरूप) माना जाता है। धरती पर भगवान श्र ... ी कृष्ण की प्रमुख लीलाएं (Shri Krishna Leela in Hindi) द्वापर युग में अधर्म का विनाश और धर्म की स्थापना करने के लिए श्री कृष्ण ने धरती पर अवतार लिया था। उनकी प्रमुख अलौकिक लीलाएं इस प्रकार हैं: बाल-लीलाएं और असुर वध: मथुरा के कारागार में जन्म लेने के बाद श्रीकृष्ण गोकुल पहुंचे। बाल्यावस्था में ही उन्होंने पूतना, तृणावर्त और बकासुर जैसे महाबलशाली असुरों का वध किया। माखन चोरी लीला और यशोदा मां को अपने मुख में संपूर्ण ब्रह्मांड के दर्शन कराना उनकी बाल-लीलाओं का अद्भुत भाग है। गोवर्धन लीला: देवराज इंद्र के अहंकार को भंग करने और ब्रजवासियों की अतिवृष्टि से रक्षा करने के लिए श्री कृष्ण ने अपनी कनिष्ठ उंगली (छोटी उंगली) पर विशाल गोवर्धन पर्वत उठा लिया था। महारास लीला: शरद पूर्णिमा की रात्रि में यमुना तट पर भगवान श्री कृष्ण की मुरली की मधुर तान पर गोपियों संग की गई महारास लीला जीवात्मा और परमात्मा के अलौकिक आध्यात्मिक मिलन का प्रतीक है। कंस वध और द्वारकाधीश बनना: किशोरावस्था में श्री कृष्ण ने अत्याचारी मामा कंस का वध कर अपने माता-पिता (देवकी-वसुदेव) को कारागार से मुक्त कराया। इसके बाद उन्होंने गुजरात के तट पर स्वर्ण नगरी द्वारका का निर्माण कराया और द्वारकाधीश कहलाए। महाभारत और भगवद गीता का उपदेश: महाभारत के युद्ध में श्री कृष्ण अर्जुन के सारथी बने। कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि में उन्होंने अर्जुन को मोह से उबारने के लिए जो अमूल्य ज्ञान दिया, वही आज श्रीमद्भगवद्गीता (Bhagavad Gita) के नाम से विश्व प्रसिद्ध है। श्री कृष्ण की ये लीलाएं मनुष्य को सत्य, निष्काम कर्म, प्रेम और भक्ति का मार्ग दिखाती हैं। Read more
मत्स्य अवतार वास्तव में भगवान विष्णु का प्रथम अवतार (Dashavatara) है। सनातन धर्म की कथाओं में श्री कृष्ण को भगवान विष्णु का ही पूर्ण रूप (पूर्ण अवतार) माना गया है, इसलिए भक्त इसे श्री कृष्ण का ही एक लीला-रूप भी मानते हैं। भगवान विष्णु के प्रथम मत्स्य अवतार की पौराणिक कथा (Matsya Avatar Story in Hindi) हिंदू धर्मग्रंथों और श्रीमद्भागवत पुराण (Srimad Bhagavatam) के अनुसार, सत्ययुग में जब ब्रह्मांड का एक कल्प समाप्त हो ... रहा था, तब सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा विश्राम कर रहे थे। उसी समय हयग्रीव (Hayagriva) नामक दैत्य ने ब्रह्मा जी के मुख से निकले चारों वेदों (Rigveda, Yajurveda, Samaveda, Atharvaveda) को चुरा लिया और समुद्र की गहराइयों में छुपा दिया। वेदों के चोरी होने से धर्म, ज्ञान और सृष्टि का संतुलन बिगड़ने लगा। राजा सत्यव्रत (मनु) और छोटी मछली की भेंट उसी काल में द्रविड़ देश के परम धार्मिक राजा सत्यव्रत (जो बाद में वैवस्वत मनु कहलाए) नदी के तट पर तर्पण कर रहे थे। जल अर्पण करते समय उनकी अंजलि (हाथों) में एक अत्यंत छोटी मछली आ गई। जब राजा सत्यव्रत ने उस मछली को वापस जल में छोड़ना चाहा, तो मछली ने कहा, "हे राजन! मुझे इस जल के बड़े जीवों से बचा लीजिए, वे मुझे खा जाएंगे।" राजा को दया आ गई और उन्होंने मछली को अपने कमंडल में रख लिया। मछली का चमत्कारी रूप से बढ़ना अगली ही सुबह वह मछली इतनी बड़ी हो गई कि कमंडल छोटा पड़ गया। राजा ने उसे एक बड़े मटके में रखा, फिर तालाब में, और अंततः नदी में डाला; लेकिन कुछ ही समय में मछली इतनी विशाल हो गई कि उसे केवल महासागर (Samudra) में ही रखा जा सकता था। राजा सत्यव्रत समझ गए कि यह कोई साधारण जीव नहीं है। उन्होंने हाथ जोड़कर प्रार्थना की, जिसके बाद भगवान श्री हरि विष्णु ने अपने मत्स्य अवतार रूप को प्रकट किया। महाप्रलय (Jal Pralay) की भविष्यवाणी भगवान मत्स्य ने राजा सत्यव्रत को चेतावनी दी कि आज से ठीक सातवें दिन एक भयंकर महाप्रलय (Global Flood) आने वाला है, जिसमें संपूर्ण पृथ्वी जलमग्न हो जाएगी। भगवान ने राजा को निर्देश दिए: एक विशाल नौका (नाव) का निर्माण करें। उसमें सभी प्रकार के पौधों के बीज, सभी पशु-पक्षियों के जोड़े और अनाज रखें। सप्तऋषियों (Saptarishis) को उस नौका में विराजमान करें। प्रलय और वेदों की पुनस्र्थापना सातवें दिन मूसलाधार बारिश और भयंकर प्रलय के कारण चारों ओर जल ही जल हो गया। राजा सत्यव्रत, सप्तऋषि और सभी बीज उस नौका पर सवार हो गए। तभी महासागर में एक विशाल सींग वाली सुनहरी मछली (मत्स्य भगवान) प्रकट हुई। राजा सत्यव्रत ने भगवान के निर्देशानुसार नागराज वासुकि (Vasuki) को रस्सी बनाकर नौका को मत्स्य रूपी भगवान के सींग से बांध दिया। भगवान मत्स्य उस नौका को प्रलय की भयंकर लहरों के बीच सुरक्षित रूप से हिमालय की चोटियों (उत्तर पर्वतों) तक ले गए। इसी दौरान, भगवान विष्णु ने समुद्र की गहराइयों में जाकर असुर हयग्रीव का वध किया और चारों वेदों को पुनः प्राप्त कर ब्रह्मा जी को सौंप दिया। सृष्टि की नई शुरुआत प्रलय शांत होने के बाद, राजा सत्यव्रत वैवस्वत मनु (First Man) बने और उन्होंने ही नई मानव सभ्यता और सृष्टि का पुनर्निरूपण किया। Matsya Avatar Story in Hindi, Bhagwan Vishnu Dashavatara, Lord Vishnu First Avatar, Matsya Avatar and Raja Manu, Jal Pralay Katha, Hayagriva Demon, Vedas Protection, Shri Krishna Incarnation, Hindu Mythology Stories. Read more - Shri Krishna
भगवान विष्णु के पाँचवें तथा त्रेतायुग के प्रथम अवतार वामन अवतार (Vamana Avatar) की कथा हिंदू धर्मग्रंथों और श्रीमद्भागवत पुराण (Srimad Bhagavatam) की प्रमुख पौराणिक कथाओं में से एक है। भगवान विष्णु के वामन अवतार की पौराणिक कथा (Vamana Avatar Story in Hindi) दैत्यराज बलि (महर्षि प्रह्लाद के पौत्र) ने अपनी कठोर तपस्या और पराक्रम से तीनों लोकों—पृथ्वी, स्वर्ग और पाताल—पर अपना अधिकार कर लिया था। राजा बलि अत्यंत दानवीर ... और धर्मात्मा राजा था, किंतु असुरों के प्रभुत्व के कारण देवताओं के राजा इंद्र और अन्य देवगण स्वर्गलोक से बेदखल हो गए। देवताओं की माता अदिति ने अपने पुत्रों के कष्ट दूर करने के लिए भगवान श्री हरि विष्णु की कठिन तपस्या की। माता अदिति की भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उनके गर्भ से वामन (बौने ब्राह्मण) के रूप में अवतार लिया। राजा बलि का अश्वमेध यज्ञ और वामन देव का आगमन राजा बलि अपनी सत्ता को स्थायी बनाने के लिए नर्मदा नदी के तट पर अत्यंत भव्य सौवें अश्वमेध यज्ञ (Ashwamedha Yajna) का आयोजन कर रहे थे। उसी समय भगवान वामन हाथ में छत्र, दंड और कमंडल लिए बाल ब्राह्मण के रूप में यज्ञशाला में पधारे। वामन देव के अलौकिक तेज को देखकर राजा बलि अत्यंत प्रभावित हुए और उनका आदर-सत्कार किया। बलि ने कहा, "हे श्रेष्ठ ब्राह्मण! आप मेरी यज्ञशाला में आए हैं, आप जो भी चाहें मांग लीजिए—धन, स्वर्ण, राज्य या भूमि।" तीन पग भूमि का संकल्प भगवान वामन ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया, "हे राजन! मुझे केवल अपने पैरों से नापी गई तीन पग (कदम) भूमि चाहिए।" दैत्यगुरु शुक्राचार्य अपनी योगविद्या से पहचान गए कि यह साधारण बालक नहीं, बल्कि स्वयं भगवान विष्णु हैं। उन्होंने राजा बलि को संकल्प लेने से रोका, लेकिन राजा बलि ने अपने दिए वचन से पीछे हटने से इनकार कर दिया और तीन पग भूमि दान करने का संकल्प ले लिया। विराट 'त्रिविक्रम' रूप और तीन पग भूमि (Trivikrama Form) संकल्प पूरा होते ही भगवान वामन ने अपना आकार बढ़ाना शुरू किया और भगवान विष्णु का अत्यंत विशाल 'त्रिविक्रम' रूप धारण कर लिया: पहला पग: भगवान ने एक ही कदम में संपूर्ण पृथ्वी लोक को नाप लिया। दूसरा पग: दूसरे कदम में भगवान ने देवलोक और समस्त ब्रह्मांड को नाप लिया। अब तीसरा पग रखने के लिए पूरी सृष्टि में कोई स्थान शेष नहीं बचा। भगवान वामन ने राजा बलि से पूछा, "हे राजन! दो पग में सब कुछ समा गया, अब बताइए मैं अपना तीसरा पग कहाँ रखूँ?" राजा बलि का समर्पण और पाताल लोक का राज्य राजा बलि ने बिना किसी संकोच के अपना सिर झुका दिया और नम्रता से कहा, "हे प्रभु! मेरा वचन झूठा नहीं हो सकता। आप अपना तीसरा पग मेरे मस्तक पर रख दीजिए।" बलि की इस अद्वितीय भक्ति, वचनबद्धता और अहंकार-रहित समर्पण से भगवान विष्णु अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने अपना तीसरा पग राजा बलि के सिर पर रखा, जिससे राजा बलि पाताल लोक (Sutala) में चले गए। भगवान ने बलि की दानशीलता से प्रसन्न होकर उन्हें पाताल लोक का स्वामी बना दिया और अमर होने का वरदान दिया। साथ ही, देवताओं को उनका स्वर्गलोक पुनः प्राप्त हो गया। Vamana Avatar Story in Hindi, Bhagwan Vishnu Vamana Incarnation, Raja Bali and Vamana Dev, Three Steps Land Story, Ashwamedha Yajna Raja Bali, Lord Vishnu Fifth Avatar, Trivikrama Roop, Hindu Mythology Stories, Shukracharya and Raja Bali. Read more - Shri Krishna
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