प्रिय भक्तों भागवत का वर्णन इस प्रकार है कि कल्प में सत्यवती के गर्भ से व्यास के रूप में भगवान ने प्रकट होकर भागवत पुराण की रचना की थी । इसी भागवत पुराण में सर्ग, विसर्ग, स्थान, पोषण, अति, मन्वन्तर, इशानु, निरोध, मुक्ति, आश्रय इन दस विषयों का वर्णन है । भगवान की प्रेरणा से आकाश, तन्मात्राएँ, पंचभूत, महत्तत्व और अहंकार की उत्पत्ति का नाम सर्ग कहा गया है। विराट पुरुष से सृष्टियों के निर्माण को विसर्ग कहा गया है। प्रति पल नाश की ओर बढ़ने वाले सृष्टि को मर्यादा में स्थिर रहने से भगवान विष्णु की जो श्रेष्ठता सिद्ध होती है, उसे स्थान कहा गया है। भगवान के द्वारा सुरक्षित सृष्टि में भक्तों के ऊपर उनकी जो कृपा रहती है उसे पोषण कहा गया है । मन्वन्तरों के अधिपति जो भगवद् भक्ति और प्रजापालन रूप शुद्ध धर्म का अनुष्ठान करते हैं उसे मन्वन्तर कहा गया है । जीवों की वे वासनाएँ जो कर्म के द्वारा उन्हें बन्धन में डाल देती हैं उसे ऊति कहा गया है। भगवान के विभिन्न अवतारों के और उनके प्रेमी भक्तों की विविध आख्यानों से युक्त कथाएँ ईश कथा कहलाती हैं। जब भगवान योगनिद्रा स्वीकार करके शयन करते हैं, तब इस जीव का अपना वास्तविक स्वरूप परमात्मा में स्थित होना ही मुक्ति है । इस चराचर जगत की उत्पत्ति और प्रलय जिस तत्त्व से प्रकाशित होते हैं वह परब्रह्म ही आश्रय है ।