भगवान की माया ने स्वयं के काल, कर्म और स्वभाव को स्वीकार किया है। काल के तीन गुणों में क्षोभ पैदा हुआ। स्वभाव ने उन्हें रूपान्तर कर दिया। कर्म ने महत्तत्व को जन्म दिया। रजोगुण तमोगुण की वृद्धि होने पर महत्तत्व का विकार हुआ। इससे क्रिया, ज्ञान और द्रव्य रूपत्त्व, त्तम का प्रधान विकार हुआ। वह अहंकार कहलाया और विकार को प्राप्त होकर तीन प्रकार का हो गया। उनके निम्नलिखित भेद हैं : १. वैकारिक, २. तैजस, ३. तामस उनकी क्रमशः ज्ञानशक्ति, क्रियाशक्ति और द्रव्यशक्ति प्रधान है। जब पंच महाभूतों के कारण तामस रूप में विकास हुआ, तब इससे आकाश की उत्पत्ति हुई । आकाश के तनमात्रा और गुण दो शब्द हैं । इन शब्दों से द्रष्टा और दृश्य का बोध हुआ। जब आकाश में विकार हुआ तो वायु उत्पत्ति हुई । इस वायु का गुण स्पर्श है। वायु की उत्पत्ति काल, कर्म और स्वभाव से हुई है । इससे तेज की उत्पत्ति हुई। इसका प्रधान गुण रूप है। तेज के विकास से जल की उत्पत्ति हुई, इसका गुण रस है । जल के विकार से पृथ्वी की उत्पत्ति हुई । वैकारिक अहंकार से मन और इन्द्रियों के दस अधिष्ठातृ देवताओं की उत्पत्ति हुई, जिनके नाम निम्नलिखित हैं: १. सूर्य, २. वायु, ३. दिशा, ४. अग्नि, ५. अश्विनी कुमार, ६. वरुण, ७. मित्र, ८. विष्णु, ९ प्रजापति, १०. शिव तैजस अहंकार से नेत्र, त्वचा, श्रोत, प्राण और जिह्वा ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं। गुदा, पाद, हस्त, वाक और जनेन्द्रियाँ ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ हैं। तैजस से ज्ञान शक्ति, रूप बुद्धि और क्रियों शक्ति रूप प्राण भी उत्पन्न हुए।