कंस स्वयं बली था और उसे मगध नरेश जरासंध की सहायता बड़ा प्राप्त थी। इसके अतिरिक्त उसके साथी थेप्रलम्बासुर, बकासुर, चाणूर, तृणावर्त, अधासुर, मुष्टिक, अरिष्टासुर, द्विविद, पूतना, केशी, और धेनुक तथा बाणासुर और भौमासुर आदि बहुत से दैत्य राजा उसके सहायक थे । इनको साथ लेकर वह यदुवंशियों को नष्ट करने लगा। वे लोग भयभीत होकर कुरु, पाँचाल, केकय, शाल्व, विदर्भ, निषध, विदेह और कौशल आदि देशों में जाकर बस गए । जब कंस ने एक-एक करके देवकी के छः बालक मार डाले तब देवकी के गर्भ में भगवान के अंश रूप श्री शेष जी पधारे । विश्वात्मा भगवान ने अपनी योगमाया को आदेश दिया कि देवकी के गर्भ से श्री शेष जी को वसुदेव की दूसरी पत्नी रोहिणी के गर्भ से स्थानान्तरित कर दो। तुम नन्द बाबा की पत्नी यशोदा के गर्भ से पैदा होना, मैं देवकी का पुत्र बनूँगा । पृथ्वी के लोग तुम्हारे लिए बहुत से स्थान बनाएँगे और दुर्गा, भद्रवाली, माधवी, कृष्णा, चण्डिका, कुमुदा, वैष्णवी, विजया, शारदा, ईशानी, नारायणी, माया, कन्या और अम्बिका आदि अनेक नामों से पुकारेंगे। आठवें गर्भ में भगवान ने प्रवेश किया तो सबकी बुद्धि फिर गई। यद्यपि कंस देवकी को मार सकता था, परन्तु स्वयं ही वह इस अत्यन्त क्रूरता के विचार से निवृत्त हो गया। चारों ओर अन्धकार छाया हुआ था । उसी समय सबके हृदय में विराजमान भगवान विष्णु देवकी के गर्भ से प्रकट हुए। वसुदेव जी ने देखा उनके सम्मुख एक अद्भुत बालक है। उसके नेत्र कमल के समान कोमल और विशाल हैं। चार हाथों में शंख, गदा, चक्र और कमल धारण कर रखा है। वक्षस्थल पर श्रीवत्स का चिन्ह अंकित है। गले में कौस्तुभमणि झिलमिला रही है। उनका रूप देखकर सबको बड़ी प्रसन्नता हुई। अपनी बुद्धि को स्थिर करके उन्होंने भगवान के चरणों में अपना सिर झुकाया और हाथ जोड़कर उनकी स्तुति करने लगे । इधर देवकी ने देखा कि मेरे पुत्र में पुरुषोत्तम भगवान के सभी लक्ष्ण उपस्थित हैं। वे भी पवित्रभाव से मुस्कराती हुई स्तुति करने लगीं । भगवान श्री कृष्ण दोनों से बोले- मैंने अपना चतुर्भुजी रूप इसलिए दिखाया है कि तुम्हें मेरे पूर्व अवतारों का स्मरण हो जाए। तुम दोनों मेरे प्रति पुत्र भाव तथा ब्रह्मभाव रखना। इस प्रकार वात्सल्य स्नेह और चिन्तन के द्वारा तुम्हें मेरे परमपद की प्राप्ति होगी । भगवान ने कहा- देवी! स्वायम्भुव मन्वन्तर में जब तुम्हारा जन्म हुआ था तब तुम्हारा नाम पृश्नि और वसुदेव जी का नाम सुतपा प्रजापति था । उस समय मैं पृश्नि गर्भ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। दूसरे जन्म में तुम अदिति और वसुदेव जी कश्यप थे। उस समय मैंने तुम्हारे गर्भ से जन्म लिया था और मेरा नाम उपेन्द्र था तथा मेरा नाम वामन अवतार के रूप में प्रसिद्ध हुआ । अब तीसरी बार आपका पुत्र बनकर प्रकट हुआ हूँ। इतना बताकर भगवान चुप हो गए और शिशु रूप धारण कर लिया । श्रीमद् भागवत महापुराण तब वसुदेव जी ने भगवान की प्रेरणा से अपने पुत्र को लेकर सूतिकागृह से बाहर निकलने की इच्छा प्रकट की। उसी समय नन्द की पत्नी यशोदा के गर्भ से उस योगमाया का जन्म हुआ जो भगवान की शक्ति होने के कारण उनके समान ही जन्म रहित है। वसुदेव जी अपनी योगमाया से श्री कृष्ण को लेकर गोकुल की तरफ चले । घनघोर वर्षा हो रही थी । श्री शेष जी ने छत्रछाया कर रखी थी। यमुना नदी उमड़ रही थी। यमुना जी ने रास्ता दे दिया। वसुदेव जी नन्दबाबा के यहाँ से उस कन्या को ले आए और अपने पुत्र को यशोदा जी के पास सुला दिया। जेल में पहुँचकर वसुदेव जी ने उस कन्या को देवकी के पास सुला दिया और अपने पैरों में बेड़ियाँ धारण कर लीं तथा दरवाज़ों पर ताले लग गए।