Geeta Part-8

श्री कृष्णाय नमः

★★★★ अथ अष्टमो अध्याय प्रारम्भते ★★★★

अक्षर ब्रह्म – योग

अर्जुनोवाच- श्री कृष्ण जी के वचन सुनकर अर्जुन पसंद करता….

देवलोक में जाते हैं जो देवन के दास।
भूत लोक पाते वही जिन्हें भूत की आस।।
जो जन मेरे भक्त हैं, मुझे जानते नाथ।
तन से मन से जो सदा रहते मेरे साथ।।
मेरी केवल भक्ति में रहते हैं दिन रात।
वही पुरुष संसार में मोक्ष धाम को पात।।
अंतकाल सिमरें मुझे हे अर्जुन जो धीर।
वे योगी पाते मुझे हे पांडु सुत वीर।।

….. हे पुरुषोत्तम जी! तुमको तुम्हारे भक्त ब्रह्मा जानते हैं सो ब्रह्मा क्या है ? अध्यात्म क्या है ? कर्म क्या है ? अदभुत क्या है ? अद्वैत क्या है ? मधुसूदन जी! आदयज्ञ क्या है ? जो प्राण त्यागने के समय तुमको ऐसा जानते हैं तिन की गति क्या है ? इन सब नामों को कृपा करके मुझको समझाओ। अर्जुन के प्रश्न का उत्तर श्री कृष्ण भगवान जी कहते हैं श्री भगवानोवाच-
हे अर्जुन! मैं सबसे न्यारा और अविनाशी हूं, इस कारण मेरा नाम ब्रम्ह है और मुझको अपने ही प्रताप से प्रताप है, अपने ही बल से बल है, और अपने ज्ञान से ज्ञान हैं। अन्य जितने भूत प्राणी है तिस सबको मेरे बल से बल है और मेरे ही ज्ञान से ज्ञान है, सब मनुषयों का अधिकारी ठाकुर प्रभु हूं इस कारण से मेरा नाम अध्यातम है और सब भूत प्राणियों को उपजाता हूं जैसे किसी के मस्तक में कर्म रेखा लिखता हूं वैसे ही तिसको को प्राप्त होता है। इस कारण से मुझको कर्म कहते हैं, पंचभूत जो जल, तेज, वायु, पृथ्वी और आकाश है तिनका अविनाशी कर्ता हूं। इस कारण से मेरा नाम अदभुत है और जो कुछ होन हार है तिसका भी प्रभु ठाकुर मैं ही हूं इस से मेरा नाम अद्वैत है जितने यज्ञ होते हैं देवता पितरों के निमित्त श्राद्धक्षहि मनुष्य करते हैं सब में प्रथम मेरी ही पूजा होती है। इससे मेरा नाम अविनाशी है और एक मेरा नाम देह भरतम्बर है इसका अर्थ सुन- जितने देहधारी हैं इन सब में मेरी देह अति सुंदर है। मेरी देह जैसी किसी की देह सुंदर नहीं और न मेरे जैसा किसी में बल है। देहधारियों को क्या कहिए – जितने मेरे अवतार हैं उन सब में यह मेरा अवतार महा श्रेष्ठ है। इस कारण से मेरा नाम देह भरतम्बर है जो अंत काल में देह त्यागने के समय ऐसा मुझको पहचान कर मेरा स्मरण करते-करते देह त्यागते हैं सो मेरे परमानन्द अविनाशी पद में जा प्राप्त होते हैं, इसमें संदेह नहीं हे अर्जुन! देह त्यागने के समय जिस-जिस का स्मरण करते देह को त्यागते हैं तिस ही को पहुंचते हैं, इससे सर्वकालों में मेरा ही स्मरण कर। क्या जानिए यह क्षणभंगुर देह किस समय छूट जावे। मेरे में निश्चल चेता रखें तो मुझको पावेगा, इसमें संशय नहीं हे अर्जुन! सब समय चितकर स्वास-स्वास मेरा ध्यान कर स्मरण कर यह अभ्यास योग के लक्षण है। मुझ प्रभु में मन रखें, महां ईश्वर पूर्ण प्रभु ऐसा जानकर ध्यान करने से मेरे विखे मिल जाता है, फिर कैसा हूं ? काम रूप सब का ज्ञाता सबसे आदि अलेख हूं, मेरी आज्ञा सबके सिर पर है, मुझ पर किसी की आज्ञा नहीं और सूक्ष्म से अति सूक्ष्म हूं, सब की उत्पत्ति करता हूं, अचिंत रूप हूं प्रबीन हूं, सबके जानने हारा हूं जिसको अचिंत रूप कहते हैं मैं ही तेज रूप होकर सूर्य में विराजमान होता हूं। अज्ञान अंधकार से न्यारा हूं, पारब्रह्म हूं और एक योगी पुरुष प्राण त्यागते समय अपनी इच्छा को निश्चल रख कर भक्त्ति योग के बल से प्राण वायु को त्रिकुटी में भली-भांति ठहरा परम पुरुष को श्रद्धा से ऐसा जान संग्रह कर देह त्यागते हैं सो परमानन्द अविनाशी पद में जा प्राप्त होते हैं और जिस पुरुष के पाने के निमित्त ब्रम्हचारी ब्राम्हचर्य्य रखते हैं तिस पुरुष का महात्म्य मैं तुझको थोड़े ही में कहता हूं- एक योगी इस प्रकार देह त्यागते हैं कि यह नवद्वार देह के समय साथ मंद कर्मों से हटकर निश्चल करते हैं और प्राण पवन को रोककर मस्तक में ले आते हैं और मेरे नाम का हृदय में जप करते हैं ‘ओं’ब्रम्ह’ नाम का स्मरण करते देह त्यागते हैं सो मेरे परमपद ब्रम्ह अविनाशी पद में जा प्राप्त होते हैं। और मेरे प्रेमी भक्तों का वृतांत सुन- जो मेरे प्रेमी मन करके निश्चल चेता मेरे में रखकर चलते, फिरते, बैठते मुख से राधाकृष्ण। राम भगवान पारब्रम्ह, परमेश्वर, परमात्मा वासुदेव कृष्ण, विश्वम्भर इन नामों का जप करते हैं ऐसे नित्य योगी मेरे साथ जुड़ते हैं, तो मुझे सुखैन ही पाते हैं और देह को त्याग कर मेरे परम धाम में प्राप्त होते हैं संसार जो दुखों का समुद्र है इसमें जो महापुरुष परमसिद्ध है सो फिर जन्म नहीं पाते हैं हे अर्जुन! जीव ब्रम्ह लोक तक जाकर फिर आते हैं और संसार में जन्म मरण पाते हैं, और जिन पुरुषों ने मुझे पाया है सो प्राणी मेरे परमपद में आ फिर जन्म नहीं पाते। अब अर्जुन! जिन पुरुषों ने मेरा महत्व में सुना है तिनकी दृष्टि सुन- सतयुग, द्वापर, त्रेता, कलयुग जब यह चारों युग सहस्त्र बार बीत चुके होते हैं तब ब्रम्ह का एक दिन होता है, इस प्रकार यह चारों युग सहस्त्र बार व्यतीत होते हैं तब ब्रह्मा की एक रात्रि होती है। अब युगों की मर्यादा सुन- सत्रह लाख अठाई सहस्त्र वर्ष का सतयुग,बारह लाख छया हजार वर्ष का त्रेतायुग, आठ लाख चौसठ हजार वर्ष का द्वापरयुग, चार लाख बत्तिस हजार वर्ष का कलयुग है। यह चारों त्रिताली लाख बीस हजार वर्ष के हैं। जिन्होंने मेरा प्रताप परम अविनाशी जाना है तिनकी की दृष्टि सुन- यह चारों सहस्त्र बार बीत जाए तब ब्रह्मा का एक दिन होता है। इनके जाने से एक सा ही है अपनी आय भोगकर ब्रह्म भी नष्ट हो जाता है, मनुष्य भी मर जाता है, इससे जो नाशवान है सो एक समान है, उन्होंने एक अविनाशी ही पहचान कर मेरे चरण कमल के साथ दृढ़ निश्चय बांधा है। अब और सुन- हे अर्जुन! मेरा जो अवगति स्वरुप है, तिस स्वरुप में ब्रम्हा के दिन में सृष्टि उपजती फिर ब्रम्हारात्री में मेरे अविनाशी अवगति स्वरुप में जा समाती है। हे अर्जुन! यह जो चौरासी लाख जून ब्रह्मा के दिन में उपजाती और रात्रि को मेरे अवगति स्वरुप में जा लीन होती है सो मेरा अवगति स्वरूप सबसे न्यारा है और सनातन पुरातन है, सबके नाश होने से इसका नाश नहीं होता, ऐसा तो परम अविनाशी हूं और किसी ने कभी प्रगट देखा भी नहीं, इस कारण से इसका नाम अवगति है, उसी को परम गति कहते हैं। इसको प्राप्त होने से फिर संसार के मार्ग में नहीं आता, सो परमधाम मेरा घर है। हे अर्जुन! जो पुरुष सबसे न्यारा है और उस मार्ग के उपाय सुन- जिस मार्ग के पाने से अन्नय भक्ति, अखंड भक्त्ति करके भक्त्ति पावे हैं अब अखंड अन्नय का वृतांत सुन- मेरे साथ दूसरा देवता नहीं पूजना, मेरे भजन बिना एक स्वास नहीं खोना, इसका नाम अन्नय अखंड भक्त्ति है, इस भक्त्ति से मैं पाया जाता हूं, सो कैसा पुरुष हूं ? जिससे सभी सृष्टि उपजती है फिर उसी में लीन होती है। हे अर्जुन! और सुन- इच्छाचारी योगी दो प्रकार के होते हैं एक तो देह त्याग कर मुझ पारब्रम्ह में जा लीन होते हैं फिर संसार मार्ग में नहीं आते। दूसरे योगी चंद्रमा के लोक तक जाकर फिर आते हैं, अब जो चंद्रमा के लोक तक जाकर फिर आते हैं तिनकी बात सुन- वह इच्छाचारी योगी तब देह त्यागते हैं जब मनुष्य का दिन होता है शुक्लपक्ष चंद्रायण सोई पितरों का दिन होता है और कृष्णपक्ष जो अंधेरा पक्ष है सो पितरों की रात्रि होती है। देवताओं का दिन कौन है ? जब छः महीने सूर्य का रथ उतरायण रहता है तब देवताओं का दिन होता है और जब छः महीने सूर्य दक्षिणायण होता है तब देवताओं की रात्रि होती है वह इच्छाचारी योगी जब देवताओं का, पितरों का, मनुष्य का दिन तब देह का त्याग करें है! मनुष्यों भी जागते हो पितर भी और देवता भी जागते हो सो देह त्याग कर मनुष्यों का, पितरों का, देवताओं का कौतुक देखते हुए जाते हैं। इन लोको से आगे अग्नि का जोत नाम नगर है, तिसका कौतुक देखते हुए मेरे अविनाशी परमपद में जा लीन होते हैं। तब मेरे जानने हारा परम सुख रूप हो जाता है अब दूसरे योगी की बात सुन- जो जाकर फिर आता है। वह योगीशर जब मनुष्यों की देवताओं की रात्रि होती है, तब देह त्याग कर इन लोकों के बीच होकर एक धुंए का नगर है, उसमें होकर चंद्रमा की ज्योति में जा प्राप्त होता है। वहां कुछ काल वास करके फिर मनुष्य लोक में आता है। यह दोनों मार्ग योगियों के पुरातन हैं। एक नाम शुक्ल चांदनी रात्रि और एक नाम कृष्ण अंधेरी रात्रि है, एक मार्ग को गए फिर नहीं आते, एक मार्ग को गए फिर आते हैं। हे अर्जुन! तुमने दोनों मार्ग योगियों के सुने

यो मार्ग का जो लगे योगी मोहन पाय।
ताह ताह पार्थ तू ही योग युक्त चित लाय।।

जिन्होंने यह बात समझी है सो मोह को प्राप्त नहीं होते। हम से हे अर्जुन! तू भी इन सब कालों में मेरे साथ युक्त रह। अब जो पुरुष इन अध्याय को पढ़े सुने तिनको कितना पुण्य प्राप्त होता है सो सुन- चार वेद पढ़ने से जो पुण्य होता है यज्ञ,तप, तीर्थ स्थान व दान किए से जो पुण्य उपजे हैं सो सभी पुण्य इस अध्याय के पढ़ने से प्राप्त होंगे। जो श्रद्धा सहित इसको धारण करते हैं उनको अनन्त प्राप्त होंगे।

इति श्री मद् भगवद् गीता सुपनिषद सुब्रह्म विद्या योग शास्त्रे श्री कृष्ण अर्जुन सम्बादे अक्षर ब्रम्ह योगो नाम अष्टमो अध्याय।।

★★★★ अथ आठवें अध्याय का महात्म्य ★★★★

श्री नारायणोवाच- हे लक्ष्मी अब आठवें अध्याय का महात्म्य सुन- दक्षिण देश नर्मदा नदी के तट पर एक नगर था उसमें इंद्र नामी धनी पुरूष रहता था, उसके पास बहुत द्रव्य पदार्थ था, और वह संतों की सेवा करने वाला था, बड़े यज्ञ करता था दिन एक ब्राह्मण से पूछा- हे ब्राह्मण जी! मेरे संतान नहीं है तब अन्धमत ब्राह्मण ने कहा तू अजामेघ यज्ञ कर, बकरा देवी को चढ़ा, तुमको पुत्र देगा। तब उस धनी पुरूष ने यज्ञ करने को एक बकरा मोल लिया, उस को स्नान करा मेवा खिलाया, जब उसको मारने लगा तब बकरा कह कह शब्द कर के हंसा। तब धनी पुरूष ने पूछा- हे बकरे! तू क्यों हंसता है ? बकरे ने कहा- पिछले जन्म मै भी ब्राह्मण था और मेरे भी संतान नहीं थी इस ब्राह्मण ने मुझे भी अजामेघ यज्ञ करने को कहा था, सारी नगरी में बकरा ढूंडा परंतु हाथ ना लगा। ढूंढता ढूंढता एक बकरी का लेला दूध चूसता था, उस लेले समेत बकरी को मोल ले लिया, जब बकरी से दूध चूसना छुड़ाकर यज्ञ करने लगा, तो बकरी बोली- अरे ब्राह्मण! तू ब्राह्मण नहीं जो मेरे पुत्र को होम में देने लगा है तू महा पापी है, यह कभी सुना है कि पराए पुत्रों को मारने से किसी ने पुत्र पाया हो। तू अपनी संतान के लिए मेरे पुत्र को मारता है। तू निर्दई है तेरे पुत्र नहीं होगा? उस बकरी ने बहुत कहा पर मैंने होम कर ही दिया। बकरी ने शाप दिया कि तेरा भी गला इसी भांति कटेगा, इतना कह तड़प-तड़प कर बकरी मर गई। कई दिन बीते, मेरा भी काल हुआ यमदूत मारते-मारते धर्मराज के पास ले गए। तब धर्मराज ने कहा इसको नरक में दे दो यह बड़ा पापी है। फिर नरक भुगाकर बानर की योनि पाई, बाजीगर ने मुझे मोल लिया। वह गले में रस्सी डालकर द्वार-द्वार सारा दिन मांगता फिरता पर खाने को थोड़ा दिया करता। जब बानर कि देह से छूटा तो कुत्ते का जन्म पाया। एक दिन मैंने किसी की रोटी चुरा खाई। उसने ऐसी लाठी मारी की मेरी पीठ टूट गई उस दुख से मेरी दे छूट गई। फिर घोड़े की देह पाई उस घोड़े को एक भठ्यारे ने मोल लिया। वह सारा दिन चलाया करता खाने-पीने की खबर ना लेता, रात पढ़ती तो एक छोटी सी रस्सी के साथ बांध छोड़ता, ऐसा बांधता की मक्खी भी नहीं उड़ा सकूं। एक दिन दो बालक एक कन्या मेरे पर चढ़कर चलने लगे, वहां कीचड़ अत्यंत था, मैं फंस गया ऊपर से वह मरने लगे, वहां मेरा अंत हुआ। इस भांति अनेक जन्म भोगे। अब बकरे का जन्म पाया, मैंने जाना था जो इसने मुझे लिया है मैं सुख पाऊंगा, तू छुरा लेकर मरने लगा है। तू यह पाप मत कर। मुझे तो एक ना एक दिन कसाई काट ही देगा। तब धनी पुरुष ने कहा- हे बकरे! तुझे भी जान प्यारी है, जैसे चिड़िया कंकर मारने से आगे उड़ जाती है, अब मैं अपने नेत्रों से देखी बात कहता हूं, सो सुन- कुरुक्षेत्र में एक राजा स्नान करने आया नाम उसका चंद्र था, उसने ब्राह्मण से पूछा ग्रहण में कौन सा दान करूं उसने कहा राजा काले पुरुष का दान कर, तब राजा ने काले लोहे का पुरुष बनाया, नेत्रों में लाल जुड़वा, सोने के भूषण पहनाकर तिसको त्यार किया राजा स्नान करने चला, स्नान करके दान किया, वह काला पुरुष कह कह कर हंसा। राजा डर गया,और कहे कोई बड़ा अवगुण हुआ जो लोहे का पुरुष हंसा है, तब राजा ने और ज्यादा दान किया वह फिर हंसा और ब्राह्मण को कहने लगा- हे ब्राह्मण तू मुझे लेगा ? तब ब्राह्मण ने कहा- मैं तेरे जैसे कई पचाये हैं। अब काले पुरुष ने कहा- तू मुझको वह कारण बता जिससे तूने अनेक दान पचाये हैं तब ब्राह्मण ने कहा जो गुण मेरे में है सो मैं जानता हूं। तब वह काला पुरुष कह-कह कर फट गया, और उसमें एक और कलिका की मूर्ति निकल आई, तब ब्राह्मण ने श्री गीता जी के आठवें अध्याय का पाठ किया, तब उस कलिका की मूर्ति ने सुन कर देह पलटी, जल की अंजली भरके उस ब्राह्मण मूर्ति पर छिड़की, जल छूने से तत्काल उसकी देह छूटी दिव्य देहि पाई, आकाश मार्ग से बैकुंठ को गई। तब उस राजा ने कहा तुम्हारे में भी कोई गीता पाठी है जिससे पाठ सुनकर मैं भी अधम देह से छूट सकूं और बैकुण्ठ को प्राप्त हो सकू। तब उस ब्राह्मण ने कहा मैं वेदपाठी हूं, पर इस नगर में एक साधु गीता पाठी है, तिससे राजा नित्य गीता के आठवें अध्याय का पाठ श्रवण करने लगा। कुछ काल व्यतीत हुआ तो राजा की देह छूटी। देव देहि पाकर राजा भी बैकुण्ठ को गया। श्री नारायण जी ने कहा हे लक्ष्मी यह गीता के आठवें अध्याय का महात्म्य है जो तूने सुना है।

इति श्री पदम् पुराणे सति ईश्वर सम्बादे उतरा खण्ड गीता महात्म्य नाम अष्टमो अध्याय सम्पूर्णम्।।

Geeta Part-7

श्री कृष्णाय नमः

★★★★ अथ सप्तमो अध्याय प्रारम्भते ★★★★
प्रकृति भेद – योग

श्री कृष्ण भगवानोवाच- चित राखहु चरणारविंद भगवत भक्ति को पाए…..

जल भूमि धरती अनल पंचम व्योम महान।
मन बुद्धि और अहंपन आठ प्रकृति जान।।
यह मेरी माया प्रबल भव के बीच प्रधान।
इसके अंश जो वस्तु है जास उसी का जान।।
हे अर्जुन जिमि सूत मे सूत के मोती होत।
तिमि मुझ में सारा जगत जानो श्रोत प्रोत।।
मुझ से बाहर कुछ नहीं मैं हूं सब का ठौर।।
इस सप्त अध्याय में कहते माखन चोर।।

…. एक टोक डोलते नहीं यह विधि योग कमाये। हे अर्जुन! मेरे आश्रम योगधार, मेरा आश्रम क्या है सो कहे कि हे प्रभु श्री कृष्ण भगवान जी! मैं तो आपके स्मरण साथ योग कर जुड़या हूं सो तुम्हारी कृपा से जुड़या हूं आप से नहीं जुड़या- यह विधि समझी, समझ के पायी योग की राह और तुम्हारी कृपा से स्थित भई सच्चे बेपरवाह। हे अर्जुन! मेरे योग के जानने के प्रसाद से तिन को ज्ञान उपजे है सो ज्ञान में तुझको कहता हूं, जिस ज्ञान के जाने से फिर कुछ जानना नहीं रहता। सो कोई एक पुरुष संसार से विरक्त्त होता है, जितने विरक्त्त होते हैं, उन विरकतों में कोई एक मुक्ति पद को प्राप्त होता है और जितने मुक्त होते हैं उनमें कोई मेरी महिमा के ज्ञान को पहिचानता है, सो मेरी महिमा तू मुझसे श्रवण कर, हे अर्जुन! जल, तेज, वायु, पृथ्वी, आकाश और मन बुद्धि अहंकार यह आठ प्रकृति नहीं, सो इनको उपजाने हारी मेरी माया है यह आठो शरीर धारियों के बाहर भी है और भीतर भी है यह जिस भांति देह में व्यापक है सो सुन- धरती का अंश मांस है, जल का अंश लहू है, वायु का अंश स्वास है, तेज का अंश अग्नि जो उधर में अन्न को पचाती है आकाश का अंश पोलापन है, मन बुद्धि और अहंकार यह आठो मेरी माया है हे महाबाहो अर्जुन! नवा इसमें जीव भूत है, सारा जगत संसार इन्हीं का है, सब चौरासी लाख योनि इन्हीं की बनाई है, और बात सुन- मैं कैसा हूं ? सब संसार और संसार के रचने हारी मेरी माया है तिस सब की उत्पत्ति करता हूं, पालन करता हूं, प्रलय भी करता हूं, सबसे न्यारा हूं अर्जुन मुझ से न्यारा कुछ नहीं, सब भूत प्राणी मेरे साथ पिरोहे रहे हैं ज्यों धागे साथ मणि पिरोई है। हे अर्जुन यू कोई मत समझे कि मैंने वासुदेव और देवकी एक घर जन्म लिया है। सो सारे देह विखे जहां कोई त्वचा है तहाँ ही पीड़ा होती है, इसी तरह सब के समीप जो दीखता और सुनाई देता है सब ब्रह्म मैं ही हूं, ज्यों मेरे आधार सब लोक हैं सो भी सुन- हे कुन्ति नंदन! सब देहधारी जल के आसरे हैं, जल का जीव रस है, इस जल के रस को खाय कर जीते हैं जैसे दूध में घी है, तैसे जल में रस है, जो जल का जीव रस है जल रस के आधार है, सो रस मेरे आधार हैं, सभी लोक चंद्रमा और सूर्य के आधार है चंद्रमा, सूर्य ज्योति के आधार हैं। वेदों में मेरी महिमा अमृत रूप है सो ब्रह्मा से आदि लेकर जितने वेदपाठी हैं सो उनका आधार मेरी महिमा है। और वेदपाठी वेद के आधार हैं, वेदों का जीवन जीव रूप ओंकार है, सो वेद ओंकार के आधार हैं, सो ओंकार मेरे आधार है और सभी लोक आकाश के आधार हैं और आकाश का जीव शब्द है, आकाश शब्द के आधार हैं, शब्द मेरे आधार हैं, सब मनुष्य बल के आधार हैं सो बल मेरे आधार है, सब लोक धरती के आधार हैं, धरती का जीव गन्ध है, गन्ध जो वासना है सो धरती वासना के आधार हैं, वह वासना मेरे आधार है, यह सब लोक अग्नि के आधार हैं, अग्नि का जीव तेज है, अग्नि तेज के आधार हैं सो तेज मेरे आधार है और सबूत प्राणियों का जीवन मैं हूं, जितने तपस्वी हैं सब तपस्या के आधार हैं, तपस्या मेरे आधार है। हे में श्रेष्ठ अर्जुन! सब भूत प्राणियों का बीज तू मुझको जान और सनातन पहले तू मुझको जान और जो कुछ बुद्धि मतो में बुद्धि है सो तू मुझको जान, तेज वालों में जो तेज है मुझको जान, बलवानो में जो बल है सो मेरा जान। मुझको किसी वस्तु की वांछा नहीं अपने अंदर से पूर्ण हूं, किसी साथ मेरा मोह नहीं। हे कुरूवंशी अर्जुन! जो शुभ धर्म का मार्ग मारने हारा काम है सो भी मैं हूं, यह जो तीनों गुण है- सात्विक, राजस, तामस तिन्हों में सब मेरी ही शक्ति की सत्ता है और मेरे में यह नहीं, इनसे मैं न्यारा हूं –

त्रिगुण माया महामाया प्रजा मोह उत्पन्न थे।
मोहमगन मूढ़ अन्ध महाप्रभु नहीं गम्मते।।

दिव्य गुणमयी माया देविये अर्थ कह।
पर जोर चखेल करता दिव्य यह अर्थ कह।।

ऐसी माया प्रभु की तरणी कठिन अपार।
एक देव की शरण होय सो जन उतरे पार।।

हे अर्जुन! और उपाय माया से तरण का कोई नहीं, महामूढ़ पापी जिन्होंने प्रभु की शरण नहीं ली, वह बहुत माया भ्रम में भूले हैं। हे अर्जुन! तिनको ज्ञान माया ने आछाद लिया है और वैसे ही उनके स्वभाव हो रहे हैं।

दो चतुर भाव मोहे भजन पार्थ कहूं बखान।
आरत जिज्ञासु अर्थी ज्ञानी श्रेष्ठ मान।।

हे अर्जुन! चार प्रकार के जीव पुण्य आत्मा है। एक तो रोगी मेरा स्मरण करते हैं। जो मनुष्य रोग मिटाने के अर्थ मेरा भजन करते हैं तिनका रोग गुरु है। एक ज्ञान पावने निमित्त मेरा भजन करते हैं। एक अर्थी मन की कामना पाने निमित्त पुत्र व धन आदि के लिए मुझको सिमरते हैं। हे अर्जुन! चौथे ज्ञानी भजन करते हैं तिन सभी में ज्ञानी श्रेष्ठ है।

सत्य स्वरूप स्वामी प्रभु, अविनाशी सदा अनन्द।
सुख दाता दुख हरण प्रभु ऐसा कमला कंत।।
इस प्रकार पहिचान कर चरण कमल का ध्यान।
सो ज्ञानी अति श्रेष्ठ है मुझ उसमें भेद न मान।।

हे अर्जुन! मुझको ज्ञानी प्यारे हैं और ज्ञानियों को मैं प्यारा हूं पर यह जो रोगियों से आदि लेकर मुझको सिमरते हैं तिनको भी बुरे मत जान। सो भी बड़े उद्धार हैं बड़े श्रेष्ठ हैं जो ईश्वर को सिमरते हैं पर ज्ञानी मेरी आत्मा है तीन ज्ञानियों ने केवल मेरे चरणों के साथ दृढ़ निश्चय बांधा है और जिन्होंने मुझे ही उत्तम ठाकुर ईश्वर जाना है। अर्जुन बहुत जन्म पर्यन्त भजन करते-करते साधन से इनकी बुद्धि निर्मल होती है तब उनको मेरे जानने का ज्ञान उत्पन्न होता है, कैसा ज्ञान ? सो सुन- तिनको सभी वसुदेव दृष्टि आवे है, सो ज्ञानी महापुरुष महन्त कहलाते हैं पर ज्ञानी संसार में दुर्लभ है। जो मुझ को त्यागकर मनुष्य और देवता की उपासना करते हैं तिनकी बात सुन- कामना से उनका ज्ञान है कामना के पावने के निमित्त और देवता की उपासना करते हैं और जिस देवता की उपासना करते हैं सो मैं उनके हृदय में बैठकर उस देवता के में दृढ़ श्रद्धा लगाता हूं तिनकी श्रद्धा उसी देवता में ही निश्चल करता हूं, सो मनुष्य प्रीति के साथ देवता की पूजा करता है और मैं ही तिस देवता में अंतर्यामी होकर मनुष्य को देवता से कामना वर दिलाता हूं, देवता का दिया हुआ वर नित्य अविनाशी नहीं अन्तवत है उसका विनाश हो जाता है और जिसकी निपट थोड़ी बुद्धि है देवता की उपासना करते हैं। अब अर्जुन और निर्णय की बात सुन- देवता के पूजने हारे देवता के लोक में जा प्राप्त होते हैं। और मेरे भक्त परमानन्द अविनाशी पद में जा प्राप्त होते हैं। अब अर्जुन और सुन मैं अविनाशी हूं, एकांती हूं, किसी से प्रकट नहीं हुआ, किसी ने जाना भी नहीं, किसी ने सुधारा भी नहीं, अपनी कला से मैं आप ही पूर्ण हूं, दुर्बुद्धि जो मत के होते हैं सो मुझको किसी से प्रकट भया जानते हैं सो मेरे प्रताप को नहीं जानते कि मैं कैसा हूं –

अति उत्तम वह उच्च प्रभु तिस समान नहीं कोय।
निर्मल निश्चय अति अगम यह ताप प्रभु होय।।

हे अर्जुन विचारे मनुष्य क्या करें। तिसका ज्ञान मेरी योग माया ने अछाद लिया है सो माया प्रकाश होने नहीं देती-

मोह माया महानन्द अधम नीच विमोचक!
अविनाशी अजन्म तिह प्रतापअन लखत।।

हे अर्जुन! एक मेरा नाम वेदों में चैतन्य पुरुष है । तिस का अर्थ सुन- ब्रह्मा से आदि चींटी पर्यन्त सब भूत प्राणी वर्तमान जो अब वर्ते हैं और जिन्होंने आगे होना है पीछे हो चुके हैं सो तिनको मैं भली भांति जानता हूं, मुझे एक तू ही जानता है और कोई नहीं जानता, क्यों नहीं जानता ? इन्द्रियों के भोगों में तिनको कामना है, भली वस्तु पाये से प्रसन्न और बुरी वस्तु पाये से दुखी होते हैं ऐसे हर्ष, शोक, कलह क्लेश कर मोह को करते हैं इसलिए मुझ को नहीं पहचानते, मूढ़ हुए हैं, इसी से जन्मते मरते हैं और जिनके पाप काटे गए हैं सो ऐसे पुण्य कर्मी परम पुण्यात्मा हैं संसार के हर्षशोक,कलह क्लेश से मुक्त होये कर मन के दृढ़ निश्चय साथ मेरा भजन करते हैं, मेरी ही आसरे हैं, सो मेरे भजन के ज्ञान का फल क्या पावेंगे सो सुन- बुढ़ापे और जन्म मरण के दुखों से मुक्त होंगे। तिनके मन में मेरे जाने का ज्ञान उपजता है वह मुझको ही ब्रह्म जानते हैं मुझको अद्भुत जानते हैं मेरे को ही अध्यात्म देव जानते हैं। ऐसा मुझ को जानकर प्राण त्यागने के समय मन का निश्चल चेता मेरे में रख मेरा स्मरण करते देह को त्यागते हैं इसी से प्राणी परमानन्द अविनाशी पद विखे जाए प्राप्त होते हैं।

इति श्री मद् भगवद् गीता सुपनिषद सुब्रह्म विद्यायोग शास्त्रे श्री कृष्ण अर्जुन सम्बादे प्रकृति भेदो नाम सप्तमो अध्याय।।

★★★★ अथ सातवे अध्याय का महात्म्य ★★★★

श्री नारायणोवाच- हे लक्ष्मी! अब सातवें अध्याय का महात्म्य सुन- पटेल नाम एक नगर में संकूकर्ण नामक एक वैश्य रहता था, व्यापार करने को नगर के बाहर कहीं को जाता था, रास्ते में संकूकर्ण को सर्प ने डस लिया, जिससे वह मर गया, उसके साथी उसको दाह कृत्यकर आगे को सिधारे। जब संकूकर्ण के साथी फिरके घर में आए तब उसके पुत्र ने पूछा मेरा बाप संकूकर्ण कहां है ? तब उन व्यापारियों ने कहा- तेरे पिता को सर्प ने डसा था, वह मर गया और यह पदार्थ (धन) तेरे पिता का है सो तू ले, काफी सारा धन दिया और तिसकी गति करने को कहा, क्योंकि वह अब गति मरा था, उस बालक ने अपने घर आकर ब्राह्मणों से पूछा कि सर्प के डसे से मरे की क्या गति करनी चाहिए ? पंडितों ने कहा नारायण बलि करावो। उर्द के आटे का पुतला बनाकर उसमें चुनिया जड़ाओ। जैसी विधि पंडितो ने कहीं तैसी करी, बड़ा यज्ञ किया, बहुत ब्राह्मण जिमाये, श्राद्ध पिंड पतल कराये, बाकी द्रव्य जो बचा चारों भाइयों ने बांटा, एक ने कहा कि जिस सर्प ने मेरे पिता को काटा है मैं तिसको मारूंगा, उन व्यापारियों से पूछा- वह ठौर मुझे बताओ जहां मेरे पिता संकूकर्ण की मृत्यु हुई है। व्यापारियों ने कहा- चल वह ठौर तुझे बताए वहां ले जाकर खड़ा किया, देखा वहां एक वर्मी है तिसको कुन्दाले के साथ खोदने लगा। जब छेद बढ़ा हुआ वहां से एक सर्प निकला कहा तू कौन है मेरा घर क्यों खोदता है ? उस बालक ने कहा मैं संकूकर्ण का पुत्र हूं जिसको तूने डसा है तेरे डसने से मेरा पिता मरा है मैं तुझको मारूंगा। तब उस सर्प ने कहा- हे पुत्र मैं तेरा पिता हूं, जिस सर्प ने मुझे इस स्थान पर डसा था वह सर्प तो उसी समय इस स्थान को छोड़कर चला गया था। अब तू मुझे मार मत बस इस अदम देह से छुडा। वह मेरा पूर्व का कर्म था सो मैंने भोगा। तब पुत्र ने कहा- हे पिताजी कोई यतन बताओ जिससे तेरा उद्धार हो, तब उस सर्प ने कहा- हे पुत्र! किसी गीता पाठी ब्राह्मण को घर में भोजन कराओ और उसकी सेवा करो, उसके आशीर्वाद से मेरा कल्याण होगा। तब उस बालक ने अपने घर आकर अपनी स्त्री को समाचार कहा। तब उसकी स्त्री ने कहा अवश्य करो, साधुओं को जिमाओ, संतों की सेवा करने से उद्धार होय तो करो। तब खोज कर उस नगर में जितने भी गीता का पाठ करते थे तिन सबको बुलाकर श्री गीता जी के सातवें अध्याय का पाठ कराया और उनको भोजन करवाया और सेवा बहुत करी, प्रदक्षिणा करी, विनय करी हे महापुरुषों! आप आशीर्वाद करो जो मेरे पिता संकूकर्ण का उद्धार होवे, उस अधम देह से छूटे। तब साधु ब्राह्मणों ने आशीर्वाद दी, तत्काल ही वह अधम देह से छूट गया और देव देहि पाई, आकाश मार्ग जाता हुआ अपने पुत्र का धन्य धन्य करता बैकुंठ धाम में जा प्राप्त हुआ। श्री नारायण जी ने कहा- हे लक्ष्मी! यह सातवें अध्याय का महात्म्य है जो तूने सुना है जो पढ़े सुनेगा सो सदगति पावेगा।

इति श्री पदम् पुराणे सति ईश्वर सम्बादे उत्तरा खण्ड गीता महात्म्य नाम सप्तमों अध्याय संपूर्णम्।।

Gita Part-6

★★★★ श्री कृष्णाय नमः ★★★★

★★★★ अथ छठा अध्याय प्रारम्भते ★★★★

आत्म संयम – योग

श्री भगवानोवाच- हे अर्जुन! जो कर्म योग द्वारा मेरे साथ जुड़े हैं और फल कुछ वांछते नहीं तिनको सन्यासी जान। जो मेरे साथ….

हर्ष शोक को त्याग कर मान और अपमान।
दुख-सुख सम जाने वही उत्तम नर पहिचान।।
देना लेना बाटना सब अर्पण भगवान।
वह योगी संसार में हे अर्जुन धीमान।।
स्तुति गाली सब जान कर जीवन करें व्यतीत।
उस योगी कि जगत में होती अर्जुन जीत।।
मेरे अर्पण पर कर्म हो करे नहीं अभिमान।
मुक्त जीवन वह जगत में यूं कहते भगवान।।

…. जुड़े हैं इसी से योगी है फुल कुछ बांछते नहीं इसी से सन्यासी हैं, हे अर्जुन! जटा के धारे से भस्म के लगाने से, अग्नि, धूनी जला बैठने से सन्यासी नहीं होता। हे पांडव! योगी जन सन्यासी उसको कहते हैं जिसके मन में मेरे चरण-कमल बिना और कुछ वांछा नहीं। मेरे स्मरण में जुड़े बिना अवांछी होता नहीं अवांछा हुए बिना मेरे स्मरण में जुड़ता नहीं। जब मेरे स्मरण साथ जुड़े तब अवांछि होवें बिना कोई योगी नहीं। इस कारण से सन्यास और योग एक से कहे हैं। और जो कोई मेरे योग साथ जुड़ना चाहे तिसको मेरे जानने के जो सत्य कर्म है स्नान आदि से लेकर सो करने चाहिए। जब सत्य कर्म कर निर्मल होवें तब मेरे साथ जुड़े। और जो कोई योग आरूढ़ होवें तिनको कोई कर्म नहीं करना चाहिए जो कुछ उनको इच्छा हो सो करें। सोवे तब सो रहे, जो बैठा तो बैठा रहे, योग आरूढ़ इच्छाधारी मुक्त रूप है। योग आरूढ़ क्या होता है तिसके लक्षण सुन- इंद्रियां किसी विषय को न उठे और मन में मेरे स्मरण बिना कोई चिंता भी ना होवे जब ऐसा हो तब योग आरूढ़ होता है उसने अपनी आत्मा का उद्धार किया है, संसार के विषयों के स्वाद में नहीं रहा और अपनी ही आत्मा मित्र है अपना ही शत्रु है जिसने विषयों से वर्ज कर अपनी आत्मा मेरे भजन साथ जोड़ी है तिसकी अपनी आत्मा मित्र है जिसने मुझको विसार कर अपनी आत्मा विषयों में लगाई उसकी आत्मा शत्रु है, फिर ना कोई मित्र है ना कोई शत्रु। जिसने आत्मा विषयों से वर्ज कर परमात्मा पारब्रह्म अविनाशी के साथ जोड़ी है सो परम शांति सुख को प्राप्त हुआ। और उसको सीत उषण भी नहीं व्यापता। उसे मेरी कृपा से और कोई दुख भी नहीं व्याप सकता, जो आदर करने से प्रसन्न नहीं और अनादर करने से बुरा नहीं मानता और अपने आप को जानना इस को ज्ञान कहा है मैं क्या वस्तु हूं यह क्या खेल है और विज्ञान अर्थात परमेश्वर को जानना यह दोनों ज्ञान विज्ञान है, इसको तेरहवें अध्याय में कहूंगा। जिसमें ज्ञान-विज्ञान रूप अमृत पान किया है जिसका आत्तमा तृप्त हुआ सो इंद्रियों को निवारण कर सदा एक सा रहें, कंचन, माटी, शत्रु, मित्र एक समान जाने धर्मी पापी एक से दिखे, रोग द्वेष न करें, निरंतर एक ध्यान से मित्र शत्रु को जाना करें, यह पूर्ण योग के लक्षण है। इस युक्ति से रहे, वह योगी आत्मा से जुड़े अभय रहे, परमानंद रूप रहे, दूसरे की आशा न करें माया मोह से रहित हो परमपद को पावे है, हे अर्जुन! जो कोई और भी योग आरूढे चाहे, उसकी बात सुन- वह क्या करें। प्रथम तो एकांत स्थान मे एक थड़ी चार उंगल ऊंची जिसमें कंकर टोआ, टिबा ना हो सो बनाए ऐसा साफ थड़ा बनाकर तिस पर गोबर का चौका फेरे, तिस पर कुशा उस पर मृगशाला बिछा के ऊपर कपास का धुला हुआ कपड़ा डाले ऐसे पवित्र स्वच्छ आसन पर चौकड़ी मार बैठे, मन को निशचल कर इन्द्रियां वश कर ऐसा होकर मेरे साथ जुड़े और सारी देह को सीधा रखें, बांका टेढ़ा न बैठे, सिर ग्रीवा को भी सीधा रखें ऐसा निर्मल होकर बैठ कर श्रज्ञानी नासिका का अग्र भाग देखें और किसी दिशा को ना देखें, अपनी आत्मा को परमात्मा में लीन करें। किसी का भय न करें, गोविंद को गह राखे और मन को संयम करें, मन का निश्चल चेता मेरे में रखें इस भांति मेरे साथ योगी जुड़े। मन लक्षणों के साथ जुड़े तो परम शांति सुख अर्थात निर्माण पद को प्राप्त होवें हैं। हे अर्जुन! और भी तिसकी की युक्ति सुन- जो प्राणी उधर भर के भोजन खावें उससे योग प्राप्त नहीं होवें, योग किस भांति प्राप्त होवें सो सुन- युक्ति का आहार हो विवेकी पुरुष दो ग्रास भूखा रहे। जिसमे स्वास सुखी चले और गिरे भी नहीं और मस्त हाथी जैसे मंद मंद चले, जूता न पावे, दृष्टि कर पृथ्वी को देखता चले, जहां कोई जीव जंतु कंकर कांटा न हो वह चरण धरे, अपवित्र ठोर न धरे। जागता रहे तो भी योग नहीं होए, सोय रहे तो भी योग नहीं होय, सोना जागना त्याग कर पहर रात पहली जागे, पहर पिछली जागे सो ऐसी युक्ति कर योग करें तिसको यह योग प्राप्त होता है ऐसी युक्ति कर देह को कोई रोग भी नहीं व्यापता। इसका नाम दुख नाशक योग है। विवेकी पुरुष योगी का मन जब आत्मा साथ जुड़ जाता है तब उसके मन में किसी वस्तु की वांछा नहीं रहे। तिसको योग युक्त कहते हैं अब योगी को एकांत में बैठना क्यों कहा है इसका दृष्टांत सुन- जैसे जिस जगह पवन नहीं चलती उस जगह दीपक निर्मल अडोल ज्योति प्रकाश करे है और जो पवन लगने के स्थान में रखे तो जिस उसकी ज्योति डोले है इस कारण से योगी को एकांत बैठना कहा है। जो एकांत बैठकर मेरा ध्यान करें उस योगी का चेता मेरी सेवा युक्ति से निश्चल होता है तब उसको आत्मा दर्शन होता है, आत्मा के दर्शन से अति सुख को पाता है आत्मा के दर्शन का सुख कैसा है ? अति अविनाशी सुख है जिसको बुद्धि जानती है वह सुख बुद्धि गोचर है इंद्रियां उस सुख को नहीं जानती। इस कारण से इसका नाम अति इंद्रियां सुख है और जिसको पाने से वह योगी निर्लेप निश्चय होता है और उस सुख के उपरांत और कोई लाभ नहीं मानता, जिस सुख के पाने से शरीर को कोई बड़ा दुख लगे और शस्त्र साथ काटे, अग्नि में जलावे तो भी उसको दुख ना लगे। जिसका साक्षी प्रह्लाद है जैसे हिरणाकश्यप ने प्रहलाद को अनेक प्रकार की यातना दी पर प्रहलाद को कुछ कष्ट ना हुआ। ऐसा सुख जिसे पाकर सभी दुख भाग जायें, ऐसा सुख निधान योग संसार से विरक्त होकर अवश्य कीजिए, विलम्बन न कीजिए। सभी कामना छोड़कर कर और सब इंद्रियां वश कर योग कीजिए। शनैः शनैः मन को बुद्धि साथ पकड़कर आत्मा में निश्चल रखें और कुछ न चितवे यह मन चंचल है जिस जिस बात को चितवे उससे निवरण कर आत्मा साथ लगावे। जब मन साथ जुड़ जाए तब कैसी परम शांति सुख को पावे है तीन गुण को काट जावे है निर्मल पाप से तब ब्रम्ह साथ मिलने से ब्रम्ह का ब्रम्ह हुआ कपट माया दूर किया, इस प्रकार जिसने योग जाना सो नहीं डोलता, आप से आप जब जुड़या तिसके तब पाप सहज से जुड़ जाते हैं। इस प्रकार योग पाया तब ब्रह्म सुख को प्राप्त हुआ, आत्मा संग किया, परम सुख को पाया। सकल घट में आपको देखा,आत्मा में सकल देखा। अपना पराया कुछ न देखे सब आत्मा को जाने, सदा सम दृष्टि देखे, आप मध्य ब्रह्म देखा जगत निर्मल योग ब्रह्म प्रताप से पाये। हे अर्जुन! सभी भूत प्राणी तिसको अपने आत्मा में दृष्टि आये, और सब भूत प्राणीयों में अपनी आत्मा तिसको दृष्टि आये, तिसकी ऐसी समदृष्टि हुई, अपने में भी मुझको लगा देखें। जो सब में मुझ आत्मा ब्रह्म को देखें और सभी भूत प्राणी मुझ विराट पुरुष पर बैठे देखें। ऐसी जिसकी दृष्टि भई मैं उससे भिन्न नहीं, मुझसे वह भिन्न नहीं, मैं और वह एक रुप है। सभी भूत प्राणियों में मुझको व्यापक जानकर जो मेरा भजन करते हैं तिनको फिर जन्म नहीं और सब जनों में मैं व्यापता हूं उनमें मेरा भजन क्या है सो सुन- हे अर्जुन! जैसा अपने आत्मा में दुख सुख लगता है तैसे ही दूसरे का जाने,यह जानकर किसी को दुखावे नही, सबका सुखदायक मित्र होकर बरतें, मेरे मत में सब योगियों में वही योगी श्रेष्ठ है जो सबको सुखदायक है।
अर्जुनोवाच-
अर्जुन श्री कृष्ण भगवान जी से प्रश्न करते हैं, हे मधुसूदन जी ? जो तुमने जिस योग का मुझे उपदेश किया है हे प्रभु जी यह योग तो मेरे में नहीं है और मैं ऐसा योग कर भी नहीं सकता। हे भगवान! मन तो चंचल है, मस्त हाथी की न्याई बलवान है तिस मन का पकड़ना में पवन से भी कठिन जानता हूं। अर्जुन के प्रश्न का उत्तर श्री कृष्ण भगवान जी कहते हैं। श्री भगवानोवाच-

हे महाबाहो अर्जुन! इसमें कुछ संदेह नहीं, मन तो चंचल है, पकड़ा नहीं जाता, पर इसके पकड़ने के दो उपाय हैं सो सुन- मेरे साथ प्रीति, संसार के विषयों से वैराग्य इनसे मन निश्चल होता है। सो जिसने मेरे साथ प्रीति नहीं करी, संसार के विषयों से वैराग्य नहीं किया, सो मुझको नहीं पावेगा। जिन्होंने अभ्यास द्वारा मन मेरे साथ नहीं जोड़ा अभ्यास कहिए, जब मेरे स्मरण बिना जो कुछ और चितवना मन मे चितवे है तिनको योग कहा है अभ्यास कहिये, जब मेरे स्मरण बिना कुछ और चितवना मन मे चितवे, मन बुद्धि साथ जोड़कर मुझ ही को समरे इसका नाम अभ्यास है जिसने वैराग्य और अभ्यास दोनों उपाय नहीं किए तिनको योग कठिन है, जिन्होंने अभ्यास वैराग्य और मन दोनों मेरे साथ जोड़ा है उसको योग पाना आसान है, अभ्यास वैराग्य दोनों उपाय मन को पकड़ने के हैं। अर्जुनोवाच-
अर्जुन प्रश्न करें हैं। हे महाप्रभु जी! जिन्होंने तुम्हारे साथ योग जोड़ा है देह छूटने के समय तिनकी श्रद्धा अर्थात प्रीति तुम्हारे योग से छूट किसी और बात पर गई हो, सो प्राणी योग की विधि को नहीं प्राप्त हुआ। हे श्री कृष्ण भगवान जी! सो किस गति को प्राप्त हुआ। तुम्हारे योग से भ्रष्ट हुआ कि नहीं, उसकी सारी सिद्धि निष्फल गई या कुछ गति भई, जैसे मेघ को वर्षा के निमित्त उमंग कर संसार में आवे, किसी और से पवन आकर मेघ को खंड-खंड कर दे,वर्षा न हुई। मेघ की भांति योगी का योग नष्ट हुआ या उसकी गति हुई। हे जनार्दन प्रभु! श्री कृष्ण जी! सो तुम्हारे भोग को नहीं पहुंचा। तुम्हारा तो ब्रह्मपद है मुक्ति पद बैकुण्ठ, तिस मार्ग से वह फिर अन्धा हुआ तिसकी गति कहो। हे प्रभु! मेरे मन का शंशय काटो तुम बिन इस शंशय को छेदन हारा कोई नहीं। श्री कृष्ण भगवानोवाच-
हे अर्जुन! उसके योग को तू नाश हुआ मत मान, हे अर्जुन! जिसने एक बार मेरा नाम लिया और नमस्कार किया है मैं सत्य रूप अविनाशी सदा कल्याण रूप हूं। अब योगी जिसका मन देह छूटने के समय स्मरण को त्याग के और बात पर गया, तिसकी गति सुन- जिस स्वर्ग को पाने के लिए मनुष्य बड़े-बड़े दान करते हैं, यज्ञ करते हैं, सो स्वर्ग मेरे योगी को दण्ड है सो भ्रष्ट योगी भोगते हैं, सो स्वर्ग का वृतांत सुन- वहां देवता ही बसते हैं, वहां न किसी की कोई स्त्री है ना किसी का भर्ता है, वहां अप्सरा भोगने को है सो कैसी हैं ? जिनकी देह से बड़ी सुगंधि आवे है और दिव्य गंधर्व गायन करते हैं, खाने को अमृत भोजन है, सूंघने को दिव्य पारिजात के फूल, पहरने को दिव्य वस्त्र और अनेक प्रकार के दिव्य भोग हैं, योग भ्रष्ट वहां जाकर पहुंचता है और अनेक दिव्य भोगों को भोगता है, जब उन भोगों से उसका मन विरक्त हो जाता है तब वह स्वर्ग लोक त्याग कर मनुष्य लोक में आ जन्म पाता है वह किसी पवित्र कुल ब्राह्मण, क्षत्रिय और लक्ष्मी युक्त कुल में जन्म लेता है। जिसने थोड़े दिन योग साधना करी, मरने के समय योग से चला गया हो सो स्वर्ग के भोग भोग कर ब्राह्मण, क्षत्रिय द्रव्यमान के घर जन्म लेता है, फिर योग की साधना तिस के मन ऐसे जाग उठती है, जैसे कोई कार्य करते-करते सो जावे जब वह जागता है तब वही कार्य करने लगता है, इस भांति जिनके मन में योग उपज आता है, तब मेरे योग साथ जुड़ के मेरे परमानंद अविनाशी पद में प्राप्त होता है यह तो जिसने थोड़े दिन साधना की थी और मरने के समय उसका मन योग से चला गया तिसका वृतांत है। अब जिसने बहुत दिन योग साधना की हो और मरने के समय मन चलायमान नहीं हुआ, उसका वृतांत सुन- वह योगी भी स्वर्ग के भोग भोगकर फिर मनुष्य जन्म पावे, तो बड़े बुद्धिमान मेरी महिमा जानने हारे योगी के घर पावे है। अति दुर्लभ से दुर्लभ है वहां जन्म लेकर जो कुछ पूर्व जन्म योग अभ्यास किया था सो यतन से बिना ही उसका अभ्यास हो जाता है, जैसे पिछले जन्म उसको बुद्धि थी सो उसको वही बुद्धि प्राप्त होनी है सो हे कुन्ति नंदन योग का अभ्यास उससे जाग उठे हैं वह योगी शब्द ब्रह्मा जो वेदों का तत्व है सो उसमें मेरी महिमा को जानने लगा तो पारग्रामी हुआ और यतन बिना ही मेरे साथ जुड़ जाता है। पापों को काटकर मेरे योग की साधना को प्राप्त होता है। अर्जुन! इस योग मार्ग की सिद्धि एक जन्म में नहीं होती। अनेक जन्म बहुत बार योग करता आवे तब मेरे परमगति परमपद अविनाशी धाम को प्राप्त होता है। अब अर्जुन योगी भी तीन प्रकार के होते हैं एक तपयोगी है सो उनकी वार्ता सताहरवें अध्याय में कहूंगा। एक ज्ञान योगी है, एक कर्म योगी है, मेरी पूजा करने हारे, तप योगी से ज्ञान योगी अधिक श्रेष्ठ है, तिसकी बात सुन- जिस योगी की आत्मा मेरी प्रीति साथ मेरे में मगन हुई और नित्य ही श्रद्धा से मेरी पूजा करता और स्वास-स्वास श्रद्धा से मेरा स्मरण भजन करता है तो सब योगियों से श्रेष्ठ है, उससे अधिक मुझे कोई प्यारा नहीं।

इति श्री मद् भगवद् गीता सुपनिषद सुब्रम्ह विद्या योग शास्त्रे श्री कृष्ण अर्जुन सम्बादे आत्मसंयम योगो नाम षटो अध्याय।।

★★★★ अथ छटे अध्याय का महात्म्य ★★★★

श्री भगवानोवाच- हे लक्ष्मी! छठे अध्याय का महात्म्य सुन- गोदावरी के तट पर एक नगर था, वहां एक जान श्रुति राजा बड़ा धर्मज्ञ था। धर्म अर्थ, काम मोक्ष का साधक था, तिसकी प्रजा भी धर्मज्ञ थी, लोग राजा की स्तुति करते थे। एक दिन उस नगर में हंस उड़ते-उड़ते आ गए उनमें से एक हंस बैठता ही उतावला हो उड़ गया तब नगर के पंडितों ने कहा- हे हंस! तू ऐसा उतावला हो उड़ा है क्या तू राजा जान श्रुति से आगे ही स्वर्ग को जाना चाहता है ? तब उन हंसो के सरदार ने कहा हमारे राजा से भी एक रैयक मुनि ऋषिवर श्रेष्ठ है, वह बैकुंठ का अधिकारी होवेगा, बैकुंठ लोक स्वर्ग से ऊंचा है। जब वह वार्ता राजा ने श्रवण की तब मन में विचार करें कि मेरे से उनका पुण्य बड़ा होवेगा। जिसकी हंस स्तुति करते हैं, विचार कर कहा उसका दर्शन करिये। राजा ने सारथी से रथ मंगवा कर सवारी करी, प्रथम बनारस श्री काशी जी में जाकर गंगा में स्नान किया, दान किया, शिव जी महाराज का दर्शन किया। फिर लोगों से पूछा यहां कोई रैयक मुनि भी है ? लोगों ने कहा नहीं। तब राजा दक्षिण देश को गया द्वारकानाथ को पधारा, यहां स्नान ध्यान कर दान किया। लोगों से पूछा यहां कोई रैयक मुनि है ? उन्होंने कहा नहीं। तब राजा पश्चिम दिशा को गया जहां-जहाँ तीर्थों पर गया तहाँ-तहाँ जाकर दान स्नान करके रैयक मुनि को पूछता, फिर राजा उत्तर दिशा को गया। बद्रीनाथ जी को पधारा, वहां से राजा का रथ आगे ना चला। तब राजा ने कहा मैंने सकल धरती की प्रदक्षिणा करी है, किसी स्थान पर रथ नही अटका यहां रथ अटका है। यहां कोई पुण्य आत्मा रहता है तिसके तेज से मेरा रथ नहीं चलता। तब राजा रथ से उतरकर आगे चला, देखा तो एक पर्वत की कन्द्रा में अतीत बैठा उसके तेज से बहुत प्रकाश हो रहा है, जैसे सूर्य की किरणें होती हैं। तब राजा ने देखते ही कहा यह रैयक मुनि होगा। राजा ने दंडवत कर चरण वंदना करी, हाथ जोड़कर स्तुति करी, हे गुसाई जी! आपके दर्शन कर मेरा कल्याण हुआ। आज मेरा जन्म सफल हुआ। आज मैं कृतार्थ हुआ हूं। तब रैयक मुनि ने राजा का आदर किया और कहा हे पृथ्वीपति! तू चार धाम के करने हारा, धर्म के साधन हारा है, तू पुण्यात्मा है। सत्कार सहित राजा को अपने पास बिठा लिया। तब कंदमूल मंगवाकर राजा को दिया। राजा ने मुनि से पूछा आप का तेज किस के बल से है ? तब मुनि ने कहा हे राजा! अतीत जटाधारी भस्कानगी को पनधारी हूं पुण्य क्या करना था। माया मेरे पास नहीं, पर हमारे यहां एक बात है नित्य गीता जी के छठे अध्याय का पाठ करता हूं, इस कन्द्रा मे उसी का उजाला है। यह सुनकर राजा ने अपने पुत्र को बुलाकर कहा- हे पुत्र! आज से तू राज्य कर, मैं तीर्थ को जाता हूं। इतना कहकर राजा ने राज त्याग दिया। रैयक मुनि से गीता के छटे अध्याय का पाठ करना आरंभ किया। इस पाठ के प्रताप से राजा त्रिकालदर्शी हुआ। इस प्रकार वन में कई वर्ष बीत गए। एक दिन प्राणायाम करके दोनों ने देह त्याग किया, दोनों ही बैकुंठ गए। श्री नारायण जी कहते हैं हे लक्ष्मी! यह गीता जी के छटे अध्याय का महात्म्य है सो तूने सुना है।

इति श्री पदम् पुराणे सति ईश्वर सम्बादे उतरा खण्ड गीता महात्म्यनाम षष्टो अध्याय सम्पूर्ण् ।।

Geeta Part-5

श्री कृष्णाय नमः

★★★★ अथ पाचवें अध्याय प्रारम्भते ★★★★
सन्यास योग

अर्जुनोवाच- अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण से प्रश्न किया कि हे….

समदर्शी के रूप की कहता हूं पहिचान।
हे कौन्तेय सुन ध्यान से सुनो लगाकर कान।।
ब्राह्मण गैया शवान में देखे मेरा रूप।
हाथी और विद्वान सम सम निर्बल और भूप।।
मूड़ चतुर सब जानते बेजर सब धनवान।
ऐसा समदर्शी पुरुष मोको अति प्रिय मान।।
इमि पंचम अध्याय में कहते हैं है भगवान।
योग और समदर्शिता सम पांडव तू जान।।

…. श्री कृष्ण भगवान जी कर्मों का त्याग सन्यास और कर्म योग निश्चय कर कहो जिससे मेरा कल्याण होवे। अर्जुन के प्रश्न का उत्तर श्री कृष्ण भगवान जी देते हैं। श्रीभगवानोवाच – इसमें सन्यास के योग, कर्म योग यह दोनों कल्याण के दाता हैं, इसमें सन्यास के निमित्त जो कर्म त्यागना सो उचित नहीं। कर्म करना अर्थात कर्म योग भला है और जो प्राणी ज्ञान की ऐसी बात को समझने हारा है, वह सन्यासी है और सो कैसा है जो सब बातों में हर्ष शौक से रहित है। हे महाभाव अर्जुन! ऐसा जो निरद्वन्द है जो सुखैन ही संसार के बन्धनों से मुक्त होता है अब अर्जुन और सुन- सांख्य और योग को भिन्न-भिन्न अज्ञानी कहते हैं, पंडित नहीं कहते, योग अर्थात मेरा ज्ञानगोष्ठ कथा वार्ता करनी सो यह दोनों एक ही हैं और इन दोनों का फल भी एक ही है जिससे मेरे परम स्थान की सांख्य वाला पाता है उसी स्थान को योगी भी प्राप्त होता है जिन्होंने सांख्य और योग एक ही कर जाना है उन्होंने यथार्थ जाना है। हे अर्जुन! सन्यास जो संसार के सभी कर्म देह और मन से त्यागना इनका नाम सन्यास है। हे महाबाहु अर्जुन! यह सन्यास पाना ब्रह्म योग में जुड़े बिना कठिन है, जब स्मरण साथ जुड़ता है तब सुखैन ही संसार के सुखों की बात भूल जाता है इसका नाम सन्यास है। स्मरण योग साथ जुड़े, ऐसा मुनीश्वर जो है सो तत्काल ही पारब्रह्म को आ प्राप्त होता है ऐसा जो प्राणी योग साथ जुड़ा है और निष्काम निर्मल है आत्मा जिसकी संसार की वासना से निवारिया है, आत्मा और समस्त इंद्रियों को जिसने पकड़ रखी है और सब भूत प्राणियों में एक ही आत्मा ब्रह्म दृष्ट आती है, ऐसा जो प्राणी है सो कर्म करता भी अकर्ता है। जो यह समझे की जो आत्मा है जो कुछ नहीं करता, नेत्र देखते हैं, श्रवण सुनते हैं, स्पर्श देह करे हैं, नासिका ससूंघती है, स्वाद जिव्हा लेती है, स्वास पवन से आवे जावे हैं, हाथ पकड़ते हैं, छोड़ते हैं, चलते हैं निमिख नेत्रों के लखते हैं, सोती जागती देह हैं। जो इस प्रकार समझे कि यह सब इंद्रियां अपने अपने विषयों को वरतती है मैं जो आत्माराम हूं सो अकर्ता हूं इस सबसे न्यारा हूं इस भांति आत्मा को जो समझे और इंद्रियों से कर्म करें। उस पुरुष को किसी कर्म किए का दोष नहीं, जैसे जल विखे कमल निरलेप न्यारा है वैसे ही वह पुरुष भी भावना से न्यारा है हे अर्जुन! जो योगीश्वर पुरुष है सो देह मन और इंद्रियों से सत्य कर्म जो स्नान आदि है सो करते हैं और फल कुछ वांछते नहीं, उसका फल निश्चल शांति पाते हैं और जो कामना के निमितत करते हैं सो बंधन को प्राप्त होते हैं। अब अर्जुन सदा सुखी कौन है ? तिसकी बात सुन- जो प्राण आत्मा साथ जुड़ा है और किसी इंद्रियों का उधम नहीं उठाता सो सदा सुखी है, अब अर्जुन मेरी बात सुन कि मैं कैसा हूं। मैं संसार को उपजाता हूं और प्रतिपालन भी मैं ही करता हूं और मैं ही इसका नाश भी करता हूं, मेरी माया का यह स्वभाव है। यह संसार माया का खेल है और मुझको इस संसार से कुछ प्रयोजन नहीं, ना मैं किसी से पाप कराता हूं न पुण्य कराता हूं, अज्ञानी जीव मोहित हुए हैं और पाप करते हैं। और जो मुझ ईश्वर को न्यारा निर्लेप समझते हैं तिनको कभी अज्ञान नहीं उपजता। जैसे सूर्य को अंधकार नहीं वैसे ही ज्ञानी निरलेप हैं। सो कैसा हैं ?….

निश्चलनिज कर सोय।
अब किलविषे उत्तरे ज्ञान का बौढ़ जन्म न होय।।
अति अडोल और चेतना सब जाने प्रभु सोय।
सबसे वरते सो प्रभु सबसे न्यारा सोय।।
ध्यान रूप गुरु ज्ञान कर अवर न पेखहु कोय।
मनुआ निश्चल बुद्धि थिर आपे आपसु होय।।
स्वास स्वास स्मृत हरो आत्माराम सुचित।
शरण एक ही पकड़ तू दृढ़ चित राखो मीत।।
तन धन तुमरा तू ही मोह नही और सब तोय।
ऐसा निश्चल दृढ़ कर विघ्न न लागे कोय।।

… मुझको न्यारा निरलेप जाने और मेरे विखे के परम प्रीत रहे, मेरी ही शरण रहे और स्वास स्वास मेरा भजन स्मरण करें। ऐसा मुझको जानकर जो मेरा भजन करता है, हे अर्जुन! जो ऐसा जानने वाला है सो मेरे परमानंद अविनाशी पद में जा प्राप्त होता है वहां गए से गिरता नहीं, सो पूर्ण ज्ञानी है अब ब्राह्मण कैसा है सो सुन- जन्म से ऊंचा या ब्राह्मण के घर का जन्म और विद्या से पूर्ण होय उसका जन्म ब्राह्मण के घर से भी न हो व सबसे नम्रता रखें, जिसको साधु ब्राह्मण और गौ, हाथी, शवान अर्थात कुत्ता और चांडाल ऊंच-नीच सब एक ही समान है ऐसा समदृष्टि पंडित कहलाता है वह जन्म मरण के बंधन से मुक्त हुआ और आत्मा ब्रह्म जो सब विखे निरलेप जानता है। ऐसी जिसको ब्रह्म दृष्टि आयी है जो भली वस्तु पाए कर प्रसन्न नहीं होता और बुरी वस्तु पाय से बुरा नहीं मानता ऐसा जो स्थिर बुद्धि ज्ञानी ब्रह्म को जानने वाला है जिसके हृदय में कुछ अज्ञान नहीं रहा बाहर की इंद्रियों के सुख वह भूल गया है और आत्मा के सुख में जो मगन हुआ है हे कुन्तिनंदन अर्जुन! जिसका आत्मा ब्रह्म योग साथ जुड़ा है उसने ही अविनाशी सुख पाया है और भोगों का सुख अंतवत है सो विषय-भोगों को त्याग के आत्मा का सुख भोगते हैं इंद्रियों के भोगों विषय नहीं रमते। और इंद्रियों के भोगों की और नही आते इंद्रियों के भोग दुखों को उपजाने हारे हैं। जिसका आगे जन्म नहीं तिनकी बात सुन- जैसे बटलोही से एक दाना निकाल देते हैं यदि वह गला है तो सभी दाने गले हैं जो एक कच्चा है तो सभी कच्चे हैं इस प्रकार जिस ज्ञानी को काम क्रोध नहीं उपजता तिस का फिर जन्म नहीं, जिसने काम क्रोध दोनों शत्र जीते हैं उसने ही योग की युक्ति जानी है और सो ही मनुष्य संसार विषे सुखी है उसको क्यों नहीं काम क्रोध उपजता यह बात सुन- आत्मा जो है ज्योति स्वरूप है। आत्मा साथ जुड़ने का जो निर्वाण सुख है और उस निर्वाण सुख विषे जाय मग्न हुआ है इस कारण से उसको काम क्रोध नहीं उपजते। सो आत्मा ब्रम्ह निर्वाण सुख को प्राप्त हुआ है उसके पाप मिट गए हैं और दूसरी दृष्टि तिस पुरुष की दूर हुई है। सो समदर्शी हुआ है और उसकी प्रीति सब भूत प्राणियों के कल्याण विखे हैं और शीतल स्वभाव है और काम क्रोध उसे नहीं व्यापते, वह ज्योति स्वरूप ब्रम्ह निर्माण सुख में मगन हुआ है अब जो देह साथ होते हुए मुक्ति रूप है तिनकी बात सुन- जिन्होंने बाहर की इंद्रियां विषयों से वर्ज रखी है और नेत्रों से त्रिकुट का ध्यान कर और प्राण वायु ऊपर आ और समान वायु तले को इकट्ठी कर नासिका विखे लाई है और जीवन जीता है, न ही किसी वस्तु की वांछा और जिसको किसी का डर नहीं और किसी से क्रोध भी नहीं, ऐसा जो भक्त है सो जीवन मुक्त कहलाता है अब मेरी बात सुन- हे अर्जुन! कई कोट लोग योग पावने के निमित्त यज्ञ करते हैं और कई कोर्ट लोग तपस्या करते हैं और यज्ञ भी करते हैं सो उन यज्ञों और तपस्या को भोगता आप है और सब लोगों का ईश्वर और सब भूत प्राणियों का मित्र ऐसा सो प्रभु है जो कोई ऐसा जाने कि श्री कृष्ण भगवान जी ऐसे हैं, तिनके जानने का फल क्या पता है सो परम सुख को पाता है।

इति श्री मद् भगवद् गीता सुपनिषद मुब्रह्म विद्या योग शास्त्रे श्री कृष्ण अर्जुन सम्बादे सन्यास योगोनाम पंचमो अध्याय।।

★★★★ अथ पाचवें अध्याय का महात्म्य ★★★★

श्री भगवानोवाच- हे लक्ष्मी! अब पांचवें अध्याय का महात्म्य सुन- एक पिंगला नाम का ब्राह्मण अपने धर्म से भ्रष्ट हो गया था। ठीक है वह कुसंग में जा बैठा, मछली मांस खाता, मदिरापान करता, जुआ खेलता, तब उस ब्राह्मण को भाईचारे में से अलग कर दिया गया तब वह किसी और नगर में चला गया। देव योग से वह पिंगला एक राजा के घर नौकर जा लगा, राजा के पास और लोगों की चुगलियां किया करता, जब बहुत दिन बीते तब वह धनवान हो गया तब उसने अपना विवाह कर लिया, पर स्त्री व्यभिचारणी आई, जैसा वह था वैसी स्त्री आई जो कुछ ब्राह्मण कहे सो वह न करें ब्राह्मण कहे तू बाहर न जा वह रुके नहीं, जहां उसका जी चाहे वह जावे, वह भर्ता को कुछ ना समझे वह सोचता और स्त्री को मारता एक दिन स्त्री को बड़ी मार पड़ी, स्त्री ने दुखी होकर भर्ता को विष दे दिया। वह ब्राह्मण मर गया और उसने गिद्ध का जन्म पाया, कुछ काल व्यतीत पीछे वह स्त्री भी मर गई उसने तो तोती का जन्म पाया, तब वह एक तोते की स्त्री हुई। वह तोता एक वन में रहता था एक दिन उस तोती ने तोते से पूछा, हे तोते तूने तोते का जन्म क्यों पाया ? तब उस तोते ने कहा, हे तोती! मैं पिछले जन्म की वार्ता कहता हूं मैं पिछले जन्म में ब्राह्मण था अपने गुरु की आज्ञा नहीं मानता था। मेरा गुरू बड़ा ही विद्वान था, उसके पास और विद्यार्थी भी रहते थे जब गुरु जी किसी और विद्यार्थी को पढ़ाते हैं मैं उनकी बात में बोल पड़ता, कहीं बार हटका, मैं नहीं माना, मुझको गुरु जी ने शाप दिया तू तोते का जन्म पावेगा, इस कारण से मैंने तोते का जन्म पाया अब तुम कहो किस कारण से तू तोती हुई ? उसने कहा मैं पिछले जन्म में ब्राह्मणी थी, जब ब्याही गई तब भर्ता की आज्ञा नहीं मानती थी, भर्ता ने मुझे मारा। एक दिन मैंने भर्ता को विष दे दिया वह मर गया। तब मेरी देह छुटी, तब बड़े नर्क में मुझे गिराया। कई नरक भोगकर अब मुझे तोती का जन्म मिला। तोते ने सुन कर कहा तू बुरी है जिसने अपने भर्ता को विष दिया। तोती ने कहा नर्कों के दुख भी मैंने ही सहे हैं अब तो तुझे भर्ता जानती हूं एक दिन वह तोती वन में गई हुई थी वह गिद्ध भी वहाँ आ गया। तोती को उस गिद्ध ने पहचान लिया कि यह तो वही मेरी भर्य्या है जिसने मुझे विष दिया था। वह गिद्ध तोती को मारने चला आगे तोती पीछे गिद्ध, जाते-जाते तोती एक श्मसान भूमि में थक कर गिर पड़ी वहां एक साधु को दाह किया हुआ था, उस साधु की खोपड़ी वर्षा के जल के साथ भरी पड़ी थी वह उसमें जा गिरी इतने में गिद्ध आया उस तोती को मरने लगा। उस खोपड़ी के जल साथ उसकी देह धोई गयी साथ मे गिद्ध की भी, वह आपस में लड़ते लड़ते मर गए। अधम देह से छूटकर देवदेहि पाई, आकाश से विमान आए, उन पर बैठकर दोनों बैकुंठ को गए तब तोती ने कहा हे गिद्ध ऐसा कौन पुण्य किया जो बैकुंठ को चले हैं। गिद्ध ने कहा हमने तो जन्म में कोई पुण्य नहीं किया मैं इस पुण्य को नहीं जानता। इतने में दोनों धर्मराज की पुरी में पहुँचे । धर्मराज ने कहा क्यों रे गिद्ध तुझे पता है तू क्यो बैकुण्ठ को चला है उसने कहा- नही धर्मराज जी! बस मै अपना पिछला जन्म जानता हूं कि पिछले जन्म मैं ब्राह्मण था मुझे अपने भाइयों ने देश निकाला दिया था। तब मैं और देश में जा बसा। वहां मैंने विवाह किया। दुराचारिणी स्त्री मिली उसने मुझे विष देकर मारा और यह मर तोती हुई मैं गिद्ध हुआ। मैं इसको पहचान कर मरने लगा तब यह उड़ती उड़ती थक गई और श्मसान मे जा गिरी। वहां श्मशान में एक मनुष्य की खोपड़ी जल के साथ भरी हुई थी उसमें तोती गिरी मैं भी वहां पहुंचा। लड़ते लड़ते उस खोपड़ी का जल दोनों के को स्पर्श हुआ। तत्काल हमारी देह छूट देव देही पाई और हम दोनों को बैकुंठ चले हैं, और कोई कौतुक हमको कुछ मालूम नहीं हुआ। तब धर्मराज ने कहा यह खोपड़ी साधु की थी। वह श्री गंगा जी में स्नान करके नित्य श्री गीता जी के पांचवें अध्याय का पाठ किया करता था। वह खोपड़ी परम पवित्र थी। उसके स्पर्श से तुम वैकुंठवासी हुए हो और पार्षदों को धर्मराज ने आज्ञा दी कि जो प्राणी श्री गंगा जी का स्नान करके गीता का पाठ करते हैं तिन को मेरे पूछे बिना बैकुंठ को ले जाया करो, जो संतों की सेवा करते हैं तिनको भी बैकुंठ को ले जाया करो। तब पार्षद दोनों को बैकुंठ ले गया। श्री नारायण जी ने कहा हे लक्ष्मी! यह गीता जी के पांचवें अध्याय का महत्व है जो तूने श्रवण किया है।

इति पदम् पुराणे सतिईश्वर सम्बादे उतरा खण्ड गीता महात्म्य नाम पांचवाँ अध्याय सम्पूर्ण।।

Geeta Part-4

श्री कृष्णाय नमः

★★★★ अथ चौथा अध्याय प्रारम्भते ★★★★

श्री भगवानोवाच-
श्री कृष्ण भगवान जी अर्जुन को कहते हैं। हे अर्जुन यह तो तुम को ज्ञान का उपदेश किया है जो पहले मैंने सूर्य को कहा था सो यह योग अविनाशी है। सूर्य ने अपने पुत्र मनु को कहा फिर मनु ने इक्ष्वाकु को कहा था। यह ज्ञान योग परंपरा पुरातन से चला आया है इसको राज ऋषि जानते हैं। इसको समझकर राज करते हुए भी परमपद को प्राप्त होते हैं

आवत हर्ष उपजई ,जावत शौक न होय।
ऐसी करनी जो रहे ग्रह वन योगी सोय।

हे परंतप अर्जुन योग को चिरकाल व्यतीत हो गया। अब पुरातन….

हे अर्जुन! संसार में है योग सदा प्रधान।
योग नष्ठ जब होत है प्रकट तब भगवान।।
योग मुझे प्यारा अधिक योगी मेरा मीत।
जिसका सुख दुख समसदा तुल्य धाम व शीत।।
कुन्ती सत योगी बनो तब होगा निस्तार।
सबसे योगी प्रिय मुझे और योग से प्यार।।
मुक्त होत योगी सदा जिसे न फल की आश।
उस योगी के टूटे हे पांडव! सब पाश।।

…. पुरातन हो गया संसार में नष्ट हो कर मिट गया है। अब वही पुरातन योग तेरे पति कहता हूं। यह योग वार्ता तेरे प्रति इसलिए कहता हूं कि तू मेरा भक्त है और मेरा सखा है सो चित एकाग्र करके सुन, आई वस्तु का हर्ष ना कर चली जावे उसका शौक न कर, एक ही जैसा जान हर्ष शोक से अलग हो चित्त को स्थिर रख। अर्जुनोवाच-
अर्जुन श्री कृष्ण भगवान जी के वचन सुनकर प्रशन करता है। हे महाप्रभु! तुम्हारा जन्म तो अब वसुदेव के घर हुआ है और सूर्य पुरातन है आगे को प्रकट हुआ है तुमने कब सूर्य को यह ज्ञान दिया था सो कृपा कर मुझको समझाओ अर्जुन के प्रश्न का उत्तर श्री कृष्ण भगवान जी कहते हैं श्री भगवानोवाच-
हे अर्जुन तेरे और मेरे बहुत जन्म व्यतीत हुए। सो मैं उन सब जन्मों को जानता हूं, तू नहीं जानता। मैं जन्म से रहित हूं, अविनाशी हूं, आत्मा हूं, समस्त भूत प्राणियों का ईश्वर हूं। प्रभु हूं! अपनी माया के पीछे होकर जन्म भी लेता हूं, माया का पीछा क्या कहिए- जैसे कोई राजा अपने राज वस्त्र उतार कर और अन्य वेश करने से लोगों द्वारा पहचाना नहीं जाता इस भांति मैं देह धर कर संसार में आया हूं, हे अर्जुन! मैं देहधारी नहीं देह से परे हूं, मेरा देह स्वरुप है जैसे मिश्री की झारी हो जिसमें मिश्री का शरबत भी घोला हुआ हो तैसे मेरी देह और आत्मा एक ही स्वरूप है। हे अर्जुन! मैं कब और किस निमित जन्म लेता हूं! सो सुन जब जब धर्म में ग्लानि होती है अधर्म उठकर धर्म के मार्ग को अछादिता है तब तब मैं प्रकट होता हूं। संतों की रक्षा और दुष्कृत अर्थात पापियों का नाश करने निमित्त धर्म को बढ़ाने के निमित मैं युग युग में अवतार धारण करता हूं आप जो दिव्य मेरे जन्म और कर्म हैं तिनको जान सो दिव्या क्या कहिए- जैसे और देहधारी रक्त बिंदु से उपजते हैं तैसे मेरी देह नहीं। जैसे और जीव कर्मों के बन्धन से बन्धे अर्थात कर्मों के अनुसार देह पावें है हे अर्जुन! मैं ऐसे जन्म नहीं लेता। मेरा जन्म स्वच्छ है अपनी इच्छा से प्रगट होता हूं। मेरे ऐसे जन्म दिव्य ज्योति रूप हैं और मेरे कर्म भी ऐसे दिव्य हैं जो मैं करता हूं सो किसी से करें नहीं जाते। जो मन की चितावनी से भी नहीं किए जाये उनका वृतांत सुन- प्रह्लाद भक्त की रक्षा हेतु नरसिंह रूप होकर, स्तंभ से निकलकर प्रकट हुआ तो किसी ने जाना भी नहीं हिरण्यकश्यप की छाती वज्र से भी कठोर थी सो कोमल घास की न्याई नखों से विदीर्ण करके फाड़ डाली। और गोकुल के भक्तों की रक्षा निमित्त सात दिन गोवर्धन पर्वत एक हाथ की नन्हीं उंगली पर धारण किया और जो मैंने अनेक कर्म किए हैं सो दिव्य ही किये है जो मनुष्य मेरे यह दिव्य जन्म और कर्म जाने। हे अर्जुन! जो मनुष्य देह को त्याग कर मेरे परमानंद अविनाशी पद में जा प्राप्त होता है फिर जन्म मरण के बन्धन में नहीं आता तब अर्जुन! जिसको मेरे चरणारबिंद की भक्ति उपजी है उसकी बात सुन- जो बहुत जन्म वैरागी होकर, निर्भय और क्रोध रहित होकर और मन का चेता मेरे विखे रख कर मेरी उपासना करता रहा हो इन साधनों से जिसका मन पवित्र हुआ उसको मेरी भक्ति उपजी है, जिनको प्रेम भक्ति उपजी है हे अर्जुन! मैं उनके रोम रोम में निवास करता हूं। अब अर्जुन और सुन जिस प्रकार कोई मेरा भजन स्मरण करता है उसी प्रकार मैं उसका भजन स्मरण करता हूं और सब मनुष्य ही जिस प्रकार से मैंने लगाये हैं तैसे ही वह लग रहे अर्थार्त कार्य कर रहे है। अब और सुन- मैं अपने भक्तों के साथ ऐसा हूं जिस प्रकार मेरे भक्त मेरे साथ है और जो तू कहे सभी मनुष्य तुम्हारा भजन क्यों नहीं करते, देवता की उपासना क्यों करते हैं उनकी बात सुन- देवता की उपासना करके मनुष्य फल मांगते हैं कि मुझे पुत्र मिले, धन मिले देवता तिनकी कामना पूरी करते हैं, सो देवता थोड़े यतन किये प्रसन्न होते हैं, इसलिए वह देवता की उपासना करते हैं और मेरे में तो उस पुरुष की श्रद्धा लगती है जिसके नेत्र ज्ञान रूपी देवी से खुले हुए हैं जिस को ओर सब कुछ देह प्रपंच झूठा ही दृष्ट आता है और मेरे को ही सर्वव्यापक सत्य रूप जाने तिसकी श्रद्धा मेरी उपासना में लगी है। अब अर्जुन! यह जो चारों वर्ण ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र है। जो मैंने ही उपजाए हैं और इनका भिन्न-भिन्न अपने-अपने कर्म मैंने कहे हैं। इन चारों वर्णों से इनके कर्मों का कर्ता अकर्ता मुझको जान, पर मुझे किसी कर्म किये का लेप नहीं लगता। तेरा कर्म युद्ध करना है तू इसे कर मेरी तरह तू भी निर्लेप रहेगा मुक्ति की वांछा करने वाले सब मेरी आज्ञा मानकर कर्म करते रहे हैं

सत्कर्मों की भावना, करते सदा सदीव।
कर्म पंथ निहकर्म होए, मुक्ति प्राप्त थीव।।
यह बात तुझको कहो युद्ध तुम्हारा धर्म।
पंडित भेद न पाव ही क्या अकर्म क्या कम।।
सुरते सूरत ना कर सके, औरों की क्या बात।
सोई कर्म तुझको कहूं मान लेहूं ए बात।।
जिन जाने से दुख हरे बन्धन होय खलास।
गूढ़ कथा तुझको कहूं तुम सुनो ब्रह्म के दास।।

हे अर्जुन एक तो कर्म है एक विकर्म है एक अकर्म है उनकी बात सुन- जिस भांति शास्त्र की आज्ञा है उस भांति स्नान से आदि लेकर कर्म करने को कर्म कहते हैं और जो भूले से पाप कर्म करें उनको विकर्म कहते हैं और जो आलस्य या अज्ञान से स्नान आदि सब कर्मों का त्याग कर देना है सो अकर्म कहावें हैं जो पुरुष इन तीन ही कर्मों को समझ कर जो शास्त्र की आज्ञा है त्यों करे वह बुद्धिमान पुरुष श्रेष्ठ सत्कर्मी कहावे है यह तो कर्म करने की बात कही है अब और जो कोई मनुष्य ऐसा है जिसको मेरी महिमा के जानने का ज्ञान उपजा है, उस ज्ञान से उनको किसी कर्म का आरम्भ नहीं उपजता, काम क्रोध से रहित हुआ है। ज्ञान अग्नि से जिसके सब काम जल गए हैं, ऐसा जो होवे तिसको विवेकी पुरुष पंडित कहते हैं। फिर कैसा है वह ज्ञानी पंडित जिसने सभी ही कर्म त्यागे हैं और कर्मों के फल भी त्यागे हैं जो पुरुष ज्ञान रूपी अमृत पान कर तृप्त रहता है, ऐसा जो प्राणी होवे उस पुरुष का किसी कर्म किए का लेप नहीं, निर्लेप है। किसी कर्म का बंधन नहीं, निर्बंधन है। फिर कैसा है जो एक परमेश्वर बिना किसी को मानता नहीं, किसी की आशा नहीं करता, निराशा है। संसार की वासना जिसने न रखी है जिसने चित और आत्मा को एकाग्र कर लिया जिसे किसी और वस्तु की याचना नहीं। जो सदा ही एकांत और अकल्प रूप है शरीर की रक्षा के निमित्त जो कर्म करे सो उनको तिन कर्मों का कुछ पाप नहीं, फिर कैसा है जो ईश्वर इच्छा से भोजन छादन आ प्राप्त होवें उसी पर संतुष्ट रहें। शीत, उषण, हर्ष, शोक से रहित है और किसी से जिसको द्वेष नहीं और भली बुरी वस्तु पाने पर एक जैसा है ऐसा जो है सो निर्बंधन कहावे है। फिर कैसा है, दूसरे का जिसको संग नहीं ऐसा जो प्राणी है सो मुक्त रूप है और जिसका चित मेरी महिमा के ज्ञान में सदा निश्चल है जिसके जितने कर्म थे वह सभी ज्ञान के समुद्र में डूब गए हैं और जिसको सर्वत्र ब्रह्म दृष्टि आयी है जहां-कहां, लेन-देन, खान-पान, पहनना, देखना, सुनना, उपजना, विनाश आदि में जिसको ब्रम्ह दृष्ट आए सो प्राणी ब्रह्म रूप है वह पुरुष भ्रम से उपज कर ब्रम्ह में लीन हुआ। ऐसी समाधि जिस पुरुष को प्राप्त हुई वह प्राणी ब्रम्ह ही कहावे है। अर्जुन बहुत प्रकार के योग सुन- जिस-जिस योग के मार्ग से मेरे भक्त मुझे पूजते हैं सो सुन- एक तो ब्रम्ह ज्ञान योग से मुझको पूजते हैं जो मैंने पीछे कहा है और एक प्राणी सब इंद्रियां, नेत्र, कर्ण आदि को मेरे स्मरण के नियमित संयम करते हैं एक तो यह योग है। और एक मौन कर-कर करते रहते हैं एक योग है। और एक सब इंद्रियों को रोक कर प्राण दसवें द्वार में रोकते हैं एक यह योग है। एक प्राणी सन्तों साधो की सेवा अन्न, वस्त्र, कर शीत, उष्णता निवारण जल अग्नि से सेवा करते हैं सो यह द्रव्य योग है। और एक तप योग है सो तप के प्रकार सताहरवें अध्याय में कहूंगा और एक यज्ञ योग है जो मेरे साथ जुड़ा रहना और मेरी महिमा करना एक यह योग है। महिमा अर्थात वेद पढ़ने, शास्त्र पढ़ने, विष्णुपदे गावने, मेरे नाम का कीर्तन करना राम, कृष्ण, गोविंदहरि, नारायण, परमानन्द, अच्युत अविनाशी करुणाकर इत्यादि नाम जपने वाले नरक से बच जाते हैं, हे अर्जुन! श्रद्धा ही यज्ञ करावे है। हे अर्जुन! जो मनुष्य एकांतवासी होकर अपने मन में ही मेरी महिमा करते हैं तिसको भी किसी कर्म का लेप नहीं। हे अर्जुन ऐसा मुझको समझकर तेरा कर्म युद्ध करना है, क्योंकि तू क्षत्रिय है। सो तू अवांछी होकर युद्ध कर, यह तेरा धर्म है। तुझको भी किसी कर्म का दोष नहीं लगेगा, और सुन- जिसके जानने से मुर्ख जीव पंडित होते हैं और बड़े-बड़े पंडित भी नहीं जानते, कि क्या कथा है। सो मैं तेरे सामने कहता हूं, जिसके जाने से दुखदायक संसार बन्धन से तू मुक्त होगा। हे अर्जुन! स्तुति करने का नाम यज्ञ है एक जीव यज्ञ है और एक प्राण अपान वायु इकट्ठा कर प्राणायाम करते हैं एक यह यज्ञ है और एक एक कर्म से एक एक ग्राम घटाते हैं यह जितने प्रकार के यज्ञ कहे हैं सो सभी पापों का नाश करते हैं। इन सब यज्ञों में से जिस यज्ञ से पूजा उसी से मुझको प्राप्त होंगे, उनका जीना अमृत के समान है और मेरी कृपा से जो कुछ वह भोजन करता है वह भी अमृत है और देह त्याग कर मेरे सनातन ब्रम्ह को पावेगा। हे कुरुवंशियों में श्रेष्ठ अर्जुन ? मेरे पूजे बिना इस लोक में भी सुख नहीं पुनः परलोक की बात क्या कहिये। हे अर्जुन! यह बहुत प्रकार के यज्ञ मैंने पूर्व कहे हैं इनके जानने से तू मुक्त होगा। अब इन यज्ञों विषे जो श्रेष्ठ है सो सुन-हे परंतप पांडव! यह द्रव्य यज्ञ से आदि लेकर सभी यज्ञ मैंने कहें हैं इन समस्त यज्ञों से मेरी महिमा जाने का जो यज्ञ है सो श्रेष्ठ है और जितने और यज्ञ है सो ज्ञान पाने के निमित्त हैं और जब ज्ञान उपजे तब सभी यज्ञ उदय हो जाते हैं जैसे वृक्ष के फल लगे से फूल गिर जाते हैं। वैसे यह भी मिट जाते हैं अब जिसको मेरी महिमा का ज्ञान मेरी कृपा से होवें और वह कोई ज्ञान पाना चाहे तो क्या विधि करें, सो सुन- प्रथम तो सतगुरु की शरण आकर दोनों हाथ जोड़ नम्रता से उसके चरण कमलों को नमस्कार कर मुख से मेरा नाम लेवें, श्री राम जी, श्री कृष्ण जी, श्री गोपाल जी, ओम नमो नारायण जी, राधाकृष्ण जी, परमेश्वर की न्याई जानकर उसके अधीन होवें और विनय करें हे प्रभु जी! हे गुरुदेव जी! कृपा करो श्री भगवान के जानने का ज्ञान मुझे दान करो, ज्ञान के देने वाला जो है ज्ञानी, तिसको वह ज्ञान श्रवण करावे, हे पांडव अर्जुन! तिस ज्ञान के जानने से फिर माया मोह व्याप्त नहीं सकता। सो ज्ञान जानने से सब भूत प्राणियों मे से एक ही ज्ञान व्यापया जाएगा दूसरा भेद मिट जाएगा, सो यह ज्ञान है अब इस ज्ञान का फल सुन- जितने पाप जाने अनजाने किए हैं तिन पापों का जो फल दुख है सो तिन दुखों से ज्ञान नाव में चढ़ के पार जाएगा। जिस प्रकार लकड़ियों के अम्बारों को अग्नि जला के भस्म कर देती है, तैसे ही ज्ञान अग्नि मोह को जलाकर भस्म करती है और ज्ञान के समान दूसरा पवित्र कुछ नहीं।

इंधन झानस के किए पावक मुख में लाए।
ज्ञान वसंत प्रगट हो कर्म पाप जल जाए।।

हे अर्जुन! ज्ञान महा पवित्र है। ज्ञान समान कुछ नहीं, सो ज्ञान कब उपजता है ? मेरे योग साथ जुड़ने के प्रसाद से चिरकाल तक जो मेरे ध्यान में जुड़ा रहे तो उसको आत्मा से ज्ञान उपजता है। जिसको मेरे ज्ञान पाने की श्रद्धा हो सो सावधान होकर पढ़े, समझे, इंद्रियों को वश करें जो पुरुष ज्ञान को पावे, ज्ञान पाए से परम शांति जो परम सुख है तत्काल ही प्राप्त होवें हैं और जो अज्ञानी पुरुष हैं जिसको मेरे ज्ञान पाने की वांछा नहीं जिनके आत्मा में संयम नहीं है वह पुरुष आत्मनाश को प्राप्त होता है न उसको लोक में सुख मिलता है ना परलोक में और जो मेरे साथ जुड़े हैं उसमे कोई कर्म नहीं उठता और न ही उसको संशय व्याप सकता है, ऐसा जो योगी ज्ञानी है तिनको को कोई लालच हिला नहीं सकता, इस कारण हे अर्जुन तुझको तेरे हृदय ही अज्ञान संशय(संदेह) उपजता है सो ह्रदय ही से ज्ञान की खड़क लेकर संशय (संदेह) को काट डाल और खड़ा हो।

इति श्री मद् भगवद् गीता सुपनिषद सुब्रह्म विद्या योग शास्त्रे श्री कृष्ण अर्जुन सम्बादे कर्म योगो नाम चतुर्थ अध्याय।।

★★★ अथ चौथे अध्याय का महात्म्य ★★★

श्री भगवानोवाच हे लक्ष्मी! जो पुरुष श्री गीता जी का पाठ करते हैं तिनके के साथ छूने से भी अधम देह से छूटकर विवेकी को प्राप्त होते हैं। तब लक्ष्मी जी पूछती है हे श्री महाराज जी! श्री गीता जी के पाठ करने वाले के साथ छू कर कोई जीव मुक्त भी हुआ है ? तब श्री भगवान जी ने कहा- हे लक्ष्मी! तुमको मुक्त हुए की एक पुरातन कथा सुनाता हूं तुम श्रवण करो। भगीरथी गंगा जी के तट पर श्री काशी जी एक नगर है, वहां एक वैष्णव रहता था, श्री गंगा जी में स्नान कर श्री गीता जी के चौथे अध्याय का पाठ किया करता था और उस साधु के पास तपस्या ही धन था, माया का जंजाल कुछ नहीं था, एक दिन वह साधु वन में गया, वहां बेरी के वृक्ष थे, उनकी छाया थी। वह साधु वहां बैठ गया और बैठते ही उसको निद्रा आ गई, एक बेरी से उसके पांव लगे और दूसरी के साथ सिर लग गया, वह दोनों आपस में कांप कर पृथ्वी पर गिर पड़ी, उनके पत्ते सूख गए। परमेश्वर के करने से वह दोनों बेरियां ब्राह्मण के घर पुत्रियां हुई। हे लक्ष्मी! बड़े उग्र पुण्यों से मनुष्य दे मिलती है, फिर ब्राह्मण के घर जन्म लेकर उन दोनों लड़कियों ने तपस्या करनी आरंभ की, जब वह दोनों बड़ी हुई तब उनके पिता ने कहा पुत्रियों! हम तुम्हारा अब विवाह करते हैं वह दोनों दिखने में बहुत सुन्दर थी। तब उन दोनों ने माता-पिता से कहा हम विवाह नहीं कराती। उनको अपने पिछले जन्म की खबर थी उन्होंने कहा हमारे मन में एक कामना है यदि परमेश्वर वह पूर्ण करे तब बहुत भली बात है। उनके मन में यही था कि वह साधु जिसके स्पर्श करने से हमको अधम देह से छुट कर यह देह मिली है वह मिले तब बहुत भली बात है इतना विचार कर उन दोनों कन्याओं अपने माता-पिता से तीर्थ यात्रा करने की आज्ञा मांगी। तब माता-पिता ने तीर्थयात्रा की आज्ञा दी, तब उन दोनों कन्याओं ने माता-पिता को चरण वंदन करके गमन किया। तीर्थ यात्रा करती करती बनारस में पहुंची, वहां जाकर देखा वह तपस्वी बैठा है जिसकी कृपा से हम बेरी की देह से छुटी है, तब दोनों कन्याओं ने जा कर दंडवत करी। चरण वंदना करके विनय करी- हे संत जी! तुम धन्य हो, तुमने हमको कृतार्थ किया है। तब उस तपस्वी ने कहा तुम कौन हो ? मैं तुमको पहचानता नहीं। तब कन्याओं ने कहा हम आपको पहचानती हैं हम पिछले जन्म में बेरियों की योनि में थी, आप एक दिन वन में आयें, आपको बहुत धूप लगी थी, तब बेरियों की छाया तले आ बैठे। लंबासन होने से एक बेरी को आपके चरण लगे दूसरे को सिर लगा, उस समय हम बेरी की देह से मुक्त हुई। ब्राह्मण के घर जन्म लिया है, हम ब्राह्मणी है बड़ी सुखी है तुम्हारी कृपा से हमारी गति हुई है तब तपस्वी ने कहा- मुझे इस बात की खबर नहीं थी अब तुम आज्ञा करो तुम्हारी क्या सेवा करें ? तुम ब्रह्मरूप उत्तम जन्म भी नारायण जी का मुख हो। तब कन्याओं ने कहा हमको श्री गीता जी के चौथे अध्याय का फल दान करो जिसको पाकर हम सुखी होवें। तब उस तपस्वी ने चौथे अध्याय के पाठ का फल दिया। देते ही उनको कहा कि तुम आवागमन से छूट जावो। तभी तपस्वी कहता है मैंने नही जाना था कि गीता के चौथे अध्याय का महात्म्य ऐसा है कुछ साल बीते, उन दोनों ने देव देही पाई और बैकुण्ठ को गमन किया और तपस्वी मन वचन कर्म कर नित्यप्रति गीता का पाठ करने लगा। तब श्री नारायण जी ने कहा हे लक्ष्मी! यह चौथे अध्याय का महात्म्य है जो तुमने सुना है।

इति श्री पदम् पुराणे सति ईश्वर सम्बादे उतरा खण्ड गीता महात्म्य नाम चतुर्थी अध्याय संपूर्णम् ।।

Geeta part-3

श्री कृष्णाय नमः

★★★ अथ तीसरा अध्याय प्रारम्भते ★★★

◆◆◆ कर्म योग ◆◆◆

अर्जुनोवाच-
अर्जुन ने श्रीकृष्ण भगवान जी से प्रश्न किया। हे जनार्दन जी हे केशव जी! यदि निर्वाण पद, ब्रह्म पद सबसे श्रेष्ठ है, तब घोर भयानक कर्म यह युद्ध है इसमें मुझको क्यों जोड़ते हो! मिले हुए वचन कह कर मेरी बुद्धि क्यों मोहते हो। कहां निर्वाण पद, कहां युद्ध करना एक बात निश्चय कर करो जिससे मेरा कल्याण हो……

कर्म बिना संसार में रहि सकता नहीं कोय।
मैं भी करता कर्म हूं देख सखा तू मोय।
शुरू सृष्टि में यज्ञ की आज्ञा दी करतार।
यज्ञ कर्म का रूप है नहिं इस बिना निस्तार।
यज्ञ रूप है ब्रह्म का यह जानक धीमान।
जो नर त्यागे कर्म को सो मूर्ख नादान।
जिमि कुछ करता कर्म है न करना तिमि कर्म।
इस कारण करना बेज़र जानों मर्म।

……हो। अर्जुन के वचन सुनकर श्री कृष्ण भगवान जी बोले श्री भगवानोवाच-
हे निष्पाप अर्जुन! पहले मैंने लोगों को ज्ञान योग कहा है योग साथ जुड़े रहना कहां है कर्म योगियों को कर्म योग कहा है हे अर्जुन! जो कोई सर्व कर्म करने त्याग बैठे, कुछ आरम्भ न करें और कहे कि मैं निहकर्मी सन्यासी हूं, सो पुरुष भूलकर कहता है न वह सन्यासी है न वह निहकर्मी है। जो कोई देहधारी है एक क्षण भी निहकर्मी नही, माता के गर्भ में आने से लेकर मरने प्रयंत सदा कर्म ही करता रहता है, निहकर्मी कभी नही।

कर्म किए बिना निमषभर रहे ना प्राणी कोय।
प्रकृति भूल अवश्य गुण कर्म करावे सोय।

यह माया की रची हुई जो देह हैं सो इसके वश में नहीं माया के वश है हे अर्जुन! ऐसे योगी बैरागी जो है उनकी बात सुन। वो कैसे हैं जो बाहर की इंद्रियों संयम करके रोकते हैं और चौकड़ी मार कर बैठते हैं और मन में इंद्रियों के भोगों की चितवना करते हैं कि होवें तो खावें और पहरें, सो ऐसे योगी पाखंडी होते हैं और जो ऐसे हैं सो तिनसे भले हैं सो वो कैसे है जो बाहर इंद्रियों से काम करें हैं और मन का निश्चल चेता मेरे में रखते हैं वह श्रेष्ठ हैं। हे अर्जुन! तू क्षत्री है युद्ध करना तेरा धर्म है इंद्रियों से युद्ध कर और मन का निश्चय चेता मेरे में रख। हे अर्जुन! कर्म किए बिना देह भी नहीं रहती और क्या कहिये।

जगन्नाथ निमित्त कर्म से नेहकर्म निर्बंधनः।
लोक कर्मों हठ संदेह जन्म-जन्म वह भोगते।।

हे अर्जुन यह रूप जो भगवान का है सो मैं हूं मेरे से अलग कर्म करे है सो बंधन में पड़ते हैं इस कारण से है कुंती नंदन अर्जुन मेरी आज्ञा मानकर तू कर्म कर और फल कुछ ना वांछ। अब यज्ञ मार्ग से जगत पुरुष भगवान का जो जन पूजन करते हैं तो सुन। हे अर्जुन! जब ब्रह्मा जी ने संसार को उत्पन्न किया तो सर्व यज्ञ करने की रचना बनाई और यज्ञों की सामग्री भी उपजाई और ब्रह्मा जी ने मनुष्य को यह आज्ञा करी कि हे मनुष्यों! इन यज्ञ की सामग्री से महापुरुष भगवान को पूजो और साथ ही जो भगवान के अंग है सब देवता तिनको भी पूजो और जो कुछ तुम वांछोगे सो देवता तुमको मनवांछित फल देवेंगे सो मनुष्य देवताओं को पूजने लगे और मनुष्यों का कल्याण देवता से है।

जो भजन करहि प्राणी लाए पूजा देवता।
सो मुक्त सकल पापहि एक वचनवच कर्म यह।।
अन्त होय पूजा करहि भोजनते मनुष्य पाप करें।
क्षेत्र बड़ी मृत्य के पाप आए भोगते।।

हे अर्जुन! देवता मनुष्य को मनवांछित फल देने को सामर्थ है और मनुष्यों का कल्याण देवता से है जो कोई मनुष्य देवता को दिए बिना आप ही भोजन करता है सो देवता का चोर कहाता है और जो मनुष्य मुझ को भोग लगाकर मेरा प्रसाद जान कर अन्न भोजन करता है सो सर्व उपाधि से सुक्त है और जिस प्राणी ने मेरे समर्पण किए बिना आप ही भोजन कर लिया है, सो प्राणी सर्व पापों को भोगता है, वह कौन पाप सुन- जो जीव खेती करते हैं और उखलीया चूल्हे से बुहारी से पैरों चलते है और सोते समय इन ठोहरो में जो जीव घात होते हैं जो प्राणी मेरे स्मरपे बिना आप ही भोजन करता है। उसका पाप तिनके माथे पर होता है। हे अर्जुन! परमेश्वर के पूजने से संसार का जो कल्याण होता है सो सुन! सब शरीरधारी जो भूत प्राणी है तिनकी उत्पत्ति अन्न से है प्रथम यह पुरुष अन्न खाते हैं उससे वीर्य होता है और जो स्त्रियां अन्न खाती है तिससे रक्त उपजे हैं उस रक्त और वीर्य के संग से देह की उत्पत्ति होती है इस प्रकार अन्न से देह की उत्पत्ति होती है और अन्न उत्पत्ति मेघ से होती है मेघ यज्ञ करने से उत्पन्न होते है और यज्ञ करने की विधि वेदों से जानी जाती है और वेद पारब्रह्म विष्णु से उपजते हैं तिस कारण से सर्वव्यापक जो ब्रह्म है सो नित्य ही यज्ञ करके पूजने योग्य है जिनका पूजन किए से संसार का कल्याण होता है जो ऐसे कल्याण रूप पारब्रह्म को नहीं पूजते और अपनी इंद्रियों के लिए रसोई करते हैं तिनका जीवन निष्फल है अब जिनकी आत्मा प्रीति साथ लगी है जो आत्मा लोभी हैं और जो आत्मा के लोभ को पाकर तृप्त अघाय रहे है और जो आत्मा लोभ कर संतुष्ट भये हैं उनको किसी भले कर्म किए का फल नहीं न किए से कुछ पाप भी नहीं, किए से कुछ पुण्य भी नहीं। जो प्राणी आत्मा के लोभी हैं तिनको संसार के मनुष्य साथ कुछ प्रयोजन नहीं रहा। अब अर्जुन फिर कहता हूं सो सुन जो भले कर्म है स्नान से आदि लेकर कर्म नही त्यागने चाहिए जो सत कर्म करें और फल की वांछा न करें सो पुरुष इन सत्य कर्मों के मार्ग से पारब्रह्म को प्राप्त होते हैं अर्जुन भले कर्म जो है सो कर्म स्नान से आदि लेकर इन सत्कर्मों को करते-करते राजा विदेही से आदि लेकर बहुत मनुष्य सिद्धि अवस्था को प्राप्त हुए हैं तो भी लोगों के कल्याण के निमित्त कर्म करते ही रहे जो कर्म श्रेष्ठ मनुष्य करते हैं तिनको देखकर वही कर्म और भी करते हैं इन कारणों (कर्मो) से महानुभाव विदेह अवस्था को भए हैं तो भी सत्कर्म नहीं त्यागते क्योंकि और लोगों को सिद्ध अवस्था नहीं प्राप्त हुई यदि सत्कर्मों का त्याग करें तब लोगों के सब कर्म भ्रष्ट हो जावें, पशु-पक्षी जून की भांति मनुष्य होवेंगे, इसी कारण से महानुभाव कर्म करते रहते हैं हे अर्जुन! मुझको देख जो मुझको त्रिलोकी में किसी कर्म करने का प्रयोजन नहीं। जो कुछ मैं सत्कर्म करूंगा तो मुझको कुछ पुण्य ना होगा और अन्य किए से कुछ पाप ना होगा, पर मैं लोगों के कल्याण के निमित्त स्नान, गायत्री संध्या तर्पण करता हूं और ब्राह्मणों की गौ की, माता-पिता की सेवा करता हूं और भी शुभ कर्म करता हूं लोगों को सत्कर्म सिखाने के निमित्त और मैं जो आलस करके सत्कर्मों को त्याग बैठूं तो मुझे देखकर सभी लोग सत्कर्मों का त्याग कर बैठेंगे, हे अर्जुन! जिस मार्ग में चलता हूं वो मुझको देखकर मेरे मार्ग से समस्त मनुष्य चलते हैं और जो तू कहे कि लोगों के निमित्त यह कर्मों का जंजाल क्यों कहते हो लोगों के साथ तुम्हारा क्या प्रयोजन है इसका उत्तर सुन हे अर्जुन यह मनुष्य नारायण की मूर्ति है जब यह सभी कर्म भ्रष्ट होवें तब जैसे और पशु है तैसे ही मनुष्य भी पशुवत हो जावे तो अपनी प्रजा की हानि होने से अपनी भी हानि होगी इस निमित्त अपनी प्रजा के कल्याण के लिए सत्कर्म करता हूं और प्रयोजन मुझको कुछ नहीं, तिस कारण से हे अर्जुन! जो कोई विवेकी पुरुष हो वह चाहे सिद्ध अवस्था को भी प्राप्त हो जाए तो भी चाहिए कि लोगों के कल्याण निमित्त सत्कर्मों का त्याग न करें और अपनी बुद्धि से सिद्ध अवस्था को प्राप्त होवें और लोगों को यह भी न कहे कि सत्कर्मों के करने से कुछ लाभ नहीं, सत्कर्मों की निंदा ना करें क्योंकि सब लोग तो सिद्ध अवस्था को प्राप्त हुए नहीं और अगर सत्कर्मों का त्याग कर देवेंगें तो कर्म भ्रष्ट हो जावेंगे इसी से जो प्राणी सिद्ध अवस्था को भी प्राप्त हुए हैं तो भी वह पुरुष और संसारी लोगों को सत्कर्मों से भ्रष्ट ना करें (सिद्ध अवस्था प्राप्ति के बाद सत्कर्मों को छोड़ने को न कहे) को यह मेरी आज्ञा है सिद्धको को भी सत्कर्म करने चाहिए अब अर्जुन और सुन जिन पुरुषों के भले बुरे कर्म होते हैं सो यह देह इंद्रियों और मन माया प्रकृति से उत्पन्न हुए हैं जैसे इनके रक्त भाव है तैसा कार्य इन से होता है आत्मा साक्षीभूत है और अकर्ता है इतना समझ करें हे अर्जुन! न्यारे का निहारा रह अब अर्जुन और सुन..

भाव अभावी कर्म कर रखें हरिभुचित।
उष्ण शीत व्यापे नहीं कारण करते कित।।
आत्मा है सर्वत्र में घट घट भोगि आप।
सब में अधिकारी प्रभु तिस ही को तू जाप।।
मन रखो चरणारबिन्द त्यागो आशरा तहो अचिंत।
पेखोदर निर वासन प्रभु कीत।।
चरण कमल मन में बसे इच्छा थिरहुन काप।
चिंता ममता त्याग बुद्धि सफल यूं होय।।
यह मार्ग तुझको कहूं सुनियो तू चितलाय।
प्रीत भाव कर मोहि जपे दुख पाप सब जाए।।
जो यह कथा माने नहीं निंदा दुनिया जान।
ते अज्ञान अन्ध मत बांधे किरत कमान।।

हे अर्जुन! तू अपने सर्व कर्म मुझको अर्पण कर और जितने देहधारी आत्मा है उन सबका ठाकुर प्रभु मैं हूं। इस कारण से मेरा नाम अध्यात्मा अर्थात सब आत्मा का अधिकारी है ऐसा ईश्वर जो मैं हूं सो तू मन का निश्चल चेता मेरे में रख और निराश ना हो आशा किसी फल की न कर और चिंता ममता को त्याग कर युद्ध कर। यह मार्ग जो मैंने तुझको कहा है सो मेरे मार्ग को श्रद्धा संयुक्त मन में रखकर मुझको निरसंशय ही आ मिलेगा। और जो प्राणी इस मेरे मार्ग को मानते नहीं और निंदा करते हैं सो कैसे हैं सो सबसे अज्ञानी अन्धमत मूढ़ मूर्ख है अब अर्जुन और सुन- प्रकृति को जीव माया ने उत्पन्न किया है सभी भूत प्राणी स्वभाव के बस है अपने बस नहीं इस बात को समझ कर ना किसी को भला कहिये ना बुरा और कोई भला करे कोई बुरा सबका साक्षाभूत होकर संसार का कौतुक देख सदा आत्मपद में लीन रहे। अब अर्जुन और सुन यह असाद रूप जो इंद्रियां है तू इनके भोगों की ओर मत जा यह हर्ष शोक को जन्म देती हैं और जैसे बात मारने हारे चोर होते हैं तैसे ही इस मेरे मार्ग को मारने हारी यह इन्द्रियां चोर है तू इनके भोगों की ओर मत जा। श्री कृष्ण भगवान के वचन सुनकर अर्जुन बोला।
अर्जुनोवाच- हे यादवों के पति श्री कृष्ण भगवान जी! इस बात को सभी मनुष्य जानते हैं कि पाप किए से दुख मिलता है। हे प्रभु जी! पाप कर्म इन मनुष्य से बलकरा कौन कराता है सो मुझको कृपा कर कहो।
श्री भगवानोवाच- हे अर्जुन! काम और क्रोध की रजोगुण से उत्पत्ति है इसका आहार भी बहुत है यह कभी तृप्त नहीं होते और यह पाप रूप है मनुष्य के के यह शत्रु है। यह दोनों को बांधकर पाप कराते हैं।
अर्जुनोवाच- हे भगवान! इनका वृतांत मुझ को विस्तार पूर्वक कहो कि इनका जन्म किस प्रकार होता है और जन्म कर बड़े कैसे होते हैं और इनका आत्मा कौन है इसका आचार कैसे होता है सर्व विस्तार पूर्वक कहो। श्री कृष्ण भगवान जी बोले हे अर्जुन! यह सूक्ष्म शत्रु है और देह इंद्रियां और मन में इनका निवास है। सूक्ष्म रूप धारण कर देह विखे आ जाते है अब इनकी उत्पत्ति सुन। भले स्वाद पदार्थ खाए से, उत्तम सुगन्ध के सूंघने से और भले वस्त्र पहनने से, काम की उत्पत्ति होती है। अब क्रोध की उत्पत्ति सुन। अहंकार अभिमान करना कि मेरे जैसा दूसरा कोई नहीं। इससे क्रोध की उत्पत्ति होती है। हे अर्जुन! यह बड़े दुष्ट हैं अब इनकी करतूत सुन। पहले हर्ष प्रसन्नता से काम उपजा तब अपनी स्त्री से संग किया, जब वीर्य गिरा तब मृतक की भांति चित होकर गिर पड़ा और सो गया। फिर संतान हुई जिससे अति मोह को प्राप्त होकर अज्ञान अंधकार में अंधा हुआ। जन्म मरण का अधिकारी हुआ यह अपनी स्त्री के संग का फल है। और कदाचित परनारी के साथ प्रिति या संग किया किसी दूसरे पुरुष ने देखा तो भी खराबी, राजा के हाथ आया तो दंड देता है, धन छीन लेता है, कैद करता है, राजदंड भरना पड़ा, परलोक की शासना बहुत सहनी पड़ी। परलोक बिगड़ गया बाकी कुछ ना रहा। यह तो काम की करतूत कहीं। अब हे अर्जुन! क्रोध के लक्षण और करतूत सुन! अहंकार मन्दकर्म से अन्ध भरी जो मनुष्य की देह है विषयों के वास्ते या दूसरे किसी कारण के वास्ते किसी को मारा या कष्ट दिया तब राजा ने पकड़ कर खूब दंड दिया, बांधिया पदार्थ छीन लिया और परलोक में यम की शासना सहेगा। यह क्रोध की करतूत कहीं है हे अर्जुन! काम और क्रोध दोनों भय के दाता है बारम्बार मनुष्य को मोहते भरमाते रहते हैं फिर कैसे यह दोनों पाप रूप हैं और कपट नीच है। हे धनंजय अर्जुन! यह मनुष्य के सदा ही छिद्र देखते हैं जैसे चोर अपना समय देखता रहता है कि कब घर का स्वामी सो जावे कब मैं द्रव्य लगाऊं इसी भांति ही छिद्र देखते रहते हैं और रजोगुण से इनकी उत्पत्ति हुई है और आत्मा के मरने को सावधान है मनुष्य में यह दोनों ही उपद्रव हैं। जिस प्रकार मेरे न जानने का अज्ञान इन पर छाया है सो सुन- जैसे, धुए करके अग्नि अछादी जाए हैं ज्यों इसी भांति इन इन दोनों ने मेरा ज्ञान ढांप लिया है और नित्य ही ज्ञान के वैरी, हे कुन्तिनंदन अर्जुन! दोनों काम और मद से अपूर हैं पूर्ण कभी नहीं होते और पाप रूप हैं। इंद्रियां मन और बुद्धि इनके विषय काम का निवास है, इनमें बसकर मनुष्य को मोहित करते हैं, तिस कारण से हे कुरुवंशियों में श्रेष्ठ अर्जुन! प्रथम तू इंद्रियों के वश मे कर, इंद्रियों आदि से लेकर मन, बुद्धि चित्त को वश मे कर, यह पाप रूप हैं और ज्ञान और विज्ञान का नाश करने हारे हैं। अब जिस प्रकार इंद्रियां जीती जाए सो सुन- यह देह जड़ है इसमें जो चैतन्य रूप इंद्रियां है और इंद्रियां से परे मन है, मन से इंद्रिया सुरजीत है, मन से परे बुद्धि है बुद्धि से परे आत्मा है सो बुद्धि द्वारा उस आत्मा के साथ जुड़। हे महाबाहु अर्जुन! जो आत्मा साथ जुड़ता है उसका रूप बड़ा बलवान हो जाता है अपने बल से इस महादुष्ट काम, क्रोध को मार डाल,तिनको मारकर जय को प्राप्त हो।

इति श्री मद् भगवद् गीता सुपनिषद सुब्रह्म विद्या योग शास्त्रे श्री कृष्ण अर्जुन सम्बादे कर्म योगो नाम तृतयो अध्याय।।

★★★★ अथ तीसरे अध्याय का महात्म्य ★★★★

श्री नारायणोवाच-
हे लक्ष्मी! एक शूद्र महामूर्ख अकेला ही एक वन में रहता था बड़े अनर्थों से कितना ही द्रव्य उसने इकट्ठा किया था, किसी कारण यूं ही वह पदार्थ जाता रहा, पदार्थ के जाने से वह शूद्र बहुत चिंता मे रहता और लोगों से पूछता। कोई ऐसा कर्म बताओ जिससे यहां पृथ्वी में द्रव्य होवें तो मैं निकाल लूं, और मुझे फिर वह पदार्थ हाथ आवें, किसी को कहें कोई अंजन बताओ जिस नेत्र में पायकर पृथ्वी का पदार्थ निकालूं, किसी ने कहा मांस मदिरा खाया पिया करो वही खोटा कर्म करने लगा, चोरी करने लगा, एक दिन धन की लालसा से चोरी करने गया रास्ते में चोरों ने उसे मार दिया, इस मृत्यु से मर प्रेत जून पाई। वह एक बट के वृक्ष पर रहा करता था। बड़ा दुखी हुआ, हाय-हाय कर रुदन करता विलाप करता, ऐसे हाहाकार करता रहता कि ऐसे भी होवे मेरे कुल में जो इस अधम देह से छुड़ावे, ऐसे हाहाकार करते-करते बहुत दिन बीते। इतने में उस शूद्र की स्त्री से एक पुत्र जन्मा, जब उसका पुत्र बड़ा हुआ तो एक दिन अपनी माता से उसने पूछा, मेरा पिता क्या व्यापार करता था और देहांत किस प्रकार हुआ था ? उसकी माता ने कहा बेटा तेरे पिता के पास पदार्थ बहुत था सो यूं ही जाता रहा वह धन के चले जाने से बहुत चिंतावान रहता था। एक दिन वन को गया कि किसी का धन चुरा लाऊंगा, मार्ग में उसके साथी चोरों ने ही मार डाला। तब उसके पुत्र ने कहा माता उसकी गति कराई थी ? तब माता ने कहा- नहीं कराई। फिर पूछा हे माता उसकी गति करानी चाहिए उसकी माता ने कहा भली बात है। तब वह पंडितों से पूछने गया, जाकर बात करी हे स्वामी! मेरे पिता एक दिशा मे जा कर मृत हुआ। उसका उपाय कृपा कर कहिए जो उसका ही उद्धार होवें। तब पंडितों ने कहा तू गयाजी जाकर उसकी गति करा तब तेरे पितरों का उद्धार होगा। तब उसने आज्ञा मानकर माता की आज्ञा लेकर गयाजी को गमन किया। प्रयागराज के दर्शन स्नान करके फिर आगे को चला, रास्ते में एक वृक्ष के नीचे बैठा, वहां से उसको बड़ा भय प्राप्त हुआ, यह वही वृक्ष था जहां उसका पिता प्रेत जून में प्राप्त हुआ था उसी जगह चोरों ने उसको मारा था। तब उस बालक ने अपना गुरु मंत्र पढ़ा और एक उसका और नियम था कि वह एक अध्याय गीता जी का नित्य पाठ किया करता था, उस दिन उसने उस वृक्ष के नीचे बैठकर श्री गीता जी के तीसरे अध्याय का पाठ किया, उसके पिता ने प्रेत की जून में सुना सुनने से उसकी प्रेत देह छूट गई देव देही पाई, वह एक देवरूप में उसके सामने आया, आकर आशीर्वाद दिया और कहा हे पुत्र मैं तेरा पिता हूं जो मरकर प्रेत हुआ था इस तेरे पाठ के श्रवण करने से मेरी देवदेहि हुई अब मेरा उद्धार हुआ तेरी कृपा से स्वर्ग को जाता हूं अब तू गयाजी जाए तो अपनी खुशी से जा मेरा उद्धार हो गया है वहां जाकर तुमने मेरा उद्धार करना था जो तुमने यह पाठ मुझको सुनाया है इससे मेरा कल्याण हुआ। इतना सुनकर पुत्र ने कहा हे पिता जी कुछ और आज्ञा करो जो मैं आपकी सेवा करूं। तब उस देवदेहि ने कहा- हे पुत्र देख मेरे सात पीढ़ियों तक के पितर नरक में पड़े हैं बड़े दुखी हैं अब श्री गीता जी के तीसरे अध्याय का पाठ करके उनको फल दे, वह इस दुख से मुक्ति पावेंगे, वह तेरे बड़े हैं नर्क से निकलकर स्वर्ग में पहुंचेंगे। इतना वचन कहकर वह देवदेही पाकर स्वर्ग को गया तब उस बालक ने वहां ही तीसरे अध्याय का पाठ किया तब पितरों को पुण्य देखकर बैकुंठ गामी किया। तब राजा धर्मराज के पास यमदूतों ने जाकर कहा, हे राजा जी! नरक में तो बहुत से लोग नहीं है वहां तो उजाड़ पड़ी है जो कोई जन्मों जन्मों के पाप कर्मी थे तिनको विमानों पर बैठाकर श्री ठाकुर जी के पार्खद ले गए हैं। इतना सुनते ही धर्मराज उठकर श्री नारायण जी के पास गए, जहां पाताल में शेषनाग की शय्या पर श्री नारायण जी लेटे हुए थे और लक्ष्मी जी चरण दबा रही थी वहां जा धर्मराज ने दंडवत प्रणाम किया ओर हाथ जोड़कर कहा- हे त्रिलोकीनाथ श्री महाराज जी! जो जीव जन्म जन्मांतर के पापी थे उनको आपके पार्खद विमानों पर चढ़ाकर बैकुंठ को ले गए हैं तब नरकों के भुगाने का दंड किसको देवें और किस प्रकार दंड दिया करें- तब श्री नारायण जी ने बहुत प्रसन्न होकर कहा है धर्मराज! दुखी मत हो, तू अपने मन में कुछ बुरा न मान मैं तुझे एक वृतांत कहता हूं श्रवण कर यह जीव पापी थे इनका कोई पिछला धर्म उदय हुआ है। उस अपने धर्म से कई महापापी बैकुंठ को गए हैं और यह एक आज्ञा तुझे देता हूं जो जीव श्री गीता जी के पाठ करें अथवा श्रवण करें या कोई किसी को गीता के पाठ किए का फल दान करें उन-उन जीवो को तू कभी नरक न देना, यह तुझको मेरी आज्ञा है यह बात सत्यकर निश्चय से सुन याद रख। इतना सुनकर धर्मराज अपनी पुरी को पधारें, वहाँ आकर अपने यमदूतों को बुलाकर कहा- हे यमदूतों! जो प्राणी श्री गीता जी का पाठ श्रवण करें या पाठ किए का फल किसी को पुण्य देवे, तिस प्राणी को तुम कभी नरक में न डालना, श्री गीता जी के पाठ अथवा श्रवण किये से पापी जीव भी बैकुण्ठ को प्राप्त होंगे जो जीव श्री गीता जी का पाठ कर करें, श्रवण करें, तिसका फल कहां तक कहें। कहने में नहीं आ सकता तब श्री नारायण जी ने कहा हे लक्ष्मी यह तीसरे अध्याय का फल मैंने तेरे को कहा है जो तूने सुना है

इति श्री पदम् पुराणे सति ईश्वर सम्बादे उतरा खण्ड गीता महात्म्यनाम तृतयो अध्याय संपूर्णम।।

Geet Part-2

◆◆◆◆ श्री कृष्णाय नमः ◆◆◆◆

★★★★★ अथ दूसरा अध्याय प्रारम्भते ★★★★★

संजयोवाच- संजय धृतराष्ट्र को कहते हैं हे राजा जी! दया से भरा अर्जुन अश्रपात से पूर्ण हैं नेत्र जिसके रुदन सो करता है ऐसे विषाद से व्याकुल जो है अर्जुन, उसको श्री कृष्ण भगवान जी कहते है
श्री कृष्ण भगवानोवाच- हे अर्जुन! ऐसे विकट युद्ध के स्थान पर तुझको यह……

अर्जुन कहे श्री कृष्ण को सुनो कृष्ण भगवान।
देखा चाहूं आज मैं दोनों सेन महान दोनों सेन महान।
दोनों सेन महान वीर जो लड़ने आये।
क्या क्या तिनके नाम वीर जो लड़ने आये।
रथ मेरे को ले चलो दो सेना दरम्यान।
नेज़र मानो ममकथं सुनो कृष्ण भगवान।

….. तुझको यह दुःख कहा से आया है यह नीचो की बुद्धि तुझको न चाहिए, इस बात से संसार मे न स्वर्ग मिलता है ना कीर्ति होती है। हे अर्जुन! यह नपुंसको जैसी प्रकृति तुझे नही चाहिए और तूं तत्व की बात समझता नही परंतप अर्जुन! हृदय से इस नीच बुद्धि को त्याग उठ खड़ा हो। श्री
कृष्ण भगवान के मुखकमल से यह वचन सुन करके अर्जुन कहता है।
अर्जुनोवाच- हे मधुसूदन जी! भीष्म और द्रोणाचार्य तो पूजा योग्य हैं,इनकी पूजा करनी और कुछ भली वस्तु इनके आगे भेंट रखनी चाहिये इन पर बाणों का प्रहार किस प्रकार करिये यह तो बड़े महागुरु हैं बड़े महानुभाव है, इनके मारे से मेरा कल्याण कहा है इन्द्रियों के भोगों निमित्त इनका घात करूं तो इनको मार जो राज के भोग भोगू इनके रूधिर साथ लिपटे हुए होंगे और यह बात भी निश्चय कर जानी जाती जो सर्वथा हमारी ही जीत हो पर यह बात मैं निश्चय जनता हूं कि हमारे सन्मुख जो यह धृतराष्ट्र के पुत्र खड़े हैं सो इनके मारने से हमारा जीना भला नहीं और आपने जो कहा नीच बुद्धि को मत प्राप्त हो तो मैं नीच बुद्धि के पाप को जानता नहीं और मैं ऐसा मूर्ख हो गया हूं जो धर्म अधर्म को भी नही समझता जो धर्म मुझको किस करके हैं और अधर्म कैसे हैं ? हे प्रभु जी! मैं शिक्षा योज्ञ हूं मनसा,वाचा, कर्मणा से तुम्हारी शरण आया हूं जिससे मेरा कल्याण हो सो बात निश्चय कर मुझ को कृपा कर कहो। प्रभु जी! इस शोक से मेरी इन्द्रियां सूख गई हैं सो ऐसी बात मैं कोई नही देखता जिससे मेरा शोक दूर हो हे प्रभु जी! जो शत्रुओं को मारकर निष्कटक सारी भूमि का राज पाऊं और देवलोक जो स्वर्ग है उनकी राज्य समग्री पाऊं तो भी इनको पाकर मेरा शोक नही जायेगा भूमि के राज्य की तो कितनी बात है
संजयोवाच- हे राजन यह बात ऋषिकेशव जी को अर्जुन कहता हे गोबिन्द जी! इनके साथ युद्ध किसी प्रकार नही करूंगा यह कहकर अर्जुन चुप कर गया। संजय धृतराष्ट्र जी को कहते हैं हे राजा जी ऐसे दुःख में प्राप्त अर्जुन को श्री कृष्ण भगवान हंस कर यह बात कहते हैं।
श्री भगवानोवच- हे अर्जुन! जो विवेकी पुरुष हैं वह किसी वस्तु की चिन्ता नही करते, क्योकि जिनके मरने की चिंता तूने करी हैं सो तेरे कहे मारे नही जाते। क्या यह अभी उपजे हैं ? नही पीछे भी यही थे और अब भी हैं और आगे भी होवेंगे यह बोलने हारा आत्मा है, सो अविनाशी है और देह की जैसे तीन अवस्था है, बाल,योन,वृद्ध वैसी चौथी अवस्था देह का मरण है, यह देह के धर्म हैं सो विवेकी पुरुष आत्मा को अविनाशी मानते हैं और देह का मरण ही धर्म है। यह जानकर बुद्धिमान किसी का शोक नही करते। हे कुन्तिनन्दन अर्जुन! तुझको इन्द्रियों का ज्ञान प्राप्त भया सो यह ज्ञान सुख दुःख और शीत उष्ण का दाता है। यह सुख दुःख प्राप्त भी होता है, और मिट भी जाता है, अन्तवत। हे अर्जुन! तूं इनको सहार। हे श्रेष्ठ अर्जुन जिनको इन्द्रियों के सुख और दुःख अपनी निशचलता से चलायमान न कर सके, तिन्हीं पुरुषों ने अमृत पान किया है सो ही अमर हुए। हे अर्जुन! यह जो समस्त देह मे आत्मा व्यापी है तिसको तू अविनाशी जान। यह किसी के कहे मारा नहीं जाता। यह अनन्ता है, शरीर उपजते भी हैं और विनाश भी होते हैं और आत्मा नित्य है अमर हैं फिर कैसा है ? निराहार है, कुछ खाता पीता नहीं और आत्मा की मर्यादा भी नहीं कि कितना है, इस कारण हे अर्जुन युद्ध करके कोई कहे अमुक को मैंने मारा है सो वह दोनों कुछ नहीं समझते न कोई मरा और ना किसी ने मारा है आत्मा कैसा है। कभी जन्मता नहीं और मरता भी नहीं है और यह भी नहीं जो कभी होता है कभी नहीं होता है, आत्मा अजर है जन्म मरण से रहित है, नित्य अविनाशी है शाश्वत है और पुरातन है और किसी के कहे, मारा नहीं जाता शरीर मरते हैं जन्मते हैं जिनका मरना ही धर्म है, परंतु मरना आत्मा का धर्म नहीं। हे अर्जुन! जिन्होंने ऐसा अविनाशी आत्मा नहीं पहचाना सो पुरुष कहते हैं कि उसको हमने मारा या अमुक ने हमें मारा। देह आत्मा का सहयोग अर्थात इकट्ठा होना किसी भांति है सो सुन, जैसे पुराना वस्त्र उतारा और नया पहन लिया इसी भांति आत्मा पुरातन देह को छोड़कर नहीं देह लेता है, फिर आत्मा कैसा है शास्त्रों से काटा नहीं जाता, अग्नि से जलाया नहीं जाता और जल में डूबता नहीं और पवन से सूखता नहीं, आत्मा छेदने,कटने,जल में डूबने और सूखने से रहित है, अविनाशी है, सर्वव्यापी है, सर्वदेहों में भरपूर है। इसी में निश्चल कहा जाता है, सनातन पुरातन है, फिर कैसा है ?आत्मा अव्यय है, किसी ने देखा भी नहीं अचिंत है, चितव्या नही जाता और अकर्ता है, कुछ काम काज भी नहीं करती है, हे अर्जुन! जिन्होंने ऐसे आत्मा को पहचाना है सो किस की चिंता करें, आत्मा तो ऐसा है जैसा मैंने तुझे कहा है। हे महाबाहो! जो तू आत्मा को ऐसा न भी जाने तो भी चिंता किसी की नहीं करनी चाहिए जो जन्मा है सो निश्चय मरेगा, जो मरते हैं उनका निश्चय कर जन्म है इस भांति समझ कर चिंता नहीं करनी चाहिए अब और सुन इस सभा भूत प्राणियों शरीर धारियों का आदि अन्त जाना नहीं जाता कि कहां से आए हैं कहां जायेंगे बीच ही से देखने लगे हैं, जब शरीरों को छोड़ते तो नहीं जानते कि कहां गए जिनका आदि अन्त न जाना जाए कि कहां से आए कहां को गए उनकी चिंता क्या करें, इस भांति भी चिंता करनी उचित नहीं है अब और सुन। इस बोलन हारे आत्मा को देखा चाहे सो आश्चर्य होकर देखता है और सुनता भी आश्चर्य से है, आश्चर्य क्या है ? जिसका कुछ निर्णय किया जाए कि यह क्या है जिसके दिल में रहते ही धर्म न जानिए कि क्या है इस भांति चिंता नहीं करनी चाहिए और एक बात इस आत्मा की निश्चय कर जानिए, यह अविनाशी है इस कारण से हे अर्जुन तू किसी भूत प्राणी की चिंता मत कर, तू क्षत्रिय है युद्ध करना तेरा धर्म है तू अपने धर्म से मत गिर ऐसे युद्ध विषय कल्याण क्षत्रिय को दुर्लभ हैं अपनी इच्छा से यह सभी योद्धा आए हैं स्वर्ग के द्वार इनके लिए खुले पड़े हैं हे अर्जुन! इस युद्ध के मार्ग से सुखैन ही स्वर्ग को जो प्राप्त होंगे और जो तू यह धर्म का संग्राम न करेगा तो तेरा धर्म भी जाता रहेगा और कीर्ति भी जाएगी अपने धर्म और कीर्ति को छोड़कर पाप को प्राप्त होवेगा जो लोग तेरी कीर्ति करते हैं सो ही तेरी निंदा करेंगे कि अर्जुन कुछ नहीं बलहीन है लोगों में जिसकी निंदा हो उसके जीवन से मरण भला है और जो योद्धा तेरे से डरते हैं तुमको महारथी योद्धा कर मानते हैं सो ही योद्धा तुझको कहेंगे अर्जुन कुछ नहीं बलहीन है, तुझे बुरे वचन कहेंगे। तेरे पराक्रम की निंदा करेंगे। इसके उपरांत तुझे बड़ा दुख होगा। जो तू युद्ध विखे शरीर छोड़ेगा तो स्वर्ग में जा प्राप्त होवेगा।
दोहा-
रण में मरे तो स्वर्ग हो विजय महाराज।
उर में करी विचार यह युद्ध ही ते धनु साज।

जो जीते तो पृथ्वी के राज को प्राप्त होगा। इसलिए हे अर्जुन! तू उठ खड़ा हो, युद्ध का निश्चय कर सुख और दुख को एक समान जान लाभ और हानि को समान जानकर युद्ध कर, तुझे पाप नहीं लगेगा, हे अर्जुन! मैंने तुझको यह संख्यशास्त्र का मत सुनाया है अब बुद्धि योग सुन सो कैसा बुद्धियोग है जिसके सुनने समझने से जन्म मरण के बंधन को काट डालेंगे मुक्ति पाएंगे अब प्रथम तू मेरी बुद्धि सुन जो मैं अपने भक्तों के साथ कैसा हूं जो मेरे भक्तों मेरी सेवा पूजा, भक्ति समरण भूल कर भी करते हैं आगे का पीछे और पीछे का आगे तो तिसका पाप कुछ नहीं मैं समझ लेता हूं कि मेरा भक्त मेरे प्रेम साथ मगन हुआ इसको सुर्त नहीं है इसकी साखी सुन जैसा राम अवतार ने भी भीलना की गति प्रेम साथ जूठे बेर भोजन किए हैं। हे अर्जुन! मेरी गति देखने में थोड़ी है कि एक तुलसी दल अथवा पुष्पमाला मुझे समर्पण करें अथवा एक बार नमस्कार करें अथवा एक बार मेरा नाम लेवे, सो यह देखने को तो थोड़ी है पर इसका फल बढ़ा है क्या फल है ? जन्म मरण के दुख को काट मेरे अविनाशी पद विषे लय होता है यह जो भक़्त के साथ मेरी प्रीति है सो कही है और भक्ति का फल भी कहा है अब जैसी मेरे साथ मेरे भक्तों की बुद्धि है सो सुन मेरे भक्तों को केवल एक मेरे चरण कमलों की सेवा साथ प्रीति है मेरे बिना किसी दूसरे को नहीं मानते और मेरे नाम बिना कुछ मुख से और कहते भी नहीं और ना सुनते ही हैं केवल दृढ़ निश्चय है और जिसका निश्चय मेरे साथ नहीं तिसकी बात सुन, उनकी मति अनेक और भरमती फिरती है, जिस और किसी ने लगाई उसे और लग जाती और वह कैसे हैं जिनका निश्चय मेरे साथ नहीं मीठी वाणी से श्लोक पढ़ पढ़ कर लोगों को सुनाते हैं और देवताओं की भक्ति का उपदेश कहते हैं वह अंधे मूर्ख अपने आप को दंडित करते हैं, हे अर्जुन! वेद के विवाद से आप भी मोहे हुए हैं और लोगों को भी मोहित करते हैं। फिर वह कैसे हैं इंद्रियों के भोगों में जिनकी कामना है उन्होंने स्वर्ग को ही परमपद समझ रखा है वह ऐसे कर्म करते हैं जिनके किए से बारंबार संसार में जन्म मरण होवे और जिनके करने से कष्ट बहुत होवे और जिस कर्म का तुच्छ फल हो वह स्वर्ग को गए फिर गिर पड़े ऐसे जो बुद्धिहीन है जिनकी कामना इंद्रियों के भोगों में है और संसार में अपनी प्रभुता चाहते हैं इन बातों से बुद्धि अंध हुई है उनकी बुद्धि का निश्चय मेरे में लगता नहीं और निश्चय के लगे बिना परमसुख सुख जो है समाधि परम कल्याण सो कभी नहीं। अब अर्जुन वेद का वृतांत सुन। वेद की बुद्धि भी तीनों गुणों में है परंतु आत्मा इन तीनों गुणों से अतीत है कैसा सत्यजीत हो उष्ण हो ना जन्म हो न मरण हो ऐसा जो आत्मा सत्यस्वरूप और नित्य है तू उसके साथ जुड़। आत्मा सुख और इंद्रियों के भोगों के सुख में बड़ा भेद है। तिनका वृतांत सुन। जैसे जल का पात्र कुआं, तालाब, टोभा नदी इनके विषय एक एक ही कार्य होते है जो कुए पर जा कर यतन से जल निकालें तब ही पान कीजिए पर भली-भांति कुएं में स्नान नहीं होता वस्त्र भी धोए नहीं जाते और जो तालाब टोभे,नदी में जावे वहाँ पीने का जल नहीं स्नान करते और वस्त्र धोते हैं और जब महाप्रलय में जहां सातों ही समुद्र एक हो जाते हैं ऐसे अनन्त जल में भली-भांति स्नान भी होये, जलपान भी होय वस्त्र भी धोये जाते है इसी भांति आत्मा ब्रह्म के साथ जुड़कर अनन्त सुख पाता है इस सुख को मेरे उपासक ब्रह्मा, नारद, तपस्वी सब जानते हैं, तिस कारण हे अर्जुन! ऐसा जो आत्मा का सुख है तिस के साथ जुड़,तेरा जो क्षत्रिय धर्म है सो कर, फल कुछ न मांग। हार जीत एक समान जानकर युद्ध कर। हर्ष शोक से रहित हो इसका नाम समता योग है। हे अर्जुन! ऐसे बुद्धियोग के साथ जुड़कर पाप पुण्य दोनों को काट डाल और बुद्धियोग कर आत्मा साथ जुड़, इसका नाम कल्याण योग है। ऐसे जो विवेकी पुरुष हैं वो फल किसी कर्म का नहीं बांछते है जो फल बांछते हैं सो नीच मति है। हे अर्जुन! जब तू मेरे साथ बुद्धि को निश्चल करेगा तब जन्म मरण के बंधन काट कर मेरे अविनाशी पद को प्राप्त होगा। हे अर्जुन! जब मोह के जाल को तेरी बुद्धि तोड़ेगी तब जितने शास्त्र सुने हैं उसमें विरक्त होगा, जब तेरी बुद्धि निर्मल होगी तब तू समाधि योग के सुख को जानेगा। श्री कृष्ण भगवान के वचन सुनकर अर्जुन पूछता है
अर्जुनोवाच- हे केशव जी ? जिसकी निश्चल बुद्धि है तिसके लक्षण कृपा कर कहो,तिसकी बोली कैसी है ? समाधि कैसी है लोगों के साथ बात किस भांति करता है और वह चलता और बैठता किस भांति है ? मैं कैसे समझू कि वह निश्चल बुद्धि है। इतना सुनकर कृष्ण भगवान जी कहते हैं।
श्री भगवानोंवाच- हे अर्जुन जिस की कामना किसी बात करने पर नहीं उठी और आत्मा को पाकर संतुष्ट है, तिसकी तू निश्चल बुद्धि जान, फिर कैसे हैं जिसकी देह को यदि दुःख लगे तो चिंता ना करें और सुख की वांछा न करें किसी से जिसका मोह नहीं और किसी का भय नही, किसी के साथ वैर नहीं और किसी से क्रोधित नहीं होता, तिसकी बुद्धि निश्चल जान। फिर कैसे है ? जिसकी किसी से प्रीति नहीं, जिसे भली वस्तु पाकर हर्ष नहीं, और बुरी वस्तु पाकर शौक नहीं तिसकी बुद्धि निश्चल जान। फिर कैसा है ? जैसे कूर्म अर्थात कछुआ अपने हाथ पाव मुख्य सभी इंद्रियां अपनी खोपड़ी में चढ़ा लेता है तैसे ही जिसने सभी इंद्रियों विषयों से वर्ज के बांध रखी हैं तिसको को तू निश्चल बुद्धि जान। हे अर्जुन! यद्यपि विवेकी पुरुष इंद्रियों को जीतने का यत्न करता है तो भी इंद्रियां बलवान हैं। मन की ठोर से चल देती हैं, हे अर्जुन! इन सभी इंद्रियों को वश में कर किस भांति वश में कर सो सुन। मन का निश्चल चैता मेरे में रख। मन ही से इंद्रियां सुरजीत हैं, सो ही मेरे में भी निश्चल रख तब इंद्रिया आप ही जीती जावेगी। जिसके वश इंद्रियां हैं तिसकी बुद्धि निश्चल जान और जो मेरे नाम, मेरे ध्यान बिना और बात चितवन करता है इससे मनुष्य का किस भांति कार्य बिगड़ता है सो सुन- जो मनुष्य विषयों की बात करें उनका संग कर अथवा अपने मन में विषयों का ध्यान करें, तब विषयों का संग इस तरह होता है उस संग से मन में काम आदि कामना उपजती है, काम से क्रोध उपजता है, क्रोध से लोभ, लोभ से मोह, मोह से चैतन्य का नाश होता है, जब चैतन्य का नाश हुआ, तो बुद्धि का नाश हुआ, बुद्धि का नाश होने से मनुष्य का भी नाश हो जाता है। जब बुद्धि नष्ट हुई तब जैसे और पशु योनि है तैसे ही यह पशु हुआ। इस कारण से मेरे भक्त संसारी मनुष्य का संग कभी नहीं करते और मेरे नाम के बिना और बात नहीं करते। नाम की चितवना बिना और कुछ संकल्प नहीं करते, यह मेरे भक्तों को मेरी आज्ञा है, अब अर्जुन! मेरे भक्त भोजन छादन का अंगीकार कैसे करें सो सुन। जैसे मेरी आज्ञा से जो कुछ मिला वैसे ही शौक से रहित होकर भोग लिया और जिसके मन का निश्चल चेता मेरे में होता है तिस पर मैं कृपा करता हूं, मेरी कृपा से उनके तन और मन के छोटे बड़े जो दुख है उनका नाश होता है, उनका मन अति प्रसन्न होता है। अब जिनकी नास्तिक बुद्धि है उन की बात सुन। हे अर्जुन! नास्तिक बुद्धि किसको कहते हैं ? जो कहते हैं कि परमेश्वर कहां है किसने देखा है ? जिनकी श्रद्धा मेरे में नहीं लगती, मेरे में श्रद्धा लगे बिना शांति नहीं और शांति के बिना कोई सुख नहीं, नास्तिक बुद्धि सदा दुखी रहते हैं, हे अर्जुन! जो कहो इन्द्री विषयों की ओर चले,तिसके पीछे मन को न जाने देवें, उसकी बुद्धि कैसी है सो सुन जैसे नौका नदी के परले किनारे चलती है और पवन झखड़ आता है तो नौका को इस तट पर नहीं लगने देता, जिधर किधर जा लगती है। इसी भांति इंद्रियों के पीछे मन को न जाने दें। इसलिए हे अर्जुन! प्रथम तू इंद्रियों को वश कर, जिन पुरुषों ने इंद्रियों को अपने अर्थो से वर्ज रखा है, अपने वश करी हैं, उनकी बुद्धि निश्चल जान। हे अर्जुन! अब और सुन, मेरे स्मरण भजन की बातों का स्वाद जो है उसको संसारी मनुष्य को सूरत नहीं, तिनके भाणे मेरा भजन रात है, मेरी और से सो रहे हैं और संसार के विषय में सावधान है तिनका यह दिन होता है जिसमें मनुष्य जागते हैं और संयमी जो भक्त हैं सो उस ओर से सो रहे हैं, तिनके भाणे संसार की बात रात्रि है और जो मेरे भक्त हैं मेरे भजन में जागते हैं, सावधान हैं, मेरा जो पूर्ण भक्त है उसके लक्षण सुन! जैसे समुद्र अपने जल से पूर्ण और निश्चल है, वह कैसा है ? जिसके कामना मेरे भजन बिना किसी बात को नहीं चाहती, ऐसा जो निश्चह और अवांछी निरंहकार ममता से रहित है वह शांति पद मे लीन है और शांति उनमें लीन है, हे अर्जुन! यह मैं तुझको ब्रह्मा स्थिति कही है जो ब्रह्मय है, तिसको यह स्थिति स्वभाव है, तिसको यह स्थिति स्वभाव प्राप्त हुआ है सो फिर माया के मोह से कभी नहीं मोहा जाता, क्योंकि वह माया के पार निर्वाणब्रह्म पद मे जा प्राप्त हुआ

इति श्री मद् भगवद् गीता सुपनिषद सुब्रह्म विद्या योग शास्त्रे श्री कृष्ण अर्जुन सम्बादे संख्या योगो द्वितीयो अध्याय।।

★★★ अथ दूसरे अध्याय का महात्म्य ★★★

श्री नारायणोवाच-
नारायण जी कहते हैं कि हे लक्ष्मी! तू श्रवण कर। दक्षिण देश में एक पूर्णा नाम नगर था, वहां देव नाम का अतीत बड़ा धन पात्र रहता था, वह साधुओ की सेवा करता था और साधुओं को कहता, हे संत जी! मुझको नारायण जी के जानने का ज्ञान उपदेश करो, जिससे मेरा कल्याण हो होवे, मैं मोक्ष पद पाऊं, ऐसे संत सेवा करते बहुत दिन बीते एक दिन वहाँ एक बाल नामा ब्रह्मचारी आया, उसकी सेवा बहुत करी और विनय करी, हे संत जी! मुझे कृपा कर श्री नारायण जी के पाने का ज्ञान उपदेश करो, जिससे मेरे जीवन का कल्याण और मुक्ति होवें, तब बाल ब्रह्मचारी ने कहा मैं तुझे गीता जी के दूसरे अध्याय का पाठ सुनाता हूं, उसके सुनने से तेरा कल्याण होगा तब देव ने कहा- श्री गीता जी के दूसरे अध्याय के सुनने से कोई पहले भी मुक्त हुआ है ? तब बाल ब्रह्मचारी ने कहा मैं तुझे एक पुरातन कथा सुनाता हूं, श्रवण करें एक अयाली वन में बकरियां चराता था और वहां मैं भजन किया करता था, एक दिन रात को अयाली बकरियां लेकर घर को चला मार्ग में एक सिंह बैठा था एक बकरी जो सबसे आगे चली जा रही थी उसको देख कर सिंह भाग गया। तब वह अयाली यह अचरज देख कर बड़ा चकित हुआ और मैं भी वहां आ खड़ा हुआ, चरवाहे नें मुझे देख कर कहा मैंने यह आश्चर्य देखा है कि बकरी को देखकर सिंह डर के भाग गया है। तुम संत त्रिकालज्ञ हो वृतांत मुझे कहो कि यह क्या चरित्र भया है ब्रह्मचारी ने कहा, हे अयाली! मैं तुझे एक पिछली वार्ता सुनाता हूं। यह बकरी पिछले जन्म में डैन थी, जाति इसकी सुंदर थी जब इसका भर्ता मर गया तब यह डैन बड़ी हो गई, जिस सुंदर लड़के को देखती उसको खा लेती और यह सिंह पिछले जन्म फंदक था, यह पक्षी पकड़ने बाहर को गया था और डैन भी वन को गई थी, वहाँ डैन ने उस फंदक को खा लिया। अब वही फंदक यह सिंह भया और वह डैन यह बकरी भई, सिंह को पिछले जन्म की खबर थी इसलिए बकरी को देखकर सिंह ने जाना कि अब भी मुझे खाने आई है। तब अयाली ने कहा मैं पिछले जन्म कौन था! तब ब्रह्मचारी ने कहा तू पिछले जन्म चंडाल था तब अयाली ने कहा- हे ब्रह्मचारी जी! कोई ऐसा उपाय भी है जिससे हम तीनों ही इस अधम देह से छूटें तब ब्रहमचारी ने कहा हम तुम्हारे तीनों का उद्धार करते हैं एक वार्ता मेरे से सुनो पर्वत के कन्द्रा में एक शिला थी जिस पर श्री गीता जी का दूसरा अध्याय लिखा हुआ था मैंने उन अक्षरों को उस शिला पर देखा था अब मैं तुम्हारे को मन वचन और कर्म करके सुनाता हूं तुम श्रवण करो! तब ब्रह्मचारी ने गीता जी के अक्षर सुनाएं तब तत्काल ही आकाश से विमान आए उन सब को विमान पर चढ़ाकर बैकुण्ठ लोक को ले गए, अधम देह से छुट कर देव देहि पाई, और देव भी गीता ज्ञान सुनकर मुक्त हुआ और देव देहि पाकर बैकुण्ठ को गया तब श्री नारायण जी ने कहा, हे लक्ष्मी! जो मनुष्य श्री गीता जी के ज्ञान को पढ़े सुने तिसका फल क्या वर्णन करिये, श्री गीता जी के श्रवण अथवा दर्शन के करने से जीव मुक्ति को प्राप्त होते है और पाठ का फल तो और अधिक है।।

इति श्री पदम् पुराणे सति ईश्वर उतरा खण्ड गीता महात्म्य नाम द्वितीयो अध्याय संपूर्णम् ।।

Geeta part-1

 

★★★★ श्रीमद्भभगवद्गीता ★★★★

हे भगवान अर्जुन भक़्त को आपने जो गीता जी का ज्ञान दिया!सो मुझको मिले, हे भयभंजन भगवान श्री कृष्ण जी। यह रमन आपका दास है, हे प्रभु गीता के उच्चारण करने
से भगत पूर्ण ब्रह्म को प्राप्त होता है। हे प्रभु! मै आपके चरणो की शरण हूं! आप परम पूर्ण हो और मै आपकी
शरण मे पड़ा हूं! रमन कृष्ण दास दीन गरीब है और आप सन्तों की विनती मान लेते है हे कमलावल्भव श्री कृष्ण भगवान जी कृपा निधान जी तेरे भक्तों के लिए मै यह गीता ज्ञान हिन्दी भाषा मे कहता हूं। अगर मुझसे लिखने में कोई त्रुटि हो जाए तो आप और आपके भक़्त अपना दास समझकर क्षमा कर देना। मै श्री कृष्ण भगवान जी आपको और आपके भक्तों को नत्मस्तक होकर कोटि कोटि नमन करता हूं

श्री गीता के ज्ञान की कथा प्रारम्भ हुई 

पहला अध्याय – विषाद योग

जब कौरव और पांडव महाभारत के युद्ध को चले तब राजा धृतराष्ट्र ने कहा कि मै भी युद्ध का कौतुक देखने चलूं तब
श्री व्यास जी ने कहा हे राजन! तेरे तो नेत्र नहीं हैं, नेत्रों के बिना क्या देखोगे ? तब राजा धृतराष्ट्र ने कहा, हे प्रभु जी! देखूंगा नहीं, श्रवण तो करूंगा। तब व्यासदेव जी ने कहा हे राजन! तेरा सारथी संजय मेरा शिष्य हैं जो कुछ महाभारत के युद्ध की लीला कुरुक्षेत्र में होगी सो तुमको यहाँ बैठे ही श्रवण करावेगा! जब व्यासदेव जी के कमलमुख से यह वचन सुने तब संजय ने श्री व्यासदेव जी के चरणों पर नमस्कार किया और हाथ जोड़कर…….

★★ पहला अध्याय ★★

धृतराष्ट्र कहने लगे सुन संजय धीमान।
कुरुक्षेत्र की भूमि मे क्या कुछ होत सुजान।।
क्या कुछ होत सुजान पांडु सुत और सुत मेरे।
गए युद्ध के हेतु वीर बुद्धि के प्रेरे।।
दिव्यचक्षु और श्रोत्र को कर गए व्यास प्रदान।
धर्मक्षेत्र की भूमि का बेजर करो बखान।।

…….विनती की कि प्रभु जी महाभारत के युद्ध का चरित्र तो कुरुक्षेत्र में होगा और मैं हस्तिनापुर हूंगा और आपने जो आज्ञा की है कि राजन तुझको यहाँ बैठे ही युद्ध का कौतुक संजय कहेगा सो प्रभु! यहाँ हस्तिनापुर में कुरुक्षेत्र की लीला कैसे जानूंगा और राजा को किस भांति कहूँगा ? जब इस प्रकार संजय ने व्यासदेव जी से विनती की तब श्री व्यासदेव जी ने प्रसन्न होकर संजय को यह वचन कहा कि
हे संजय मेरी कृपा से तुझे यहां ही सब कुछ दिखाई देवेगा और बुद्धि के नेत्रों से सूझेगा। जब व्यास जी ने यह वर दिया उसी समय संजय को दिव्य दृष्टि हुई और बुद्धि भी उसी की दिव्य हुई! अब आगे महाभारत का कौतुक कहते हैं सो सुनो,
सात क्षोणी सेना पांडवो की और ग्यारह क्षोणी सेना धृतराष्ट्र के पुत्र कौरवों की, यह दोनों सेना इकट्ठी होकर कुरुक्षेत्र पहुँची! अब राजा धृतराष्ट्र संजय से पूछते हैं,

धृतराष्ट्रोंवाच- हे संजय धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र में मेरे और पांडव के पुत्रों ने क्या किया सो मुझे कहो ? राजा का वचन सुनकर संजय बोले!

संजयवाच- हे राजा जी! तेरे पुत्र दुर्योधन ने पांडवों की सेना देखी सो कैसी है सेना भलीभांति जिसकी पंक्ति बनी है उन पांडवों की सेना को देखकर राजा दुर्योधन ने अपने गुरु द्रोणाचार्य के निकट जाकर यह विनती की है आचार्य जी! देखो तो पांडवों की सेना का समूह और सेना की कैसी भलीभांति पंक्ति बनी है और द्रुपद का पुत्र धृष्टधुम्न जो तुम्हारा शिष्य है कैसा बुद्धिमान है जिसने पांडवों की सेना की पंक्ति ऐसी भलीभांति बनाई है और जो पांडवो की सेना के मुख्य योद्धा हैं उनके नाम दुर्योधन द्रोणाचार्य को सुनता है, इस सेना में बड़ा धनुषधारी अर्जुन,भीमसेन,राजा युयुधान, राजा विराट, राजा द्रुपद महारथी धृष्टकेतु,चेकितान और बड़ा बलवान काशी का राजा और पुरुजित कुन्ति भोज मनुष्यों में श्रेष्ठ शैव्ययुधामन्यु और विक्रांत बड़ा बलवान उत्तमाजा,सुभद्रा का पुत्र अभिमन्यु और द्रोपदी के सभी बेटे महारथी है।
अब दुर्योधन अपनी सेना के मुख्य योद्धाओं के नाम प्रमाण सुनता है,
हे आचार्य जी! अब जो मेरी सेना के मुख्य योद्धा है, ब्राह्मणों में श्रेष्ठ द्रोणाचार्य जी उनके नाम सुनो। प्रथम विकरण,सोमदत्त और जयद्रथ इनसे आदि लेकर और भी योद्धा हैं तो आप और भीष्म जी कर्ण कृपाचार्य जी समतींजय,अश्वत्थमा जिन्होंने मेरे निमित अपना जीवन त्याग दिया है और अनेक प्रकार के शास्त्र धारणहरें हैं युद्ध करने को बड़े प्रवीण और चतुर है हमारी सेना बहुत अर्थात ग्यारह क्षोणी पांडवों की सेना थोड़ी अर्थात सात क्षोणी हैं और हमारी सेना का अधिकारी और रक्षाकर्ता भीष्म है और पांडवों की सेना का अधिकारी और रक्षाकर्ता भीम है तब दुर्योधन ने अपनी सेना को कहा जितने तुम हमारी सेना के लोग हो सभी भीष्म की रक्षा करनेहारे हो और जितने शस्त्र आने के मार्ग हैं तिन सभी मार्गो से भीष्म की रक्षा करो! दुर्योधन के मुख से भीष्म आदि योद्धाओं ने यह वचन सुना और उसको प्रसन्न करने के लिए कौरवों में बड़े जो है वृद्धि भीष्म पितामह सो प्रथम उन्होंने सिंह की नयाई गरजकर अपना प्रतापवान शंख बजाया जिसके उपरांत सारी दुर्योधन की सेना ने शंख बजाए! भेरी ढोल और रणसिंह बजाए। दमामे और गोमुख इत्यादि से लेकर और सभी वजंत्र अनेक प्रकार के सारी सेना ने इकट्ठे बजाए। उन वजंत्रों का इकट्ठा शब्द होता भया अब पांडवों की सेना के वजंत्र सुनो-
प्रथम तो जिस रथ पर श्री कृष्ण भगवान विराजमान हैं तिस बड़े रथ की सारी सामग्री कंचन की है और सारी रत्नों से जड़ित है जैसे वर्षा ऋतु का मेघ गरजता है वैसे ही रथ के पहियों की आवाज है ऐसा तो रथ है अब घोड़ों की शोभा कहते हैं जैसे गौ का दूध होता है तैसा तो उन घोड़ों का सुंदर रंग है और जैसा कार्तिक का फूला हुआ कमल होता है ऐसा सुंदर उनका मुख है और बहुत सुंदर हैं। गरदनें जिनकी सुन्दर हैं कान और पूछें अति सुन्दर हैं। और चरणों के विखे नूपर स्वर्ण के पड़े हैं यह उन घोड़ों की शोभा है ऐसे सुन्दर रथ पर सारथी भक्त वत्सल सत्यस्वरूप आनन्दमूर्ति श्री कृष्ण भगवान जी विराजमान हैं और योद्धा के स्थान पर भक्त अर्जुन विराजमान है और उन्होंने भी दिव्य शंख बजाये प्रथम ऋषिकेश श्री कृष्ण भगवान ने अपना पँचजन्मनामी शंख बजाया और देवदत्त नामा शंख अर्जुन ने बजाया और पौडर नामा शंख भीमसेन ने बजाया सो भीमसेन कैसा है जिसका उदर बड़ा है और कमर भी बड़ी है और आनन्त विज्यमाला शंख कुंती पुत्र राजा युधिष्टर ने बजाया और सुघोष नामा शंख नकुल ने बजाया मणिपुष्प नामा शंख सहदेव ने बजाया और महारथी शिखंडी व धृष्टद्युम्न और राजा विराट ने भी शंख बजाये और अजीति सात्यकी यादव राजा द्रुपद और द्रोपदी के पुत्रों ने भी शंख बजाये जितने पांडवों की सेना के राजे थे सभी ने शंख बजाये और सुभद्रा के पुत्र महाबाहु अभिमन्यु ने भी शंख बजाया इन सभी ने अपने-अपने भिन्न भिन्न प्रकार के शंख बजाये तिन शंखों का शब्द सुनकर धृतराष्ट्र के हृदय विदार्ण हुए अर्थात फट गए, धरती और आकाश शब्दों से भर गया इसके उपरांत धृतराष्ट्र के पुत्रों की सेना अर्जुन ने देखी तब दोनों ओर की सेना के शस्त्र चलने लगे तब अपना धनुष सिर के ऊपर फेरकर अर्जुन पांडव ऋषिकेश श्री कृष्ण से बोलता भया हे अच्युत अविनाशी पुरुष जी मेरा रथ दोनों सेनाओं के बीच ले जाकर खड़ा करे तब देख हमारे साथ युद्ध करने को हमारे कौन कौन आये हैं प्राणों को और धन को त्याग कर जो आये हैं तिन सबको मै देखूंगा।
संजयोवाच- संजय राजा धृतराष्ट्र को कहता है हे राजा ऋषिकेश श्री कृष्ण भगवान को अर्जुन ने यह वचन कहे तब भक़्त वत्सल गोबिंद जी ने घोड़े प्रेर कर अर्जुन से यह वचन कहे तब भक़्त भीष्म द्रोणाचार्य के सन्मुख ले जाकर खड़ा किया और भीष्म द्रोणाचार्य के दाईं बाईं और ओर भी योद्धा थे तब श्री कृष्ण भगवान अर्जुन को बोले अर्जुन तेरा रथ मैंने कौरवों की सेना के सन्मुख खड़ा किया है तूं इनको देख तब अर्जुन ने कौरवों की सेना मे बहुत योद्धा देखे, उनमें पितामह देखे गुरू देखे मातुल देखे पुत्र देखे पोत्र देखे सखा ससुर और मित्र देखे इन दोनों सेनाओं में अपने ही कुटम्बी देख कर अर्जुन को बहुत दया उपजी तब अर्जुन श्री कृष्ण भगवान जी से बोले,
अर्जुनोवाच- अर्जुन श्री कृष्ण भगवान को कहते हैं हे श्री कृष्ण भगवान जी इस सेना विखे मैंने सब अपने सज्जन भाई बन्धु कुटम्बी देखे हैं। जो योद्धा रण में आये है तिन को देखकर मेरा शरीर बहुत दुख पाता है मुख सूख गया है और मेरी देह कांप गयी है मेरे रोम खड़े हो गए हैं और गांडीव नामक धनुष मेरे हाथ से गिर पड़ा है और त्वचा जल उठी है मैं खड़ा भी नहीं हो सकता और मेरा मन भी भ्रम में है और हे केशव जी मैं शकुन भी बुरे देखता हूँ और ऐसा निमि भी नही देखता यह विपरीत युद्ध है हे केशव जी इस युद्ध में भाइयों को मारने में मैं अपना कल्याण भी नही देखता,हे कृष्ण जी मैं अपनी जय भी नही देखता और मुझको राज्य की वांछा नहीं और ना सुख की है, हे गोबिंद जी यह राज किस काम का है और राज के भोग किस काम के हैं तिन के निमित राज लेना है वह कुटुम्ब के योद्धा लोग प्राण-धन का त्याग कर युद्ध निमित खड़े हैं सो यह कौन-कौन है गुरू हैं, पितामह हैं, पुत्र हैं, ताए हैं, मामे हैं, साले हैं, कुड़म हैं, हे मधुसूदन इनको मारने की मुझको इच्छा नही, इन पर मुझको बहुत दया आती है, धरती के धारणहारे श्री कृष्ण भगवान जी मैं इनको मारकर त्रिलोकी का राज पाऊ तो भी ना मारूंगा, भूमि के राज की तो क्या बात है, हे जनार्दन जी! धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारने से हमारा कल्याण नही किन्तु विपरीत होगा, इनको मारने से हमको बड़ा पाप लगेगा यद्यपि ये महापापी भी हैं, मैं इनको नही मारूंगा। हे माधव जी! सज्जन भाईबन्धु कुटम्बी इनको मारने से हमको सुख कहां ? और मुक्त्ति कहां ? यद्यपि राज के लाभ से इनकी बुद्धि अन्ध हुई है यह धृतराष्ट्र के पुत्र जो कुछ कुलनष्ट करने या मित्र के साथ कपट करने से दोष उपजते हैं इनको नही समझते तो क्या इनकी नयाई मैं भी नहीं समझता जो कुल के नष्ट करने से पाप होता है उस पाप को मैं भली भांति जानता हूं अब जो पाप कुल के नष्ट करने से लगता है उस पाप को अर्जुन भलीभांति कहते हैं हे जनार्दन जी!जब कुल का नाश किया तब जो कुल के धर्म का नष्ट हुआ तब सारे कुल में अधर्म का प्रवेश हुआ और कुल की स्त्रियां दुराचारिणी हुई तिन स्त्रियों के वर्ण संकर पराए पुरुष की सन्तान उपजी सब सन्तान वर्ण संकर भई तब पिंड और जल पितरों को पहुँचने से रह गया तो तिन के पितर स्वर्ग से गिर पड़े इस इस कारण से हे यादव वंशियों में श्रेष्ठ श्री कृष्ण भगवान जी जिसने कुल का नष्ट किया तिसने कितने पाप किये सो यह सब पाप कुल के नष्ट करने हारे के सिर पर होते है फिर वह मनुष्य उन पापों का फल क्या पाता है सो सुना है वह प्राणी सदा नर्क भोगता है न्याय शास्त्र में मैंने यह श्रवण किया है। अब अर्जुन ओर पछताता है हाथ बजाकर और सिर को फेर कर कहता है, हाहा! देखो भाई! मैंने कैसा पाप का उद्यम किया था राज सुख लोभ निमित अपने कुल का नष्ट करने लगा था अब मैं अपने हाथ में शस्त्र ना पकडूंगा और धृतराष्ट्र के पुत्रों के हाथ में शस्त्र होवेंगे और मैं उनके सन्मुख हूंगा और वह मुझको मारेंगे इससे मेरा कल्याण होगा।
संजयोवाच-संजय धृतराष्ट्र को कह रहे है हे राजन! अर्जुन ने यह वचन कहकर धनुषबाण हाथ से छोड़ दिया है और शोक समुद्र में मग्न होकर मूर्छा खाकर गिर पड़ा है

इति श्री मद्भगवद् गीता सूपनिषद सुब्रम्ह विद्या योग शास्त्रे श्री कृष्ण अर्जुन संम्बादे विषाद योगोनाम प्रथम अध्याय।।

★★ अथ प्रथम अध्याय का महात्म्य ★★

एक समय कैलाश पर्वत पर महादेव और पार्वती जी की आपस में गोष्ठ हुई पार्वती ने पूछा हे महादेव जी आप अपने मन में किस ज्ञान से पवित्र हुए हो, जिस ज्ञान के बल पर आपको संसार के लोग शिव कर पूजते हैं, और तुम्हारे कर्म यह दिखाई देते है मृगछाला ओढ़े अंगों में मसानों की विभूति लगाए गले मे सर्प और मुराडों की माला पहर रहे हो इनमें तो कोई कर्म पवित्र नही, सो आप मुझे वह ज्ञान से ज्ञान सुनाओ जिससे तुम अंदर से पवित्र हो।
श्री महादेवोवाच-
तब महादेव जी बोले हे पार्वती! जिस ज्ञान से मैं पवित्र हूं जिस ज्ञान से मुझे बाहर के कर्म नही ब्यापते, सो गीता ज्ञान है उनका हृदय में ध्यान करता हूं, तब पार्वती ने कहा हे भगवान जी! गीता ज्ञान यदि ऐसा है तो इस ज्ञान के श्रवण से कोई कृतार्थ भी हुआ है ? तब श्री महादेव जी बोले हे पार्वती! इस ज्ञान को सुनकर बहुत जीव कृतार्थ हुए हैं और आगे भी होवेंगे, तुझको एक पुरानी कथा सुनाता हूं, सुन! एक समय पाताल लोक में शेष नाग की शय्या पर श्री नारायण जी नेत्र मून्दकर अपने आनंद में मग्न थे और लक्ष्मी जी उनके चरण दबा रही थी,उस समय श्री लक्ष्मी जी ने पूछा हे नारायण जी चौदह लोक के तुम ईश्वर हो,क्या आप को भी निद्रा व्याप्ती है ? निद्रा और आलस्य तो उन पुरुषों को व्यापता हैं जो तामसी हैं और तीनों गुणों से अतीत हो तुम श्री नारायण हो और प्रभु हो वसुदेह हो आप नेत्र जो मून्द रहे हो मुझको बड़ा आशचर्य है। तब श्री नारायण जी बोले सुन लक्ष्मी! मुझको निद्रा आलस्य नहीं व्यापता एक शब्द रूप भगवद्गगीता है उसमें जो ज्ञान है उस ज्ञान से मैं आनन्द में मग्न रहता हूं और वह कैसा ज्ञान है जिसके उपजे से यह जीव सदा आनन्द में रहता है कोई क्लेश दुःख इस जीव को व्यापता नहीं जैसे चौबीस अवतार मेरे साकार रूप है तैसे ही यह गीता शब्द रूप अवतार है इस गीता के विखे मेरे अंग हैं, पांच अध्याय मेरा मुख हैं, पांच अध्याय मेरी भुजा है, पांच अध्याय मेरा हृदय और मन हैं सौलहवां अध्याय मेरा उदर है सतारहवां अध्याय मेरी जांघें हैं, अठारहवां अध्याय मेरे चरण हैं सर्व गीता के श्ल़ोक मेरी नाड़ीयां है और जो अक्षर हैं सो मेरे रोम हैं, ऐसी जो मेरी शब्द रूपी गीता है उसका अर्थ मैं हृदय में विचारता हूं और बहुत आनन्द पाता हूं। हे लक्ष्मी ! तू क्या जानती है तेरे मन मे होगा कि मैं चरण मलती हूं इससे श्री नारायण जी को आनन्द प्राप्त होता है, हे लक्ष्मी! मैं जिस आनन्द विखे मग्न हूं सो गीता ज्ञान है तब लक्ष्मी जी बोली हे नारायण जी! जो ऐसा श्री गीता जी का ज्ञान है तिसको सुनकर कोई कृतार्थ भी हुआ है ? यह मुझको कहो। तब श्री नारायण जी ने कहा, हे लक्ष्मी! गीता के अध्याय का महातम्म तो पीछे कहुंगा पहले श्ल़ोक कहता हूं। श्ल़ोक-
सर्व शास्त्रमई गीता सर्व देह मयोहरी।
सर्व तीर्थ मई गंगा सर्व धर्म मयोदया।।
मनोजानत पाप पुरायदेही जानत आपदा।
गीता सर्व कृष्ण जानत माता जानत सो पिता!
दो दो लोचन सर्वाणां विदवानां त्रई लोचनं।
सप्त लोचन धमानां ज्ञानी नो अनंत लोचनं।।

हे लक्ष्मी! अब पहले अध्याय का महात्म्य सुन- शिवजी पार्वती को इस भांति कहते हैं जिस भांति नारायण जी ने लक्ष्मी जी को सुनाया था।
श्री नारायनोंवाच- हे लक्ष्मी! शूद्रवर्णा एक प्राणी था, जो चंडाल का काम करता था और तेल नून का व्यपार करता था। उसने एक बकरी पाली, एक दिन वह बकरी चराने को गया,वृक्षों के पत्ते तोड़ने लगा,वहां सांप ने उसे डस लिया, तत्काल उसके प्राण निकल गए, मरकर उस प्राणी ने बहुत से नर्क भोगे, फिर बैल का जन्म पाया, उस बैल को एक भिक्षुक ने मोल ले लिया, वह भिक्षुक उस बैल पर चढ़कर सारा दिन मांगता फिरता, जो कुछ भिक्षा मांगकर लाता वह अपने कुटुम्ब के साथ मिलकर खाता। वह बैल सारी रात द्वार पर बंधा रहता, वह उसके खाने पीने की खबर ना लेता, कुछ थोड़ा सा भूसा उसके आगे डाल छोड़ता और जब दिन चढ़ता फिर बैल पर चढ़कर मांगता फिरता कई दिन गुजरे तो वह बैल भूख का मारा गिर पड़ा, जब वह मरने लगा तो उसके प्राण ना छुटते थे, नगर के लोग देखते थे तो कोई उसे अपने तीर्थ का फल देता तो कोई उसे अपने व्रत का फल देता,पर बैल के प्राण छूटते नही। एक दिन गणिका आई, उसने वहां खड़े मनुष्यों से पूछा यह भीड़ कैसी है तो उन्होंने कहा इसके प्राण नही छूट रहे, अनेक लोग अपने पुण्यों का फल दे रहे हैं तो भी इसकी मुक्ति नही होती तब गणिका ने कहा, मैंने जो कर्म किया है तिसका फल मैंने इस बैल को निमित दिया! इतना कहते ही बैल की मुक्ति हुई। तब उसने आकर ब्राह्मण के घर जन्म लिया, पिता ने उसका नाम धर्म रखा। जब वह बड़ा हुआ तो उसके पिता ने उसको विद्यार्थी किया। उसको पहले जन्म की सुध थी, अति सुन्दर था, उसने एक दिन मन में विचार किया, जिस गणिका ने मुझे बैल की योनि से छुड़ाया था उसका दर्शन करिये। विप्र चला चला गणिका के घर पहुचा और कहा तू मुझे पहचानती है ? गणिका ने कहा मैं नही पहचानती तूं कौन है। मेरी तेरी क्या पहचान है। तब विप्र ने कहा- मैं विप्र हूं! तो वह बोली तूं विप्र है मैं वेश्या हु। तब विप्र ने कहा मैं वही बैल हूं जिसको तूने अपना पुण्य दिया था,मैं बैल की योनि से छूटा था अब मैंने विप्र के घर जन्म लिया है तूं अपना वह पुण्य बता जो तूने मुझे दिया था। गणिका ने कहा मैं अपने जाने कोई पुण्य नही किया पर मेरे घर एक तोता है वह सवेरे सवेरे कुछ पढ़ता है मैं उसके वाक्य सुनती हूं उसी पुण्य का फल मैंने तेरे निमित्त दिया था। तब विप्र ने तोते से पूछा कि तू सवेरे क्या पढ़ता है ?
तोते ने कहा- मैं पिछले जन्म में ब्राह्मण का पुत्र था पिता ने मुझे गीता के पहले अध्याय का पाठ सिखाया था, एक दिन किसी कारण वश मेरे पिता जी ने जोकि मेरे गुरु थे मुझको कहा कि मैंने तुझे क्यो पढ़ाया है और मुझको क्रोध में आकर शाप दिया कि जारे तूं सुआ (तोता) होगा। तब मैं अगले जन्म में तोता हुआ एक दिन फन्दक मुझको पकड़ ले गया। और उस फंदक से एक ब्राह्मण ने मुझको मोल ले लिया वह ब्राह्मण अपने पुत्र को गीता का पाठ सिखलाता था, तब मैंने भी वहाँ वो पाठ सिख लिये थे। एक दिन उस ब्राह्मण के घर चोर घुस गए उन्हें धन तो प्राप्त ना हुआ परन्तु वह मेरा पिंजरा उठा ले गए। उस चोर की यह गणिका मित्र थी, वह मुझे इसके पास भेट के रूप दे गया। सो मैं नित्य गीता के पहले अध्याय का पाठ करता हूं और यह सुनती है पर इस गणिका की समझ मे नही आता कि मैं क्या पढ़ता हूं, सो इसने वह पुण्य तेरे निमित्त दिया था सो वह श्री गीता जी के पहले अध्याय के पाठ का फल था तब उसने कहा- हे तोते तूं भी ब्राह्मण है मेरे आशीर्वाद से तेरा कल्याण हो- हे लक्ष्मी! इतना कहने से तोते की मुक्ति हुई और उस गणिका ने भले कर्म ग्रहण किये नित्यप्रति स्नान करती और गीता के पहिले अध्याय का पाठ करती। इस करके भले भले ब्राह्मण व क्षत्रिय उस वेश्या की पूजा करने लगे और श्री नारायण जी ने कहा हे लक्ष्मी! जो अनजाने मे भी गीता का पाठ श्रवण कर ले उसको भी मुक्ति मिलेगी और इस पाठ का फल बहुत अतुल्य फल है यह पहले अध्याय का महात्म्य है जो तूने श्रवण किया है।

इति श्री पदम् पुराणे सति ईशवर सम्बादे उतरा खण्ड
गीता महात्म्यनाम प्रथमो अध्याय सम्पूर्णम् ।।