प्यारे भक्तों सृष्टि का वर्णन इस प्रकार है। कि विराट भगवान जब ब्रह्माण्ड को छेदकर प्रकट हुए तो रहने के लिए स्थान को तलाशने लगे । तब उन्होंने जल की सृष्टि की। विराट पुरुष के नर से उत्पन्न होने के कारण जल का नाम नार पड़ा। एक हज़ार वर्षों तक नगर में रहने के कारण उनका नाम नारायण पड़ा । नारायण ने योग निद्रा से जागकर अपनी माया से अपने स्वर्णमय वीर्य को तीन भागों में बाँटा, जिनके नाम अधिदेव, अध्यात्म और अधिभूत थे । विराट पुरुष के हिलने-डुलने से उनके शरीर में स्थित आकाश से इन्द्रिय बल, मनोबल और शरीर बल की उत्पत्ति हुई। इन सबका स्वामी प्राण उत्पन्न हुआ। मुख से तालु और तालु से रसनेन्द्रिय प्रकट हुई । बोलने की इच्छा होने पर वाक् इन्द्रिय प्रकट हुई जिसके अधिष्ठाता देवता अग्नि हैं। जिसका विषय बोलना है प्रकट हुई। सूँघने की इच्छा होने पर “नाक” ध्राणेन्द्रिय उत्पन्न हुई। गन्ध को फैलाने हेतु वायुदेव प्रकट हुए । देखने की इच्छा होने पर नेत्रों के छिद्र जिनका अधिष्ठाता सूर्य हैं नेत्रेन्द्रिय प्रकट हुई । इन्हीं से रूप का ग्रहण होने लगा। सुनने की इच्छा होने पर कान प्रकट हुए। उष्णता, शीतलता, कोमलता और भारीपन जानने के लिए शरीर में चर्म प्रकट हुआ। जिसके चारों ओर रोम छिद्र उत्पन्न हुए | त्वचा इन्द्रिय शरीर के चारों ओर लिपट गई। कर्म करने की इच्छा से हाथ उग आए । ग्रहण करने की शक्ति हस्तेन्द्रिय तथा अधिदेवता इन्द्र प्रकट हुए। ग्रहण रूप कर्म भी प्रकट हुआ। आने-जाने की इच्छा होने पर पैर उग आए । चरणों के साथ ही चरण इन्द्रिय के साथ ही उसके अधिष्ठाता के रूप में वहाँ स्वयं यज्ञ पुरुष भगवान विष्णु स्थित हो गए। उन्हीं से चलना रूप कर्म प्रकट हुआ। सन्तान, रति और स्वर्ग की कामना हेतु लिंग का निर्माण हुआ | उपस्योन्द्रिय और प्रजापति आदि हुए। मलत्याग की इच्छा होने पर गुदा द्वार का निर्माण हुआ। पायुन्द्रिय और मित्र देवता प्रकट हुए। अपान द्वारा एक शरीर से दूसरे शरीर में जाने की इच्छा से नाभिद्वार प्रकट हुआ। उसी से अपान और मृत्यु देवता प्रकट हुए। इन दोनों के आश्रय से ही प्राण और अपान का विछोह होने से मृत्यु होती है। माया का विचार करने हेतु हृदय की उत्पत्ति हुई। इसी प्रकार आकाश, जल और वायु इन तीनों से प्राणों की उत्पत्ति हुई। अन्न, जल ग्रहण करने हेतु कोख, आंतों और नाड़ियों का निर्माण हुआ। विराट पुरुष के शरीर में पृथ्वी, जल, तेज से सात धातुएँ ९. त्वचा, २. चर्म, ३, मांस, ४. हड्डियाँ, ५. मज्जा, मेद, ७. रुधिर प्रकट हुई। भक्तों इस प्रकार श्री शुकदेव जी ने इस सृष्टि का वर्णन किया है….Dear devotees, the description of the universe is as follows. That when Virat God appeared after piercing the universe, he started searching for a place to live. Then he created water. Water was named Nar because of Virat Purush being born from a man. He was named Narayan because of his stay in the city for a thousand years. Narayan awoke from yog nidra by his illusion and divided his golden semen into three parts, whose names were Adhidev, Adhyatma and Adhibhuta. Due to the movement of the giant man, the sense force, mental force and physical force originated from the sky located in his body. The master of all these was born Prana. From the mouth came the palate and from the palate the sense organs appeared. When there was a desire to speak, the speech organ appeared whose presiding deity is Agni. The subject of which to speak has appeared. When there was a desire to smell, the “nose” olfactory organ arose. Vayudev appeared to spread the smell. When there was a desire to see, the holes of the eyes, whose presiding deity is the sun, appeared. It was from these that the form began to be eclipsed. Ears appeared when there was a desire to hear. To know the heat, coldness, softness and heaviness, the skin appeared on the body. Around which hair follicles arose. The skin wrapped around the sense body. Hands raised with the desire to act. Hastendriya and the presiding deity Indra appeared. Karma also appeared in the form of eclipse. Legs sprang up when there was a desire to move. Along with the feet, along with the senses of the feet, Lord Vishnu himself, the Yagya Purush, was situated there as its presiding deity. It was through them that the form and form of action appeared. Linga was created for the desire of children, night and heaven. Subsyndriya and Prajapati etc. happened. When there is a desire for excreta, the anus was formed. Payundriya and Mitra appeared. Nabhidwar appeared due to Apana’s desire to move from one body to another. From that the gods Apan and Mrityu appeared. Due to the separation of prana and apana from the shelter of these two, death occurs. The heart originated to think of Maya. Similarly, life originated from these three sky, water and air. Womb, intestines and nerves were formed to receive food and water. Earth, water, seven metals in the body of Virat Purush 9. skin, 2. Skin, 3, Meat, 4. Bones, 5. Marrow, fat, 7. Blood appeared. Devotees, this is how Shri Shukdev ji has described this creation.