नारद जी कौन थे नारद जी किसके पुत्र थे नारद जी किसका भजन करते है

एक बार की बात है कि जब श्री वेदव्यास जी वेदों का विभाजन कर रहे थे तो श्री नारद जी वहाँ पधारें। नारद जी को आया देख उनके • स्वागत के लिए श्री वेद व्यास जी उठकर खड़े हो गए। उन्होंने देवताओं द्वारा सम्मानित देवर्षि नारद जी की पूजा अर्चना की। व्यास जी बोले- नारद जी आप ब्रह्मा जी के मानस पुत्र हो और आपको ज्ञान भी अगाध है। आप अपने पूर्व जीवन के सम्बन्ध में बतलाइए । इस प्रकार व्यास जी और नारद जी ज्ञान शास्त्र और अन्य शास्त्रों के विषय में आपस में वार्तालाप करने लगे । नारद जी ने व्यास जी को बताया मैं अपनी अकेली दासी माता के साथ रहता था । समय मिलने पर मैं इधर-उधर खेलता फिरता रहता था तथा ऋषियों के आश्रम में भी चला जाता था । आश्रम में मैं उनके उपदेश सुना करता था और उनका झूठा भोजन खाकर पेट भर लिया करता था । ऋषियों की संगत में रहने के कारण मेरा हृदय भी ज्ञान से प्रकाशित हो गया। कुछ समय बाद मेरी दासी माँ को सर्प ने डस लिया। इससे उनकी मृत्यु हो गई। मैं अकेला ही घूमा करता था। एक दिन सतसंग में मुझे ज्ञान प्राप्त हुआ। मैं तपस्या हेतु उत्तर दिशा में चला गया और एक पीपल के वृक्ष के नीचे बैठकर धीरे- धीरे मै भगवान नारायण के ध्यान में मग्न हो गया। कुछ समय पश्चात् मुझे भगवान के दर्शन हुए। श्री भगवान ने मुझे बताया कि मन की शान्ति और मोक्ष प्राप्त करना बहुत कठिन है। लेकिन मै तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न हूँ और तुम्हें भक्ति और ज्ञान मार्ग द्वारा मोक्ष प्राप्ति का साधन बताता हूँ तब मैंने श्री भगवान के द्वारा बताई क्रियाओं को अपने जीवन में धारण कर लिया । समय आने पर मेरी मृत्यु हो गई । भगवान की कृपा से मुझे सद्गति प्राप्त हुई । नारद जी ने व्यास जी को बताया कि एक बार जब भगवान क्षीर सागर में शयन कर रहे थे तब भगवान की नाभि से प्रकट हुए कमल से उस कमल पर बैठे ब्रह्माजी ने कमल डण्डी का अन्त प्राप्त करने के लिए कमल की डण्डी में प्रवेश किया लेकिन ब्रह्मा जी को उस डण्डी का अंत प्राप्त नही हुआ , जिस समय ब्रह्मा जी कमल डण्डी का अंत खोज रहे थे तब मैं अपने भाग्य वश ब्रह्मा जी के श्वास द्वारा उनके हृदय में प्रवेश कर गया । डण्डी का अंत न मिलने के कारण ब्रह्मा जी निराश होकर वापिस लौटकर उस कमल पर खड़े होकर चारों और देखने लगे तब उन्होंने दोबारा भगवान का स्मरण किया तब उनको यह शब्द सुनाई दिया ” तप करो ” तब ब्रह्मा जी उस कमल पर योग निद्रा में बैठ गए फिर एक हज़ार चतुर्युगी बीत जाने पर ब्रह्माजी की योगनिद्रा से आंखे खुली और उनको दोबारा सृष्टि की रचना करने की इच्छा प्रकट हुई। तब ब्रह्माजी ने अपनी इन्द्रियों से मरीचि आदि ऋषियों के साथ मुझे भी प्रकट किया । तब से मैं तीनों लोकों में बाहर-भीतर बिना किसी रोक-टोक के विचरण करता रहता हुँ।

वासुदेव देवकी विवाह , कंस द्वारा देवकी की हत्या का प्रयास, वासुदेव का कंस को वचन देना

एक बार शूरसेन के पुत्र वसुदेव देवकी को ब्याह कर अपनी नवपरिणीता पत्नी के साथ रथ पर चढ़कर अपने घर जा रहे थे । देवकी के पिता, देवक, ने प्रचुर दहेज दिया था, क्योंकि वह अपनी पुत्री को अत्यधिक चाहता था। उसने सैकड़ों रथ दिये थे, जो पूर्णतया स्वर्णमण्डित थे। उस समय उग्रसेन का पुत्र कंस अपनी चचेरी बहन देवकी को प्रसन्न करने के लिए वसुदेव के रथ के घोड़ों की रास स्वेच्छा से अपने हाथ में लेकर हाँकने लगा था। वैदिक सभ्यता की प्रथानुसार जब कन्या का ब्याह होता है, तो उसका भाई अपनी बहन तथा अपने बहनोई को उनके घर ले जाता है। नवविवाहिता कन्या को अपने पिता के परिवार का विछोह न खले, इसलिए भाई उसके साथ तब तक जाता है जब तक वह अपनी ससुराल न पहुँच जाये। देवक ने जो पूरा दहेज दिया था वह इस प्रकार था: स्वर्णहारों से मण्डित ४०० हाथी, १५,००० सुसज्जित घोड़े तथा १,८०० रथ। उसने अपनी पुत्री के साथ जाने के लिए २०० सुन्दर बालिकाएँ भी भेजने की व्यवस्था की थी। क्षत्रियों की विवाह-प्रणाली, जो भारत में अब भी प्रचलित है, बताती है कि जब क्षत्रिय का विवाह हो, तो दुलहिन के अतिरिक्त उस की कुछ दर्जन तरुण सहेलियाँ भी राजा के घर जाँये। रानी की अनुचरियाँ दासी कहलाती हैं, किन्तु वास्तव में वे रानी की सहेलियों की तरह कार्य करती हैं। यह प्रथा अनादि काल से प्रचलित है और कम से कम ५००० वर्ष पूर्व भगवान् कृष्ण के अवतार के भी पहले से खोजी जा सकती है। इस प्रकार वसुदेव अपनी पत्नी देवकी के साथ दो सौ सुन्दर कन्याएँ श्री लेते आये । जब दूल्हा तथा दुलहन रथ में जा रहे थे, तो इस शुभ मुहूर्त की जानकारी देने के लिए अनेक प्रकार के बाजे बज रहे थे। शंख, बिगुल, ढोल तथा मृदंग एकसाथ मिलकर मधुर संगीत (समूह वादन) की ध्वनि उत्पन्न कर रहे थे। जुलूस अत्यन्त मनोहर ढंग से निकल रहा था और कंस रथ को हाँक रहा था। तभी आकाश से अचानक एक आश्चर्यजनक ध्वनि गूँजी जिसने विशेष रूप से कंस को उद्बोधित किया, “हे कंस! तुम कितने मूर्ख हो! तुम अपनी बहन तथा बहनोई का रथ हाँक रहे हो किन्तु तुम यह नही जानते कि तुम्हारी इसी बहन की आठवीं सन्तान तुम्हारा वध करेगी । आकाशवाणी के सुनते ही कंस ने देवकी के केश पकड़ लिए ओर उसे अपनी तलवार से मारना चाहा किन्तु वासुदेव ने कंस को रोक दिया और समझाते हुए कहा कि यदि यह आकाशवाणी सत्य है तो मै तुम्हे वचन देता हूँ कि मै स्वयं देवकी की आठवीं सन्तान आपको सोंप दूँगा।

कामनाओं की पूर्ति के लिए किन देवताओं की पूजा करें

मनुष्य को अपनी इच्छा पूरी करने के लिए घर मे निम्नलिखित देवताओं की उपासना करनी चाहिए :जिस व्यक्ति को ब्रह्मतेज की आवश्यकता हो उसे बृहस्पति जी की उपासना करनी चाहिए। जिस व्यक्ति को सन्तान की इच्छा हो उसे प्रजापतियों की उपासना करनी चाहिए। जिस व्यक्ति को लक्ष्मी की इच्छा हो उसे कुबेर और वरुण की उपासना करनी चाहिए। जिस व्यक्ति को स्वर्ग की इच्छा हो उसे अदिति के पुत्र देवताओं की उपासना करनी चाहिए। जिस प्राणी को राज्य की अभिलाषा हो उसे विश्वदेवों की उपासना करनी चाहिए। जिस व्यक्ति को सबका स्वामी बनने की इच्छा हो उसे ब्रह्माजी की उपासना करनी चाहिए। जिस प्राणी को विद्या प्राप्त करने की इच्छा हो उसे भगवान शंकर की उपासना करनी चाहिए । पति-पत्नी में प्रेम बनाए रखने के लिए पार्वती जी की उपासना करनी चाहिए । धर्म की उपार्जना के लिए विष्णु भगवान की उपासना. करनी चाहिए। मोक्ष की प्राप्ति के लिए भक्तियोग द्वारा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम की उपासना करनी चाहिए। भोगों की प्राप्ति के लिए चन्द्रमा की और निष्कामता की प्राप्ति के लिए परम पुरुष नारायण की उपासना करनी चाहिए।

श्री कृष्ण गोवर्धन लीला , श्री कृष्ण गिरिराज धरण , श्री कृष्ण ने इंद्र का अहंकार तोड़ा

भगवान श्री कृष्ण ने चौपाल में जाकर नंदरॉय, उपन्द आदि गोपों को स्पष्ट शब्दों में कह दिया, बाबा आज से ब्रज में देवराज इंद्र की पूजा नहीं होगी बल्कि गिरिराज गोवर्धन की पूजा होगी। यदि आप लोगों ने मेरी बात नहीं मानी तो वृन्दावन छोड़कर चला जाऊँगा फिर कभी लौट कर नहीं आऊँगा। श्रीकृष्ण का रूठना तो उनको गवारा था ही नहीं इसलिए सभी एक स्वर में बोले नहीं नहीं कान्हा जैसा तुम बोलोगे वैसा ही करेंगे। किंतु इस बार तो कर लेने दें सारी सामग्री जा चुकी है, गोवर्धन की पूजा अलग सामग्री लेकर कर लेंगे कान्हा ने कहा नहीं नहीं इसी सामग्री से ही गोवर्धन की पूजा करनी है, गिरिराज गोवर्धन मुझे अत्यंत प्रिय है और देवराज इंद्र की पूजा आज और अभी से बंद करनी है। सभी ब्रजवासी सहमत हो गए और सारी भोज्य सामग्री लेकर गोवर्धन की तलहटी में जाकर गिरिराज की पूजा करी। जब देवराज इन्द्र को ज्ञात हुआ कि ब्रजवासियों ने उसकी पूजा बंद कर दी है तो तत्काल संवर्तक बदल को आदेश दिया कि जाओ प्रलयकारी वर्षा करो। उन ब्रजवासियों ने उस कृष्ण के कहने से हमारी पूजा बंद की है अब हम ब्रजवासियों को जीवित नहीं छोड़ेंगे। चारों तरफ़ भीषण वर्षा होने लगी सभी ब्रजवासी दौड़ कर नन्द भवन आए और कहने लगे हे कन्हैया आपके कहने से हमने इन्द्र की पूजा बंद करी थी अब आप ही इन्द्र के कोप से हमें बचाओ।भगवान श्रीकृष्ण ने कहा ब्रजवासियों डरने की कोई बात नहीं है, इन्हीं गिरिराज की पूजा करने से इन्द्र रुष्ट हुआ है अब ये गिरिराज ही आपकी रक्षा करेंगे ऐसा कहकर भगवान श्रीकृष्ण ने वामहस्त की कनिष्ठका अंगुली के नाख़ून के ऊपर गिरिराज गोवर्धन को धारण कर लिया। सभी ब्रजवासी अपने सामान सहित उसके नीचे आ गए। इन्द्र ने वायुदेव को आदेश दिया कि जाओ इस पर्वत को गिरा दो ताकि ब्रजवासियों की दबकर मृत्यु हो जाए और स्वयं भी वज्रपात करने लगा। सात दिन सात रात तक मुसलाधार वर्षा, तेज वायु और वज्रपात लगातार चलता रहा। चारों ओर ब्रजमंडल में सागर बन गया किन्तु गोवर्धन के नीचे पानी नहीं भरा क्योंकि भगवान ने वासुकी सर्प को आदेश दिया था जिससे वासुकी सर्प गोवर्धन के चारों ओर लिपट गया था जिससे पानी नहीं भरा। अब भगवान ने अपना सौंदर्य बढ़ाना शुरू किया। वैसे तो भगवान अद्भुत सुन्दर हैं किन्तु सुंदरता नामक गुण का इतना विस्तार किया कि जो जहां देख रहा था, वहीं देखता रह गया, पलक झपकते नहीं बनी। भगवान का इतना सुंदर स्वरूप कि सभी ब्रजवासी सात दिन सात रात बिना भूख प्यास के केवल भगवान श्री कृष्ण को देखते रहे। किसी को फ़ुरसत ही नहीं हुई कि वहाँ से दृष्टि हटा सकें। तत्पश्चात् भगवान श्री कृष्ण ने अगस्त ऋषि का स्मरण किया कि आइए मैंने पूर्वकाल में आपको जल पिलाने का वचन दिया था अब जल पीने का अवसर आ गया है, व्रजमंडल में सागर तुल्य जल भरा हुआ है इसे पी जाओ अगस्त ऋषि आए और एक ही घूँट में सारा जल पी गये। थोड़ी ही देर में वहाँ पर धूल उड़ने लगी। इंद्र देखकर हैरान रह गया। वासुकी सर्प भी चला गया। भगवान श्री कृष्ण के कहने पर सभी ब्रजवासी गोवर्धन के नीचे से बाहर आ गये और भगवान श्री कृष्ण ने गिरिराज गोवर्धन को यथास्थल विराजमान किए।

श्री कृष्ण भगवान ने गोवर्धन लीला क्यो की

भगवान श्रीकृष्ण की अत्यंत प्रिय नैमित्तिक लीला होती है *श्री गोवर्धन लीला*। गोवर्धन लीला के दो कारण है एक है अतंरंग कारण और दूसरा बह्या कारण। बाह्या करण में भगवान श्री कृष्ण अपने भक्त समुदाय को, पूरे संसार को ये संदेश देना चाहते हैं कि जो वैष्णव हैं, मेरी पूजा करते हैं उसे अन्य अन्य अभक्त देवताओं की पूजा करने की आवश्यकता नहीं है। अंतरंग व गोपनीय कारण :- जैसे भगवान ने अपनी माता यशोदा की सखियों की विरह वेदना दूर करने के लिए माखन चोरी लीला की थी “कैसी विरह-वेदना ? यशोदा मईया की जितनी भी सखियां हैं वह सभी कृष्ण को अपना ही पुत्र मानती है और अपने बेटों से उतना प्रेम नहीं करतीं जितना वो कृष्ण को करती हैं। “ऐसा भागवत के दसवें स्कन्ध के तेरहवें अध्याय में लिखा है”। (यशोदा माता की सखियां भी सैंकड़ों हैं। हमेशा नन्द भवन में उनका जमावड़ा लगा रहता था। एक दिन माता यशोदा ने क्रोध किया और सभी सखियों को कह दिया कि जबतक कोई विशेष काम न हो यहां मत आना। सभी सखियां चली तो गई किन्तु छुप छुप कर कान्हा के विरह में रोने लगी। भगवान उन माताओं की मन: स्थिति जानते थे इसलिए उन्होंने योजना बनाई कि वह उन सबके घर से माखन चोरी करेंगे व पकड़े जाएंगे ताकि वह माताएं उनको देख सकें व वात्सल्य का अभाव भी न रहे) ऐसे ही वृन्दावन में जब भगवान श्री कृष्ण ने कालिया नाग का मर्दन किया था तो वहाँ पर राधा आदि गोपियां भी यमुना के तट पर आयी थी । उस रात्रि में सभी ने यमुना के निकटतम वन, वृन्दावन में ही विश्राम किया जहां रात्रि में कंस के असुरों ने जंगल में आग लगा दी तो सभी ने श्री कृष्ण को आत्मभाव से पुकारा व श्री कृष्ण ने दावानल पान कर लिया (उस आग को पी लिया) श्री कृष्ण की इन दो लीलाओं को राधा आदि गोपियों ने प्रत्यक्ष रूप से देखा था। कालिया नाग पर नृत्य करते हुए और दावानल का पान करते हुए। ये राधा आदि गोपियाँ गोलोक में श्री कृष्ण की ह्लादनीशक्ति और उसके अंश हैं इनके हृदय में नित्यसिद्ध श्री कृष्ण प्रेम है और नित्यसिद्ध कृष्ण प्रेम, श्री कृष्ण का दर्शन करते ही प्रकट हो गया है “जिसको कहते हैं पूर्व राग जागृत होना”। पूर्व राग बहुत तीव्र वेदना होती है। उस तीव्र वेदना के कारण उन सभी गोपियों ने कात्यायनी नामक योगमाया की पूजा की व एक महीना व्रत किया कि श्री कृष्ण हमारे पति बन जाएं। कात्यायनी ने प्रकट होकर उनको वर दिया कि श्री कृष्ण अवश्य तुम्हारे पति बनेंगे मगर विलम्ब से। इस प्रकार कात्यायनी की पूजा करने से भी श्री कृष्ण से मिलना नहीं हो रहा था। श्री कृष्ण की सखियाँ (जो सात से नौ वर्ष तक की आयु की ) (श्री कृष्ण आठ वर्ष के हैं) जो श्री कृष्ण के विरह में निरन्तर रोती रहती थी। श्री कृष्ण तो सर्व अन्तर्यामी है ही तो उन्होंने देखा कि मेरी सखियाँ मेरे विरह में निरन्तर रुदन कर रही हैं और लोकलाज व लोकभय के कारण ये मेरे समीप भी नहीं आ सकतीं, मुझे अपना सामीप्य देना है। अपनी सामीप्य देने के लिए ही भगवान ने गोवर्धन लीला की। यह गोवर्धन लीला का मूल व अन्तरंग कारण है।

श्री राधेकृष्ण प्रेम लीला

एक बार श्री कृष्ण और श्री राधा जी एक वन में खेल रहे थे। भगवान श्री कृष्ण और राधा जी दोनों वहाँ पर अकेले थे। इस बीच श्री कृष्ण जी ने राधा जी को एक बरगद के पेड़ के पीछे ले जाकर उनकी आँखों को अपनी पीतांबर से बांध कर उनको वही पर खड़े रहने को कहा। और वहाँ से थोड़ी दूर पर एक कदम के वृक्ष के नीचे जाकर श्री राधा जी के लिए एक उपहार तैयार करने लगे। कुछ पल ऐसे व्यतीत हुआ और थोड़ा विलम्ब होने लगा तो राधा जी बरगद के वृक्ष के पीछे से आवाज लगायी की वो अब थोड़ी भी देर नहीं खड़ी हो सकती और बोली की मेरी ऑंखें दर्द कर रही है। तो इसपर भगवान श्री कृष्ण थोड़ा सा मुस्कुराये और वहीं कदम के वृक्ष के नीचे से जवाब दिया कि राधे बस कुछ पल के लिए आप प्रतीक्षा कीजिये। उसके बाद राधा जी वहीं आँख बंद करके प्रतीक्षा करती रहती है। और यहाँ श्री कृष्ण जी जल्दी जल्दी अपना काम पूरा करने लगते है और जल्द ही श्री कृष्ण जी काम पूरा करके श्री राधा जी के पास गए और श्री कृष्ण ने अपनी हाथों से श्री राधा जी की आँखों से पीताम्बर हटाया और फिर उनको अपना उपहार दिखाने के लिए श्री राधा जी को कदम के वृक्ष के नीचे ले गए। वहाँ पर पहुंच कर राधा जी वो खूबसूरत उपहार देखकर बहुत प्रसन्न हुई। श्री राधा जी ने जब देखा एक विशाल फूलों से सजा हुआ झूला देखा तो वो एक छोटी बच्ची की भाँति हँसते हुए उस झूले से जा लिपटी। भगवान श्री कृष्ण ने बड़ी लगन से ये उपहार श्री राधे के लिए तैयार किया था। फिर राधा जी उस झूले पर बैठ कर श्री कृष्ण जी से बोलती है कान्हा पीछे से थोड़ा झूले को धक्का लगा दो। फिर श्री कृष्ण प्रसन्न मन से झूले को पीछे से धक्का लगाने लगते है। और श्री कृष्ण जी ने इस प्रकार झूले को यमुना जी के तट पर बनाया था की जितनी बार श्री कृष्ण जी झूले को धक्का लगाते है और राधा जी जब आगे की ओर जाती या पीछे की ओर आती तो राधा जी कोमल चरण यमुना जी निर्मल लहरों को छूते हुए निकल जाती । ऐसे ही कुछ वक्त चलता रहा फिर अचानक से श्री राधा जी की नज़र उस झूले में लगी एक श्वेत फूल पर जा पड़ी और उस पुष्प को देखते ही श्री राधा जी बहुत अधिक प्रसन्न हो कर श्री कृष्ण जी से कहती है की हे कान्हा ये पुष्प तो हमारे व्रज में तो नहीं है तो आप इस पुष्प को कहाँ से लेकर आये ? इस बात भगवान श्री कृष्ण मुस्कुराते हुए बोले की मैं ये त्रेतायुग से लाया था। त्रेतायुग ? ये सुन कर राधा जी को आश्चर्य हुआ और फिर पूछी की त्रेतायुग से कैसे ? फिर श्री कृष्ण जी ने झूला रोक कर और राधा जी के बगल में जाकर बैठ गए। और फिर श्री कृष्ण प्रेम के आंसू अपने आँखों में लिए राधा जी को बताते है की हाँ राधे त्रेतायुग से लाया हूँ, जब मैंने पहली बार तुम्हें देखा था तो तुम पुष्प वाटिका में थी। पहली बार तुम्हें देखते ही राधे मुझे तुम्हें उसी पल एक अपने हाथों से बनाया हुआ पुष्प से निर्मित झूला देने को मन किया। परन्तु उस समय मैं रामावतार में था और मर्यादा पुरुषोत्तम होने की वजह से अपनी वो प्यारी सी इच्छा पूरी न कर सका। लेकिन मैंने आज के इसी खूबसूरत दिन के लिए उस वक्त कुछ श्वेत पुष्प अपने पास संभालकर रख लिए थे। और आज जब समय आया तो मैंने अपनी वर्षों की इच्छा पूरी कर तुम्हें ये प्यारा सा उपहार देना चाहा और मेरी यह इच्छा पूरी भी हुई। यह सुनकर राधा जी की आँखें ख़ुशी के मारे नम हो गयी, और उन्होंने श्री कृष्ण जी के कोमल हाथों चूम लिया। उसके बाद भगवान श्री कृष्ण और श्री राधा जी दोनों एक साथ झूले पर बैठकर झूले का आनंद लेने लगे।

देवासुर संग्राम कहानी , देवताओं और दैत्यों के बीच संग्राम की कहानी

देवासुर संग्राम पहले भी कई बार हुआ एक बार दानवों और दैत्यों को अमृत न मिलने का अपार दुःख हुआ तथा उनका क्रोध बढ़ गया । वे अपने-अपने अस्त्र-शस्त्र लेकर देवताओं से युद्ध करने लगे। देवताओं और दैत्यों में भीषण संग्राम होने लगा, जिसे इतिहास में देवासुर संग्राम कहते हैं। रणभूमि में रथियों के साथ रथी, पैदल के साथ पैदल, घुड़सवारों के साथ घुड़सवार, हाथी वालों के साथ हाथी वाले लड़ने लगे। युद्ध में विरोचन का पुत्र बलि मयदानव के बनाए गए विमान पर सवार होकर लड़ने आया। उसके साथ नमुचि, शम्बर, कालनेमि, प्रहेति, भूतसंताप, शकुनि, कपिल, हयग्रीव, वज्रदण्ड, विरोचन, तारक, पोलो, अरिष्ट, त्रिपुराधिपति, उत्कल, शुभ, कालेय आदि थे। इन्द्र भी बड़े क्रोधित हुए। वह भी ऐरावत हाथी पर सवार होकर देवताओं को साथ लेकर लड़ने लगे । जम्भासुर से महादेव जी, महिसासुर से अग्निदेव, वातापि तथा इल्वय से ब्रह्मा के पुत्र मरीचि आदि का युद्ध होने लगा । दैत्यों ने अपनी आसुरी माया से देवताओं की सेना पर पर्वत पटक कर छोड़ दिया। इससे देवताओं की सेना चकनाचूर होने लगी। देवताओं ने भगवान का स्मरण किया। तब भगवान वहाँ पर प्रकट हुए । कालनेमि दैत्य ने भगवान पर त्रिशूल चलाया। भगवान ने त्रिशूल के टुकड़े-टुकड़े करके कालनेमि को मौत के घाट उतार दिया। माली और सुमाली दैत्यों के सिर भगवान ने अपने चक्र से काट डाले । इन्द्र ने बलि पर अमोघ वज्र से आक्रमण किया। बलि विमान सहित पृथ्वी पर गिरकर समाप्त हो गया। बलि का घनिष्ठ मित्र जम्भासुर ने अपनी गदा से इन्द्र की गले की हंसली पर और महाबलि ऐरावत पर वार किया। इन्द्र मुर्छित हो गए। इन्द्र के सारथी मातलि ने हजार घोड़े का रथ लाकर इन्द्र को दिया । इन्द्र दैत्यों पर प्रहार कर उन्हें मारने लगे। भाईयों को मरा देखकर नमूचि को बड़ा दुःख हुआ । नमूचि किसी हथियार से मारा नहीं जा रहा था । तब आकाशवाणी हुई कि यह दानव न तो सूखी वस्तु से और न गीली वस्तु से मारा जाएगा। इन्द्र ने उपाय सोचा कि समुद्र का फेन न गीला होता है और न सूखा होता है | इंन्द्र ने समुद्री फेन से नमूचि का वध करने में सफलता पाई। ब्रह्माजी ने मुनि श्री नारद जी को देवताओं के पास भेजा। उन्होंने देवताओं को लड़ने से रोक दिया। शेष बचे दैत्य नारद जी के कहने पर वज्र की चोट से मरे हुए बलि को लेकर अस्ताचल चले गए। वहाँ उनके गुरु शुक्राचार्य जी ने संजीवनी विद्या से असुरों को जीवित कर दिया। बलि समझ गया कि जीवन मृत्यु, जय पराजय होती रहती है। इस प्रकार उसको पराजित होने पर खेद नहीं हुआ।

श्री कृष्ण नामकरण , श्री कृष्ण बाल लीला , श्री कृष्ण माखन चोरी लीला

एक दिन यदुवंशियों के कुल पुरोहित श्री गर्गाचार्य नन्दबाबा के घर पधारे। उन्हें देखकर नन्दबाबा ने खड़े होकर उनके चरणों में प्रणाम किया। उन्होंने गर्गाचार्य जी से निवदेन किया कि मेरे इन दोनों बालकों का नामकरण संस्कार गर्गाचार्य जी ने कहा- यह रोहिणी का पुत्र है । इसलिए इसका एक नाम रौहिणेय और दूसरा नाम राम तथा इसका नाम बल भी है। अर्थात् यह बालक बलराम के नाम से प्रसिद्ध होगा और यह दूसरा साँवला सा बालक है इसका नाम श्री कृष्ण होगा। नन्दजी यह तुम्हारा पुत्र पहले कभी वसुदेव जी के घर भी पैदा हुआ था, इसलिए इस रहस्य को जानने वाले लोग इसे श् री वसुदेव भी कहेंगे। यह बालक साक्षात् भगवान नारायण के समान है। इससे प्रेम करने वालों को भीतर या बाहर किसी भी प्रकार के शत्रु नहीं जीत सकते। इतना बताकर श्री गर्गाचार्य जी अपने आश्रम को प्रस्थान कर गए। जब उनके दोनों नन्हें-नन्हें शिशु अपने शरीर पर कीचड़ का अंगराग लगाकर लौटते तब उनकी सुन्दरता में चार चाँद लग जाते । माताएँ उन्हें दोनों हाथों से गोद में लेकर हृदय से लगा लेतीं और दूध पिलाने लगतीं । जब बलराम और कुछ बड़े हुए तो बछड़ों की पूँछ पकड़ने लगे। बछड़े भागते तो उनके साथ भागते-भागते ज़मीन पर गिर जाते और बछड़े उन्हें घसीटते हुए दौड़ने लगते । गोपियाँ घर का काम धन्धा छोड़कर उनकी बाल लीलाओं का आनन्द उठातीं। वे बछड़ों को गायों के पास खोल देते। एक दिन सब गोपियाँ मिलकर यशोदा जी के पास गईं और कृष्ण कन्हैया की शिकायत करने लगीं। उन्होंने कहा- यह दूध-दही चुराकर खा जाता है तथा वानरों को खिला देता। मटकों को फोड़ देता है । इस प्रकार दोनों भाई बलराम और श्री कृष्ण माखन चोरी की लीलाएँ करते और गोपियों को रिझाते रहते थे । एक दिन दोनों भाई ग्वाल बालकों के साथ खेल रहे थे। उन लोगों ने यशोदा जी से कन्हैया की शिकायत की कि इसने मिट्टी खाई है। यशोदा मैया ने डाँटकर कहा- क्यों रे नटखट ! तू बहुत ढीठ हो गया है। तूने मिट्टी क्यों खाई ? इस पर श्री कृष्ण ने मुँह फाड़कर दिखाते हुए कहा- माँ! मैंने मिट्टी नहीं खाई है । ये सब झूठ बोल रहे हैं । यशोदा जी को मुँह में सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड, चन्द्रमा, तारे, पहाड़ आदि दिखाई दिए। तब माता कृष्ण का तत्त्व समझ गईं। भगवान ने उनके हृदय में योगमाया का संचार कर दिया | यशोदा जी वह घटना भूल गईं और अपने दुलारे को गोद में उठा लिया । नन्द और यशोदा को उनका अपार सुख मिलने लगा । नन्द बाबा पूर्व जन्म में एक श्रेष्ठ वसु थे। उनका नाम द्रोण और पत्नी का धरा था। उन्होंने ब्रह्माजी के आदेशों का पालन करने की इच्छा से उनसे कहा – भगवन् ! जब हम पृथ्वी पर जन्म लें, तब जदीश्वर भगवान श्री कृष्ण में हमारी अनन्य भक्ति हो । ब्रह्माजी ने कहाऐसा ही होगा। वे ही परम यशस्वी भगवन्तयं द्रोण ब्रज में पैदा हुए और उनका नाम रखा गया नन्द | उनकी पत्नी धरा इस जन्म में यशोदा के नाम से उनकी पत्नी बनीं। ब्रह्माजी की बात सत्य कहने के लिए भगवान श्री कृष्ण बलराम जी के साथ ब्रज में रहकर समस्त ब्रजवासियों को अपनी बाल लीलाओं से आनन्दित करने लगे।

श्री कृष्ण ने राक्षसी पूतना का वध कैसे किया और पूतना का पूर्व जन्म

पूतना नाम की एक बड़ी क्रूर राक्षसी थी। उसका एक ही काम था, बच्चों को मारना । कंस की आज्ञा से एक दिन वह नन्दबाबा के गोकुल के पास जाकर उसने अपने को एक सुन्दर युवती में परिवर्तित कर लिया और गोकुल में प्रवेश कर गई । वह अनायास ही नन्दबाबा के घर में घुस गई। उस समय श्री कृष्ण शैय्या पर लेटे हुए थे। पूतना को आया देखकर भगवान श्री कृष्ण ने अपनी आँखें बन्द कर लीं। इधर भयानक राक्षसी पूतना ने बालक श्री कृष्ण को अपनी गोद में उठाया और अपना स्तन उनके मुँह में दे दिया। उसने अपने स्तनों पर ज़हर का लेप लगा रखा था। भगवान श्री कृष्ण ने क्रोध में भरकर दोनों हाथों से उसके स्तनों को ज़ोर से दबाकर उसके प्राणों के साथ उसका दूध पीने लगे ( वे स्वयं दूध पी रहे थे और उनका क्रोध उसके प्राण पीने लगा ) । पूतना सटपटाकर पृथ्वी पर गिर पड़ी। उसके नेत्र उलट गए। उसकी चिल्लाहट का वेग इतना तीव्र था कि सातों पाताल और दिशाएँ गूंज उठीं। वह राक्षसी रूप में प्रकट हो गई। उसके शरीर से प्राण निकल गए। मुँह फट गया, बाल बिखर गए और हाथ पैर फैल गए । जिस प्रकार इन्द्र के वज्र से घायल होकर वृत्रासुर गिर पड़ा था, वैसी ही बाहर गोष्ठ में आकर वह गिर पड़ी । पूतना के उस शरीर को देखकर सब ग्वाल और गोपी डर गए । जब गोपियों ने देखा कि बालक श्री कृष्ण उसकी छाती पर खेल रहे हैं तो उन्होंने श्री कृष्ण को उठा लिया। इसके बाद यशोदा और रोहिणी ने गोपियों के साथ मिलकर गाय की पूँछ घुमाने आदि उपायों से श्री कृष्ण नज़र उतारी। यशोदा जी ने स्तनपान कराया और फिर उन्हें पालने में सुला दिया । भगवान ने पूतना का स्तनपान किया था। क्योकि यह पूतना अपने पूर्व जन्म में राजा बली की पुत्री थी और जब इससे पूर्व जन्म में वामन भगवान देवताओं की सहायता हेतु धरती पर अवतरित हुए थे तब एक दिन वामन रूप में भगवान तीन पग भूमि लेने हेतु राजा बलि की यज्ञशाला में आये तब बलि की पुत्री वामन भगवान के सुंदर रूप से मोहित होकर उन्हें अपनी छाती से लगाकर दूध पिलाने की इच्छा अपने हृदय में धारण की । तब वामन रूप में खड़े वामन भगवान ने उनकी इच्छा पूरी करने हेतु ह्रदय से अंदर ही अंदर तथास्तु कह दिया । और जब वामन भगवान ने विराट रूप धरकर दो पग में सारी त्रिलोकी को नाप कर बलि का सारा सम्राज्य छीन लिया तब राजा बलि की पुत्री ने अपने पिता के साथ हुए इस छल को देखकर हृदय में इच्छा प्रकट की कि अगर ऐसा छलिया को तो मै अपनी छाती से दूध की जगह विष पिला दूँ तब भी प्रभु वामन ने अंदर ही अंदर हृदय में राजा बलि की पुत्री के लिए तथास्तु कह दिया और इस तरह द्वापर युग मे भगवान श्री कृष्ण ने पूतना के रूप में आयी राजा बलि की पुत्री की दोनों इच्छाओं को पूर्ण किया और पूतना का उद्धार किया।

श्री कृष्ण भगवान का जन्म कब हुआ श्री कृष्ण भगवान की माता कौन थी श्री कृष्ण जी ने किस कारण अवतार लिया

कंस स्वयं बली था और उसे मगध नरेश जरासंध की सहायता बड़ा प्राप्त थी। इसके अतिरिक्त उसके साथी थेप्रलम्बासुर, बकासुर, चाणूर, तृणावर्त, अधासुर, मुष्टिक, अरिष्टासुर, द्विविद, पूतना, केशी, और धेनुक तथा बाणासुर और भौमासुर आदि बहुत से दैत्य राजा उसके सहायक थे । इनको साथ लेकर वह यदुवंशियों को नष्ट करने लगा। वे लोग भयभीत होकर कुरु, पाँचाल, केकय, शाल्व, विदर्भ, निषध, विदेह और कौशल आदि देशों में जाकर बस गए । जब कंस ने एक-एक करके देवकी के छः बालक मार डाले तब देवकी के गर्भ में भगवान के अंश रूप श्री शेष जी पधारे । विश्वात्मा भगवान ने अपनी योगमाया को आदेश दिया कि देवकी के गर्भ से श्री शेष जी को वसुदेव की दूसरी पत्नी रोहिणी के गर्भ से स्थानान्तरित कर दो। तुम नन्द बाबा की पत्नी यशोदा के गर्भ से पैदा होना, मैं देवकी का पुत्र बनूँगा । पृथ्वी के लोग तुम्हारे लिए बहुत से स्थान बनाएँगे और दुर्गा, भद्रवाली, माधवी, कृष्णा, चण्डिका, कुमुदा, वैष्णवी, विजया, शारदा, ईशानी, नारायणी, माया, कन्या और अम्बिका आदि अनेक नामों से पुकारेंगे। आठवें गर्भ में भगवान ने प्रवेश किया तो सबकी बुद्धि फिर गई। यद्यपि कंस देवकी को मार सकता था, परन्तु स्वयं ही वह इस अत्यन्त क्रूरता के विचार से निवृत्त हो गया। चारों ओर अन्धकार छाया हुआ था । उसी समय सबके हृदय में विराजमान भगवान विष्णु देवकी के गर्भ से प्रकट हुए। वसुदेव जी ने देखा उनके सम्मुख एक अद्भुत बालक है। उसके नेत्र कमल के समान कोमल और विशाल हैं। चार हाथों में शंख, गदा, चक्र और कमल धारण कर रखा है। वक्षस्थल पर श्रीवत्स का चिन्ह अंकित है। गले में कौस्तुभमणि झिलमिला रही है। उनका रूप देखकर सबको बड़ी प्रसन्नता हुई। अपनी बुद्धि को स्थिर करके उन्होंने भगवान के चरणों में अपना सिर झुकाया और हाथ जोड़कर उनकी स्तुति करने लगे । इधर देवकी ने देखा कि मेरे पुत्र में पुरुषोत्तम भगवान के सभी लक्ष्ण उपस्थित हैं। वे भी पवित्रभाव से मुस्कराती हुई स्तुति करने लगीं । भगवान श्री कृष्ण दोनों से बोले- मैंने अपना चतुर्भुजी रूप इसलिए दिखाया है कि तुम्हें मेरे पूर्व अवतारों का स्मरण हो जाए। तुम दोनों मेरे प्रति पुत्र भाव तथा ब्रह्मभाव रखना। इस प्रकार वात्सल्य स्नेह और चिन्तन के द्वारा तुम्हें मेरे परमपद की प्राप्ति होगी । भगवान ने कहा- देवी! स्वायम्भुव मन्वन्तर में जब तुम्हारा जन्म हुआ था तब तुम्हारा नाम पृश्नि और वसुदेव जी का नाम सुतपा प्रजापति था । उस समय मैं पृश्नि गर्भ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। दूसरे जन्म में तुम अदिति और वसुदेव जी कश्यप थे। उस समय मैंने तुम्हारे गर्भ से जन्म लिया था और मेरा नाम उपेन्द्र था तथा मेरा नाम वामन अवतार के रूप में प्रसिद्ध हुआ । अब तीसरी बार आपका पुत्र बनकर प्रकट हुआ हूँ। इतना बताकर भगवान चुप हो गए और शिशु रूप धारण कर लिया । श्रीमद् भागवत महापुराण तब वसुदेव जी ने भगवान की प्रेरणा से अपने पुत्र को लेकर सूतिकागृह से बाहर निकलने की इच्छा प्रकट की। उसी समय नन्द की पत्नी यशोदा के गर्भ से उस योगमाया का जन्म हुआ जो भगवान की शक्ति होने के कारण उनके समान ही जन्म रहित है। वसुदेव जी अपनी योगमाया से श्री कृष्ण को लेकर गोकुल की तरफ चले । घनघोर वर्षा हो रही थी । श्री शेष जी ने छत्रछाया कर रखी थी। यमुना नदी उमड़ रही थी। यमुना जी ने रास्ता दे दिया। वसुदेव जी नन्दबाबा के यहाँ से उस कन्या को ले आए और अपने पुत्र को यशोदा जी के पास सुला दिया। जेल में पहुँचकर वसुदेव जी ने उस कन्या को देवकी के पास सुला दिया और अपने पैरों में बेड़ियाँ धारण कर लीं तथा दरवाज़ों पर ताले लग गए।