जब असुरों ने देवताओं पर विजय प्राप्त कर ली तो उस समय दुर्वासा ऋषि के शाप से तीनों लोक और स्वयं इन्द्र भी श्रीहीन हो गए। इस पर समस्त देवता सुमेरु पर्वत के शिखर पर ब्रह्माजी के पास गए। ब्रह्माजी ने देखा कि सब देवता श्रीहीन हो गए हैं और असुर फल-फूल रहे हैं। ब्रह्माजी सब देवताओं को लेकर अविनाशी प्रभु की शरण में गए। वेदवाणी से भगवान की स्तुति की । ब्रह्माजी भगवान श्रीहरि से बोले- सर्वशक्तिमान प्रभु आप अपनी योगमाया तथा उसके गुणों को अपने वश में करके सब प्राणियों के हृदय में समभाव से रहते हो। हम आपके श्री चरणों में नमस्कार करते हैं। भगवान को समर्पित किया हुआ छोटे से छोटा कर्म भाव कभी भी विफल नहीं जाता। वे इस प्रकार स्तुति कर ही रहे थे कि भगवान उनके समक्ष प्रकट हो गए परन्तु उनके दर्शन केवल ब्रह्माजी और शिव शंकर को ही हो सके । भगवन जैसे मनुष्य युक्ति के द्वारा लकड़ी से अग्नि, गौ से दूध, पृथ्वी से अन्न और जल तथा व्यापार द्वारा अपनी आजीविका प्राप्त कर लेता है उसी प्रकार विवेकी पुरुष भी अपनी शुद्ध सात्विक बुद्धि से भक्ति योग, ज्ञान योग आदि के द्वारा आपको प्राप्त कर लेता है। हम आपके आविर्भाव से परम सुखी और शान्त हो गए हैं । भगवान मेघ के समान गम्भीर वाणी में बोले ब्रह्माजी, शंकर जी और देवताओं! तुम लोग मेरी सलाह मानो। इस समय असुरों पर काल की कृपा दृष्टि है। जब तक अच्छा समय नहीं आता है तब तक दैत्यों और • दानवों से संधि कर लो। अब बिना देरी किए अमृत निकालने का प्रयत्न करो। उसे पीकर मरने वाला प्राणी भी अमर हो जाता है। पहले क्षीर सागर में सब तरह की घास पतवार और औषधियाँ डाल दो। फिर तुम लोग मन्दराचल पर्वत को मथानी बनाकर और वासुकि नाग को नेती बनाकर मेरी सहायता से समुद्र का मन्थन करो । सब देवता भगवान श्रीहरि की सलाह पर सहमत हो गए । सब देवता समय ठीक आने पर राजा बलि के पास गए। इन्द्र ने अमृत मन्थन की बात कही। तब असुरों को यह बात जंच गई। उन्होंने अपनी शक्ति से मन्दराचल पर्वत को उखाड़ लिया तथा अपनी पूरी शक्ति लगाकर मन्दराचल को समुद्र तक ले जाने में असुर असमर्थ रहे । उनका उत्साह भंग होते देख भगवान श्रीहरि ने खेल ही खेल में एक हाथ से पर्वत को गरुड़ पर रख दिया और स्वयं भी उस पर सवार हो गए। गरुड़ ने पर्वत को समुद्र के तट पर उतार दिया। उसके बाद देवताओं और असुरों ने नागराज वासुकि की नेती बनाने के लिए नागराज वासुकि को वचन दिया कि अमृत में आपका भी भाग होगा। फिर सब ने वासुकि नाग की नेती मन्दराचल पर लपेटकर अमृत के लिए समुद्र का मन्थन प्रारम्भ किया । वासुकि नाग के मुँह की तरफ असुर और उसकी पूँछ की तरफ देवता लग गए। जब मन्दराचल पर्वत पानी में डूबने लगा तो भगवान श्रीहरि ने कच्छप का रूप धारण करके समुद्र में घुसकर पर्वत को ऊपर उठाए रखा। भगवान के असुरों और देवताओं दोनों में प्रवेश करके उनकी शक्ति को बनाए रखा। उसी प्रकार वासुकि नाग में निद्रा के रूप में प्रवेश किया जिससे समुद्र मन्थन में रुकावट उत्पन्न न हो । जब अमृत न निकला तब स्वयं भगवान समुद्र मन्थन करने लगे। भगवान ने मन्थन करने पर सर्वप्रथम वि प्रकट हुआ। विष सब तरफ उड़ने और फैलने लगा । तब वे सब भगवान शंकर के पास गए। सब ने अपनी शक्तियों के अनुसार शंकर जी का गुणगान किया। भगवान शंकर ने प्रजा के संकट को भांपकर कहाहै देवी! समुद्र मन्थन से निकले हुए काल कूट विष के कारण प्रजा पर भीषण दुःख आ पड़ा है। मेरा यह कर्त्तव्य है कि मैं उन्हें निर्भय करूँ। भगवान शंकर उस तीक्ष्ण हलाहल विष को अपनी अँजलि में लेकर पी गए । जहर पीने से उनका कण्ठ नीला पड़ गया । जिस समय भगवान शिव अंजली में भरकर विषपान कर रहे थे तब थोड़ा सा विष टपक कर पृथ्वी पर गिर पड़ा। जिसे सर्प आदि विषैले जीवों और विषैली औषधियों ने ग्रहण कर लिया और फिर नए उत्साह से समुद्र मन्थन होने लगा। अब कामधेनु गाय प्रकट हुई। उसे ब्रह्मवादी ब्राह्मणों ने ग्रहण कर लिया। इसके बाद उच्चैश्रवा नामक घोड़ा निकला । वह चन्द्रमा के समान सफेद वर्ण का था । उसे बलि ने लेने की इच्छा प्रकट की तो इन्द्र ने स्वीकृति प्रदान कर दी । भगवान ने पहले से ही सिखा दिया था। इसके बाद ऐरावत हाथी निकला। उसके चार दाँत थे, जिसे इन्द्र ने अपने पास रख लिया। इसके बाद कौस्तुभ नामक रागमणि निकली। उसे भगवान अजित ने ले लिया। इसके बाद स्वर्गलोक की शोभा बढ़ाने वाला कल्पवृक्ष निकला। इसके बाद समुद्र मन्थन में अप्सराएँ निकलीं जो अपनी मनमोहक चाल से देवताओं को सुख पहुँचाने लगीं। इसके बाद भगवती लक्ष्मी प्रकट हुईं । वह भगवान की नित्य शक्ति हैं। देवता, असुर, मनुष्य सभी ने चाहा कि लक्ष्मी हमें मिले। इस पर भगवती लक्ष्मी देवी हाथ में कमल लेकर सिंहासन पर विराजमान हो गईं। लक्ष्मी जी ने विचार किया कि मेरे तो एकमात्र स्वामी भगवान ही हैं। अतः लक्ष्मी जी ने कमलों की सुन्दर माला को भगवान श्रीहरि के गले में पहना दी। भगवान श्रीहरि ने लक्ष्मी जी को अपने वक्षस्थल पर ही सर्वदा निवास करने का स्थान दिया । इसके बाद समुद्र मन्थन में कन्या के रूप में वारुणी देवी प्रकट हुई। भगवान की अनुमति से उसे दैत्यों ने ले लिया। इसके बाद एक अलौकिक पुरुष प्रकट हुआ। इसका रंग साँवला था। उसके हाथों में कँगन और अमृत से भरा कलश था । वे साक्षात् भगवान विष्णु के अवतार थे। वे आयुर्वेद के प्रवर्तक और यज्ञभोक्ता धन्वन्तरि के नाम से प्रसिद्ध हुए। जब दैत्यों ने अमृत कलश को देखा तो शीघ्रता से उन्होंने कलश को छीन लिया । इस देवता भगवान की शरण में गए। भगवान ने उनसे कहा कि मैं अपनी माया से तुम्हारा काम बना देता हूँ। भगवान ने अत्यन्त अनोखी सुन्दर स्त्री का रूप धारण किया। मोहिनी रूपधारी भगवान दैत्यों के चित्त को कामोद्दीपन करने लगे तथा उनकी बुद्धि भ्रष्ट कर दी। और इस तरह दैत्य डाकुओं की तरह कलश की छीना-झपटी करने लगे। उन्होंने देखा कि एक मन मोहिनी स्त्री आ रही है।
उन्होंने काम से पीड़ित होकर उस मन मोहिनी स्त्री से पूछा- तुम कौन हो और किसकी पुत्री हो ? हे सुन्दरी ! तुम हमारा झगड़ा निपटा दो। इस पर माया से स्त्री वेष धारण करने वाले भगवान ने तिरछी चितवन से उनकी ओर देखते हुए कहा- आप सब तो कश्यप जी के पुत्र हो और मैं कुलटा स्त्री ठहरी । दानवों ने रहस्यपूर्ण भाव से हँसकर अमृत का कलश मोहिनी के हाथों में थमा दिया। मोहिनी रूप भगवान ने दैत्यों को एक कतार में और देवताओं को दूसरी कतार में बैठाया। भगवान ने अपनी माया से देवताओं को अमृत पिला दिया। जब अमृत पिलाया जा रहा था तो राहु दैत्य देवता का वेष धारण कर दैत्यों वाली कतार में जा बैठा । इस पर अमृत पिलाते-पिलाते ही भगवान ने अपने चक्र से उसका सिर धड़ से अलग कर दिया । परन्तु अमृत पी जाने के कारण उसका सिर अमर हो गया । तब ब्रह्माजी ने उसे ग्रह बना दिया। श्री भगवान ने मोहिनी रूप त्याग कर अपना वास्तविक रूप धारण कर लिया और दैत्यों को अमृत न मिलने पर अपार दुख हुआ।