श्री कृष्ण वंश , श्री राम वंश….Shri Krishna Vansh , Shri Ram Vansh

जिस वंश में कृष्ण प्रकट हुए वह यदुवंश कहलाता है। यह यदु वंश सोम अर्थात् चन्द्रलोक के देव से चला आ रहा है। राजवंशी क्षत्रियों के दो मुख्य कुल हैं-एक चन्द्रलोक के राजा से अवतरित है (चन्द्रवंशी) तथा दूसरा सूर्य के राजा से अवतरित (सूर्यवंशी) है। जब जब भगवान् अवतरित होते हैं, तब प्रायः वे क्षत्रिय कुल में प्रकट होते हैं क्योंकि उन्हें धर्म की संस्थापना करनी होती है। वैदिक प्रणाली के अनुसार क्षत्रिय कुल मानव जाति का रक्षक होता है। जब भगवान् श्री रामचन्द्र के रूप में अवतरित हुए, तो वे सूर्यवंश में प्रकट हुए, जो रघुवंश के नाम से विख्यात था। और जब वे कृष्ण के रूप में प्रकट हुए तो यदुवंश में हुए। श्रीमद्भागवत के नवम स्कंध के चौबीसवें अध्याय में यदुवंशी राजाओं की एक लम्बी सूची दी गई है। वे सभी महान् शक्तिशाली राजा थे। कृष्ण के पिता का नाम वसुदेव था, जो यदुवंशी सूरसेन के पुत्र थे। वस्तुत: भगवान् इस भौतिक जगत के किसी भी वंश से सम्बन्धित नहीं हैं लेकिन वे जिस कुल में जन्म लेते हैं उनकी कृपा से वह कुल विख्यात हो जाता है।….The dynasty in which Lord Shri Krishna appeared is called Yaduvansh. And the dynasty in which Lord Shri Ram appeared is called Raghuvansh. There are two main clans of Rajvanshi Kshatriyas – one is descended from the king of Chandralok (Chandravanshi). Descended from (Suryavanshi) in which Lord Shri Ram incarnated when LordWhen incarnated on earth, they usually appear in the Kshatriya clan because they have to establish Dharma. According to the Vedic system, a Kshatriya is the protector of the entire human race. When the Lord incarnated as Shri Ramchandra, He appeared in the Suryavansh, which was known as the Raghuvansh. And when he appeared as Krishna, he became Chandravanshi in Yaduvansh. A long list of Yaduvanshi kings is given in the twenty-fourth chapter of the ninth canto of Shrimad Bhagwat. All of them were great powerful kings. Krishna’s father’s name was Vasudev, who was the son of Yaduvanshi Surasena. In fact, the Lord does not belong to any clan of this material world, but by the grace of the clan in which He takes birth, that clan becomes famous.

श्री राधाकृष्ण प्रेम कथा….shri radhakrishna love story

श्री राधा जी को जब यह पता चला कि कृष्ण पूरे गोकुल में माखन चोर कहलाता है तो उन्हें बहुत बुरा लगा, उन्होंने कृष्ण को चोरी छोड़ देने का बहुत आग्रह किया। पर जब कृष्ण अपनी माँ की ही नहीं सुनते तो अपनी प्रियतमा की कंहा सुनते । उन्होंने माखन चोरी की अपनी लीला को जारी रखा। एक दिन राधा कृष्ण को सबक सिखाने के लिए उनसे रूठ गयी। अनेक दिन बीत गए पर वो कृष्ण से मिलने नहीं आई। जब कृष्ण उन्हें मनाने गये तो वहां भी उन्होंने बात करने से इनकार कर दिया। तो अपनी राधा को मनाने के लिए लीलाधर को एक लीला सूझी। ब्रज में लील्या गोदने वाली स्त्री को लालिहारण कहा जाता है। तो कृष्ण घूंघट ओढ़ कर एक लालिहारण का भेष बनाकर बरसाने की गलियों में पुकार करते हुए घूमने लगे। जब वो बरसाने, राधा रानी की ऊंची अटरिया के नीचे आये तो आवाज़ देने लगे।
मै दूर गाँव से आई हूँ, देख तुम्हारी ऊंची अटारी,
दीदार की मैं प्यासी, दर्शन दो वृषभानु दुलारी।
हाथ जोड़ विनंती करूँ, अर्ज मान लो हमारी,
आपकी गलिन गुहार करूँ, लील्या गुदवा लो प्यारी।।
जब राधा जी ने यह आवाज सुनी तो तुरंत विशाखा सखी को भेजा, और उस लालिहारण को बुलाने के लिए कहा। घूंघट में अपने मुँह को छिपाते हुए कृष्ण राधा जी के सामने पहुंचे और उनका हाथ पकड़ कर बोले कि कहो सुकुमारी तुम्हारे हाथ पे किसका नाम लिखूं। तो राधा जी ने उत्तर दिया कि केवल हाथ पर नहीं मुझे तो पूरे अंग पर लील्या गुदवाना है और क्या लिखवाना है, किशोरी जी बता रही हैं।
माथे पे मनमोहन लिखो, पलकों पे पीताम्बर धारी !
नासिका पे नटवर लिख दो, कपोलों पे कृष्ण मुरारी |
अधरों पे अच्युत लिख दो, गर्दन पे गोवर्धन धारी !
कानो में केशव लिख दो, भृकुटी पे चार भुजाधारी !
गुदाओं पर ग्वाल लिख दो, नाभि पे नाग नथैया!
बाहों पे लिख दो बनवारी, हथेली पे दाउजी के भैया!
नखों पे नारायण लिख दो , पैरों पे जग पालनहारी!
चरणों में चितचोर लिख दो, मन में मोर मुकुट धारी!
नैनो में तू गोद दे रे, नंदनंदन की सूरत प्यारी!
रोम रोम पे लिख दे मेरे, रसिया रास बिहारी!
जब ठाकुर जी ने सुना कि राधा अपने रोम रोम पर मेरा नाम लिखवाना चाहती है, तो ख़ुशी से बौरा गए प्रभू उन्हें अपनी सुध न रही, वो भूल गए कि वो एक लालिहारण के वेश में बरसाने के महल में राधा के सामने ही बैठे हैं। वो खड़े होकर जोर जोर से नाचने लगे। उनके इस व्यवहार से किशोरी जी को बड़ा आश्चर्य हुआ की इस लालिहारण को क्या हो गया। और तभी उनका घूंघट गिर गया और ललिता सखी को उनकी सांवरी सूरत का दर्शन हो गया ,और वो जोर से बोल उठी कि अरे.. ये तो कृष्ण ही है। अपने प्रेम के इज़हार पर राधाजी बहुत शरमा गयी ,और अब उनके पास कन्हैया को क्षमा करने के आलावा कोई रास्ता न था।
कृष्ण भी राधा का अपने प्रति अपार प्रेम जानकर गदगद और भाव विभोर हो गए।….When Shri Radha ji came to know that Krishna is called butter thief in the whole Gokul, he felt very bad, he urged Krishna to give up stealing. But when Krishna doesn’t even listen to his mother, then how can he listen to his beloved. He continued his pastime of stealing butter. One day Radha got angry with Krishna for teaching him a lesson. Many days passed but she did not come to meet Krishna. When Krishna went to persuade him, he refused to talk even there. So Leeladhar thought of a leela to persuade his Radha. The woman who tattooed Lily in Braj is called Laliharan. So Krishna disguised himself as a Laliharan wearing a veil and started roaming in the streets calling for rain. When they came under the high atria of Barsane, Radha Rani, they started making noise.
I have come from far away village, see your high attic,
I am thirsty to see, give me darshan Vrishabhanu darling.
I request with folded hands, please accept our request,
I request you, please get Lily tattooed dear.
When Radha ji heard this voice, she immediately sent Visakha Sakhi, and asked her to call Laliharan. Hiding his face in the veil, Krishna reached in front of Radha ji and holding her hand said, Sukumari, whose name should I write on your hand. So Radha ji replied that not only on hand but I have to get lily tattooed on the whole body and what to get written, Kishori ji is telling.
Write Manmohan on your forehead, Pitambar stripe on your eyelids!
Write Natwar on Nasika, Krishna Murari on the cheeks.
Write Achyut on your lips, Govardhan Dhari on your neck!
Write Keshav in the ears, four arms on the forehead!
Write Gwal on the anus, Nag Nathaiya on the navel!
Write Banwari on your arms, Brother in law on your palm!
Write Narayan on your nails, the protector of the world on your feet!
Write chitchor in your feet, peacock crown in your mind!
Adopt me in Nano, Nandandan’s face is lovely!
Write me on Rome Rome, Rasiya Ras Bihari!
When Thakur ji heard that Radha wanted to get my name written on her hair, God was overwhelmed with happiness, he could not remember himself, he forgot that he was sitting in front of Radha in the palace of Barsane in the guise of Laliharan. He stood up and started dancing loudly. Kishori ji was very surprised by his behavior that what happened to this Laliharan. And only then his veil fell and Lalita Sakhi saw his beautiful face, and she said loudly that hey.. this is Krishna only. Radhaji was very ashamed at the expression of her love, and now she had no way other than to forgive Kanhaiya.
Knowing Radha’s immense love for him, Krishna also became giddy and emotional.

धर्म….Religion

भक्तों जैसे किसी भी वस्तु साधन आदि के निर्माण के लिए या उसको चलाने के लिए उसका एक आधार बनाया जाता है वैसे ही भगवान श्री कृष्ण ने इस ब्रह्माण्ड को सही व समानान्तर रूप से चलाने के लिए इसका एक भाग धर्म बनाया है धर्म ही इस ब्रह्माण्ड का आधार है ओर उसी तरह माया भी इस ब्रह्माण्ड एक भाग है भगवान श्री कृष्ण द्वारा बनाई गई इस माया का आभास हम कर सकते है लेकिन यह माया हमे तब समझ मे आती है जब समय व्यतीत हो जाता है कोई भी कार्य भगवान द्वारा बनाए गए समय या विधि अनुसार होता है भक्तों विधि का विधान समय के अनुसार पहले ही निश्चित होता है वह किसी मनुष्य या प्राणी के बदलने से नही बदलता और यही समय विधि के अनुसार निरन्तर चलता रहता है जिससे पुराने यगों का अंत और नए युगों का निर्माण होता रहता है इसी तरह प्रत्येक युग मे भगवान का अवतार भी विधि के अनुसार अवश्य होता है यह अवतार भगवान तब धारण करते है जब उस युग मे मनुष्य विज्ञान की चरम सीमा पर पहुँचकर खुद को भगवान से भी सर्वशक्तिमान समझने लग जाता है और उसके द्वारा किए गए कार्यो से धरती पर अधर्म ज्यादा बढ़ जाता है तब भगवान किसी न किसी रूप को धारण कर उन अधर्मियों का नाश कर धर्म की स्थापना करते है और वहीं से एक नए युग का भी प्रारंभ शुरू हो जाता है……..For the construction of any object, means etc. or to run it, a base is made, similarly Lord Shri Krishna has made religion a part of this universe to run it correctly and parallelly. It is the basis of this universe and in the same way Maya is also a part of this universeWe can feel this maya created by lord shri krishna, but we understand this maya only when time passes, any work is done according to the time or method made by god. It is certain that it does not change with the change of any human being or creature and that’s itTime goes on continuously according to the method, due to which the old ages end and new ages are created, similarly in every age, the incarnation of God also happens according to the method. After reaching the extreme limit, he started considering himself more powerful than Godgoes and due to the works done by him, unrighteousness increases more on the earth, then God assumes one form or the other and destroys those unrighteous and establishes religion and from there the beginning of a new era also begin.

हमे किसकी पूजा करनी चाहिए…..Who should we worship

प्रभु भक्तों अगर पूजा करनी है तो भगवान श्री कृष्ण की पूजा करें क्योकि भगवान श्री कृष्ण ही सर्वशक्तिमान है जो लोग भिन्न भिन्न देवताओं व पितरों की पूजा करते है वह उन देवताओं पितरों की पूजा से मनवांछित फल तो प्राप्त कर सकते है लेकिन भगवान श्री कृष्ण को प्राप्त नही कर सकते । भगवान श्री कृष्ण को अगर प्राप्त करना है तो केवल भगवान श्री कृष्ण की भावपूर्ण आराधना करें क्योकि यदि कोई प्रतिपल आपके साथ है तो वह केवल भगवान श्री कृष्ण है । भगवान श्री कृष्ण सदैव अपने भक़्त के सुख और दुख दोनों में उनके साथ रहते है और अपने भक्तों को निस्वार्थ भाव से प्रेम कर उनकी प्रतिपल रक्षा करते है इस लिए हमें पिता के रूप में भगवान श्री कृष्ण की और माता के रूप में जगतजननी श्री राधा रानी की आराधना करनी चाहिए जो भगत श्री राधेकृष्ण की आराधना करते है वह श्री राधेकृष्ण के ही चरणों मे स्थान प्राप्त करते है उनको किसी अन्य देव या पितर योनि में भटकने की आवश्यकता नही पड़ती । वह सीधे श्री राधेकृष्ण के चरणों मे ही स्थान प्राप्त करते है….if you want to worship, then worship Lord Shri Krishna, because Lord Shri Krishna is the Almighty, those who worship different gods and ancestors, they can get the desired results by worshiping those gods and ancestors. Yes, but do not get Lord Shri Krishna Can. possibility,power, If you want to get Lord Shri Krishna, then only worship Lord Shri Krishna passionately because if anyone is with you every moment then it is only Lord Shri Krishna. Lord Shri Krishna is always with his devotee in both happiness and sorrow and loves his devotees selflessly and protects them every moment, so we have Lord Shri Krishna as our father and Mother of the world, Shri Radha Rani. Should be worshiped who worships Bhagat Shri RadhekrishnaThey get a place at the feet of Shri Radhe Krishna, they don’t need to wander in any other god or ancestor’s vagina. He takes place directly at the feet of Shri Radha Krishna

गंगा कैसे प्रकट हुई….how did ganga appear

गंगावतरण – अंशुमान ने गंगा जी को लाने के लिए वर्षों तक घोर तपस्या की, परन्तु उन्हें सफलता प्राप्त नहीं हुई। अंशुमान के पुत्र दिलीप ने भी वैसी ही तपस्या की, परन्तु उन्हें भी सफलता नहीं मिली। समय आने पर उनकी भी मृत्यु हो गई। दिलीप के पुत्र भागीरथ ने भी बड़ी तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवती गंगा ने उन्हें दर्शन दिए और कहा कि मैं तुम्हें वर प्रदान करने के लिए आई हूँ। उनके ऐसा कहने पर राजा भागीरथ ने बड़ी नम्रता से अपना अभिप्राय प्रकट किया कि आप मृत्युलोक में चलिए। गंगा जी ने कहा- जिस समय मैं स्वर्ग से पृथ्वी तल पर गिरूँगी, उस समय मेरे वेग़ को कोई धारण करने वाला होना चाहिए। ऐसा न होने पर मैं पृथ्वी को मैं फोड़कर रसातल में चली जाऊँगी । भागीरथ ने कहासमस्त प्राणियों के आत्मा रुद्रदेव (शिवजी ) तुम्हारा वेग धारण कर सकते हैं क्योंकि यह सारा विश्व भगवान रुद्र में ही ओत-प्रोत है। भागीरथ ने तपस्या के द्वारा भगवान शंकर को प्रसन्न कर लिया। फिर शिवजी ने सावधान होकर गंगा जी को अपनी जटाओं में धारण कर लिया। इसके पश्चात् भागीरथ गंगा जी को वहाँ ले गए, जहाँ उनके पितरों के शरीर राख का ढेर बने पड़े थे। इस प्रकार गंगा को सागर- संगम पर पहुँचा कर उन पितरों को उद्धार करने में सफल रहे। वह स्थान गंगा सागर तीर्थ के नाम से प्रसिद्ध हुआ । भागीरथ के पुत्र का नाम श्रुत के और श्रुत के पुत्र का नाम नाभ था। नाभ के पुत्र का नाम सिंधु द्वीप और सिंधुद्वीप के पुत्र का नाम अयुतायु था। अयुतायु का पुत्र ऋतुपर्ण था जो नल का मित्र था। उसने नल को पासा फेंकने की विद्या का रहस्य समझाया था और बदले में उससे अश्वविद्या सीखी थी। ऋतुपर्ण का पुत्र सर्वकाम था। सर्वकाम के पुत्र का नमा सुदास और सुदास के पुत्र का नाम सौदास था। सौदास की पत्नी का नाम मदयन्ती था। सौदास वशिष्ठ के शाप से राक्षस बन गया था और अपने कर्मों के कारण सन्तानहीन रह गया। एक बार सौदास शिकार के लिए गए हुए थे। वहाँ । उन्होंने एक राक्षस को मार डाला और उसके भाई को छोड़ दिया। उसने राजा के इस काम को अन्याय समझा और उनसे अपने भाई का बदला लेने के लिए वह रसोइया बनकर उनके घर गया और रसोइये का काम करने लगा। एक दिन जब गुरु वशिष्ठ उनके यहाँ भोजन करने आए तो उसने ऋषि को मनुष्य का मांस परोस दिया । वशिष्ठ जी ने जब देखा कि परोसी गई वस्तु अभक्ष्य है तो उन्होंने क्रोध में भरकर राजा को श्राप दे दिया कि तू राक्षस बन जा। इस समय सौदास भी अपनी अंजलि में जल लेकर गुरु को शांप देने को उद्यत हुए तो उनकी पत्नी मदयन्ती ने उनको ऐसा करने से रोका। राजा ने अपनी अंजलि के जल को अपने पैरों पर डाला। इससे सौदास का नाम मित्रसह पड़ गया। जल के गिरने से उनके पैर काले पड़ गए थे इसलिए उनका नाम कल्माषपाद भी हुआ। अब वे राक्षस हो चुके थे। एक दिन राक्षस बने हुए राजा कल्माषपाद ने एक वनवासी ब्राह्मण दम्पति को सहवास के समय देख लिया। राक्षस ने उस ब्राह्मण को मार डाला। इस पर ब्राह्मणों ने शाप दिया कि तेरा कल्याण तब होगा जब तू स्त्री से सहवास करेगा। बारह वर्ष व्यतीत होने पर राजा सौदास शाप से मुक्त हो गया। उसने अपनी पत्नी से सहवास किया। उसकी पत्नी सात वर्ष तक गर्भ धारण किए रही परन्तु बच्चा पैदा नहीं हुआ। तब वशिष्ठ जी ने पत्थर से उसके पेट पर आघात किया। पत्थर की चोट से पैदा होने के कारण वह अश्मक कहलाया। अश्मक के पुत्र का नाम मूलक था । जब परशुराम जी पृथ्वी को क्षत्रिय हीन कर रहे थे तो स्त्रियों ने उसे छिपा लिया था। इसी से उसका नाम कवच पड़ गया। उसे मूलक इसलिए कहते हैं कि वह पृथ्वी के क्षत्रियहीन हो जाने पर उस वंश का मूल (प्रवर्त्तक ) बना । मूलक का पुत्र दशरथ, दशरथ का पुत्र ऐडविड और ऐडविड का पुत्र विश्वसह हुए। विश्वसह के पुत्र ही चक्रवर्ती सम्राट खटवांग हुए । युद्ध में उन्हें कोई जीत नहीं सकता था। उन्होंने देवताओं की प्रार्थना पर दैत्यों का वध किया। जब उन्हें देवताओं से पता चला कि अब मेरी आयु केवल दो ही घड़ी शेष है तो वे अपनी राजधानी लौट आए और अपने मन को भगवान में लगा दिया। भगवान की प्रेरणा से आत्मास्वरूप में स्थित हो गए। वह स्वरूप साक्षात् परब्रह्म था। वह सूक्ष्म से भी सूक्ष्म, शून्य के समान है। परन्तु वह शून्य नही, परम सत्य है । भक्तजन उसी वस्तु को भगवान वासुदेव इस नाम से वरण करते है….Gangavataran – Anshuman did severe penance for years to bring Ganga ji, but he did not get success. Anshuman’s son Dilip also did the same penance, but he too did not get success. He also died when the time came. Dilip’s son Bhagirath also did great penance. Pleased with his penance, Bhagwati Ganga appeared to him and said that I have come to give you a groom. On his saying so, King Bhagirath very humbly expressed his opinion that you should go to the land of death. Ganga ji said – At the time when I will fall from heaven to the earth, at that time there should be someone to hold my velocity. If this does not happen, I will break the earth and go into the abyss. Bhagirath said that Rudradev (Shivji), the soul of all beings, can hold your speed because this whole world is immersed in Lord Rudra only. Bhagirath pleased Lord Shankar through penance. Then Shivji being careful took Ganga ji in his hair. After this, Bhagirath took Ganga ji to the place where the bodies of his forefathers had become a pile of ashes. In this way, by taking Ganga to Sagar-Sangam, he was successful in rescuing those ancestors. That place became famous by the name of Ganga Sagar Tirtha. Bhagiratha’s son’s name was Shruta’s and Shruta’s son’s name was Nabha. Nabha’s son’s name was Sindhu Dweep and Sindhudweep’s son’s name was Ayutayu. Ayutayu’s son was Rituparna who was a friend of Nala. He explained the secret of throwing dice to Nal and in return learned horsemanship from him. The son of Rituparna was Sarvakama. Sarvakama’s son’s name was Sudas and Sudas’s son’s name was Saudas. Saudas’s wife’s name was Madayanti. Saudasa was cursed by Vashishtha to become a demon and due to his deeds remained childless. Once Saudas had gone for hunting. There . He killed a demon and released his brother. He considered this work of the king as injustice and to take revenge of his brother from him, he went to his house as a cook and started working as a cook. One day when Guru Vashishtha came to eat at his place, he offered human flesh to the sage. When Vashishtha ji saw that the item served was inedible, he cursed the king in anger that you become a demon. At this time Saudas also wanted to curse the Guru by taking water in his hands, but his wife Madayanti stopped him from doing so. The king poured his Anjali’s water on his feet. Due to this the name of Saudas was changed to Mitrasah. His feet turned black due to the fall of water, hence he was also named Kalmashpad. Now they had become demons. One day King Kalmashapada, who became a demon, saw a forest-dwelling Brahmin couple at the time of cohabitation. The demon killed that Brahmin. On this the Brahmins cursed that your welfare will happen when you cohabit with a woman. After lapse of twelve years, King Soudas was freed from the curse. He cohabited with his wife. His wife was pregnant for seven years but the child was not born. Then Vashishtha ji hit his stomach with a stone. He was called Ashmaka because he was born from a stone injury. Ashmak’s son’s name was Mulak. When Parshuram ji was making the earth inferior to the Kshatriyas, the women had hidden him. That’s why he got the name Kavach. He is called Moolak because he became the originator of that dynasty when the earth became devoid of Kshatriyas. Mulak’s son was Dasaratha, Dasaratha’s son was Edvid and Edvid’s son was Vishwasah. Chakraborty Samrat Khatwang was the son of Vishwasah. No one could win him in battle. He killed the demons on the prayer of the gods. When he came to know from the gods that now only two hours are left for his life, he returned to his capital and fixed his mind on God. By the inspiration of God, he became established in the form of soul. That form was actually Parabrahma. He is more subtle than subtle, like zero. But it is not empty, it is the ultimate truth. Devotees describe the same thing by the name of Lord Vasudev.

श्री राम कथा , राम चरित्र , सीता हरण , रावण वध , लव – कुश चरित्र….Shri Ram Katha, Ram Charitra, Sita Haran, Ravana Vadh, Luv-Kush Charitra

खटवांग के पुत्र दीर्घबाहु, दीर्घबाहु के पुत्र रघु, रघु के पुत्र अज और अज के पुत्र दशरथ हुए। देवताओं की प्रार्थना पर साक्षात् परब्रह्म श्रीहरि अपने अंशांश से चार रूप धारण करके राजा दशरथ के पुत्र हुए। उनके नाम थे – राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न । जब ये युवा हो गए तब विश्वामित्र जी अपने यज्ञ की रक्षा के लिए श्रीराम और लक्ष्मण को लाए। उन्होंने वहाँ पर अनेक राक्षसों का वध किया। विश्वामित्र जी उनको साथ लेकर राजा जनक जी के सीता स्वयंवर में उपस्थित हुए। धनुष को तोड़कर सीता जी के साथ श्रीरामचन्द्र जी का विवाह हुआ। श्रीरामचन्द्र जी पिता की आज्ञा पाकर सीता जी और लक्ष्मण के साथ चौदह वर्ष के लिए वनों में चले गए। रास्ते में उन्होंने अनेक राक्षसों का विध्वंस किया। राक्षस राज रावण की बहिन शूर्पणखा के नाक, कान काट कर भेजा। रावण ने खर, दूषण, त्रिशिरा आदि बड़े-बड़े राक्षसों को अपनी बहिन के अपमान का बदला लेने भेजा। भगवान राम ने सब का वध कर दिया। रावण ने मारीच को अद्भुत हरिण के वेष में उनकी पर्ण कुटि के पास भेजा। वह धीरे-धीरे भगवान श्रीराम को वहाँ से दूर ले गया। अन्त में भगवान श्रीराम ने अपने बाण से उसे बात की बात में वैसे ही मार डाला जैसे दक्ष प्रजापति को वीरभद्र ने मारा था । जब श्री राम जंगल में दूर निकल गए तब लक्ष्मण की अनुपस्थिति में नीच राक्षस रावण ने भेड़िए के समान सुकुमारी सीताजी को हर लिया। रास्ते में रावण का जटायु से युद्ध हुआ। रावण ने जटायु के पंख काटकर वध कर दिया। भगवान राम से उसकी भेंट हुई। फिर उन्होंने जटायु का अन्तिम संस्कार किया। जटायु ने ही श्रीराम को बताया कि रावण माताश्री सीताजी को ले गया है। फिर भगवान ने कबन्ध का संहार किया और इसके अनन्तर सुग्रीव आदि वानरों से मित्रता करके बालि का वध किया। तद्नन्तर वानरों के द्वारा अपनी प्राणप्रिया का पता लगवाया। ब्रह्मा और शंकर जिनके चरणों की वन्दना करते हैं, वे भगवान श्रीराम मनुष्य की सी लीला करते हुए बन्दरों की सेना के साथ समुद्र तट पर पहुँचे। श्री हनुमानजी सीताजी का पता लगाने हेतु गए तो वहाँ उन्होंने लंका को जला डाला। वानरों की सेना सहित समुद्र पर बाँधकर लंका पर चढ़ाई की। रावण को यह पता चलने पर कि राम समुद्र को पार कर लंका में आ गए हैं तो रावण ने सेना लेकर उन पर चढ़ाई की। रावण के पुत्र और भाई इस युद्ध में मारे गए । अन्त में भगवान श्रीराम ने रावण को भी मार डाला। रावण के भाई विभीषण को लंका का राज्य सौंप कर सीता सहित अयोध्या लौट आए। अयोध्या वासियों ने बड़ी धूमधाम के साथ उनका स्वागत किया। विश्वामित्र, वशिष्ठ आदि ऋषियों ने उनका राजतिलक किया। भगवान ने प्रजा का स्वागत करके उनको धन, वस्त्र, और सोना तथा गाएँ आदि भेंट में दीं। भगवान श्रीराम महात्माओं को पीड़ा नहीं पहुँचाते थे । एवं ब्राह्मणों को अपना इष्टदेव मानते थे। प्रजा की स्थिति जानने के लिए रात को घूमा करते थे। एक दिन एक धोबी अपनी पत्नी को पीट रहा था और कह रहा था – अरी दुष्टा और कुलटा! तू पराये घर में रह आई है । स्त्री लोभी राम भले ही सीता को रख लें, परन्तु मैं तुझे नहीं रख सकता। जब भगवान श्रीराम ने बहुतों के मुँह से ऐसी बातें सुनीं तो वे लोकयवाद से कुछ भयभीत हो गए। उन्होंने सीताजी का परित्याग कर दिया। वे बाल्मीकि मुनि के आश्रम में रहने लगीं। सीता जी उस समय गर्भवती थीं। समय आने पर लव और कुश नामक दो पुत्रों को उन्होंने जन्म दिया । बाल्मीकि मुनि ने उनके जातकर्मादि संस्कार किए। लक्ष्मण जी के भी अंगद और चित्रकेतू नाम के दो पुत्र हुए। भरत जी के भी तक्ष और • पुष्कल दो पुत्र हुए। शत्रुघ्न के भी सुबाहु और श्रुतसेन दो पुत्र हुए। भगवान श्री रामचन्द्र जी ने अश्वमेघ यज्ञ किया । यज्ञ का बलि घोड़ा छोड़ा गया । लव-कुश ने उस घोड़े को पकड़ लिया। लक्ष्मण जी ने घोड़े को छुड़ाने का प्रयत्न किया किन्तु घोड़े को छुड़ाने में असफल रहे । भगवान श्रीराम स्वयं घोड़े को छुड़ाने आए। सीताजी ने लव-कुश से कहा- ये तो तुम्हारे पिताश्री हैं। इस पर भगवान श्री राम ने उन्हें अपने हृदय से लगा लिया। सीताजी धरती माता की गोद में समा गईं। भगवान श्री रामचन्द्रजी अपने पुत्रों को राज्य सौंपकर ज्योतिर्मय धाम को चले गए।….Description of pastimes of Lord Shri Ram – Khatwang’s son was Dirghbahu, Dirghbahu’s son Raghu, Raghu’s son Aj and Aj’s son Dasharatha. On the prayer of the deities, Parabrahma Shri Hari incarnated in four forms from his part and became the son of King Dasaratha. Their names were – Ram, Lakshman, Bharat and Shatrughan. When he became young, Vishwamitra ji brought Shri Ram and Lakshman to protect his Yagya. He killed many demons there. Vishwamitra ji took him along with him and attended Sita Swayamvara of King Janak ji. By breaking the bow, Shri Ramchandra ji got married with Sita ji. Shri Ramchandra ji went to the forests for fourteen years with Sita ji and Lakshman after getting the permission of his father. On the way he destroyed many demons. Ravana’s sister Shurpanakha was sent by cutting off her nose and ears. Ravana sent big demons like Khar, Dushan, Trishira etc. to avenge the insult of his sister. Lord Ram killed everyone. Ravana sent Marich in the guise of a wonderful deer to his leaf hut. He slowly took Lord Shriram away from there. In the end, Lord Shri Ram killed him with his arrow in the same way as Virbhadra had killed Daksh Prajapati. When Sri Rama went away in the forest, in the absence of Lakshmana, the vile demon Ravana abducted Sukumari Sitaji like a wolf. On the way Ravana had a fight with Jatayu. Ravana killed Jatayu by cutting his wings. He met Lord Rama. Then he performed the last rites of Jatayu. It was Jatayu who told Shriram that Ravana had taken Matashree Sita. Then God killed Kabandha and after this, Sugriva etc. befriended the monkeys and killed Bali. After that, he got the address of his beloved through the monkeys. Lord Shri Ram, whose feet are worshiped by Brahma and Shankar, reached the beach with an army of monkeys, performing like a human. When Shri Hanumanji went to find Sitaji, he burnt Lanka there. Tied to the sea along with the army of monkeys, he marched on Lanka. When Ravana came to know that Rama had crossed the sea and came to Lanka, Ravana took his army and attacked him. Ravana’s sons and brothers were killed in this war. In the end, Lord Shriram killed Ravana as well. After handing over the kingdom of Lanka to Ravana’s brother Vibhishana, he returned to Ayodhya along with Sita. The people of Ayodhya welcomed him with great fanfare. Vishwamitra, Vashishtha etc. sages crowned him. God welcomed the people and gifted them money, clothes, and gold and cows etc. Lord Shri Ram did not cause pain to the great souls. And used to consider Brahmins as their presiding deities. Used to roam around at night to know the condition of the subjects. One day a washerman was beating his wife and saying – Are you wicked and wretched! You have been living in someone else’s house. Woman greedy Ram may keep Sita, but I cannot keep you. When Lord Shri Ram heard such things from the mouth of many, he got a little scared of Lokayavad. He abandoned Sitaji. She started living in Valmiki Muni’s ashram. Sita ji was pregnant at that time. When the time came, she gave birth to two sons named Luv and Kush. Valmiki Muni performed his Jatkarmadi rituals. Lakshman ji also had two sons named Angad and Chitraketu. Bharat ji also had two sons Taksh and Pushkal. Shatrughan also had two sons, Subahu and Shrutsen. Lord Shri Ramchandra ji performed Ashwamedh Yagya. The sacrificial horse of Yagya was released. Luv-Kush caught that horse. Lakshman ji tried to free the horse but failed to free the horse. Lord Shriram himself came to rescue the horse. Sitaji said to Luv-Kush – He is your father. On this, Lord Shriram hugged him with his heart. Sitaji got absorbed in the lap of Mother Earth. Lord Shri Ramchandraji handed over the kingdom to his sons and went to Jyotirmay Dham..

नारद जी कौन थे नारद जी किसके पुत्र थे नारद जी किसका भजन करते है….Who was Narad ji, whose son was Narad ji, whom does Narad ji worship

एक बार की बात है कि जब श्री वेदव्यास जी वेदों का विभाजन कर रहे थे तो श्री नारद जी वहाँ पधारें। नारद जी को आया देख उनके • स्वागत के लिए श्री वेद व्यास जी उठकर खड़े हो गए। उन्होंने देवताओं द्वारा सम्मानित देवर्षि नारद जी की पूजा अर्चना की। व्यास जी बोले- नारद जी आप ब्रह्मा जी के मानस पुत्र हो और आपको ज्ञान भी अगाध है। आप अपने पूर्व जीवन के सम्बन्ध में बतलाइए । इस प्रकार व्यास जी और नारद जी ज्ञान शास्त्र और अन्य शास्त्रों के विषय में आपस में वार्तालाप करने लगे । नारद जी ने व्यास जी को बताया मैं अपनी अकेली दासी माता के साथ रहता था । समय मिलने पर मैं इधर-उधर खेलता फिरता रहता था तथा ऋषियों के आश्रम में भी चला जाता था । आश्रम में मैं उनके उपदेश सुना करता था और उनका झूठा भोजन खाकर पेट भर लिया करता था । ऋषियों की संगत में रहने के कारण मेरा हृदय भी ज्ञान से प्रकाशित हो गया। कुछ समय बाद मेरी दासी माँ को सर्प ने डस लिया। इससे उनकी मृत्यु हो गई। मैं अकेला ही घूमा करता था। एक दिन सतसंग में मुझे ज्ञान प्राप्त हुआ। मैं तपस्या हेतु उत्तर दिशा में चला गया और एक पीपल के वृक्ष के नीचे बैठकर धीरे- धीरे मै भगवान नारायण के ध्यान में मग्न हो गया। कुछ समय पश्चात् मुझे भगवान के दर्शन हुए। श्री भगवान ने मुझे बताया कि मन की शान्ति और मोक्ष प्राप्त करना बहुत कठिन है। लेकिन मै तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न हूँ और तुम्हें भक्ति और ज्ञान मार्ग द्वारा मोक्ष प्राप्ति का साधन बताता हूँ तब मैंने श्री भगवान के द्वारा बताई क्रियाओं को अपने जीवन में धारण कर लिया । समय आने पर मेरी मृत्यु हो गई । भगवान की कृपा से मुझे सद्गति प्राप्त हुई । नारद जी ने व्यास जी को बताया कि एक बार जब भगवान क्षीर सागर में शयन कर रहे थे तब भगवान की नाभि से प्रकट हुए कमल से उस कमल पर बैठे ब्रह्माजी ने कमल डण्डी का अन्त प्राप्त करने के लिए कमल की डण्डी में प्रवेश किया लेकिन ब्रह्मा जी को उस डण्डी का अंत प्राप्त नही हुआ , जिस समय ब्रह्मा जी कमल डण्डी का अंत खोज रहे थे तब मैं अपने भाग्य वश ब्रह्मा जी के श्वास द्वारा उनके हृदय में प्रवेश कर गया । डण्डी का अंत न मिलने के कारण ब्रह्मा जी निराश होकर वापिस लौटकर उस कमल पर खड़े होकर चारों और देखने लगे तब उन्होंने दोबारा भगवान का स्मरण किया तब उनको यह शब्द सुनाई दिया ” तप करो ” तब ब्रह्मा जी उस कमल पर योग निद्रा में बैठ गए फिर एक हज़ार चतुर्युगी बीत जाने पर ब्रह्माजी की योगनिद्रा से आंखे खुली और उनको दोबारा सृष्टि की रचना करने की इच्छा प्रकट हुई। तब ब्रह्माजी ने अपनी इन्द्रियों से मरीचि आदि ऋषियों के साथ मुझे भी प्रकट किया । तब से मैं तीनों लोकों में बाहर-भीतर बिना किसी रोक-टोक के विचरण करता रहता हुँ……Once upon a time, when Shri Vedvyas ji was dividing the Vedas, Shri Narad ji should come there. Shri Ved Vyas ji got up and stood up to welcome Narad ji. He worshiped Devarshi Narad ji, honored by the gods. Vyas ji said – Narad ji, you are the son of Brahma ji and your knowledge is also immense. Tell me about your past life. In this way, Vyas ji and Narad ji started talking among themselves about the science of knowledge and other scriptures. Narad ji told Vyas ji that I used to live with my single maid mother. When I got time, I used to play here and there and also used to go to the ashrams of sages. I used to listen to his sermons in the ashram and used to fill my stomach by eating his fake food. Being in the company of sages, my heart also became enlightened with knowledge. After some time my maid mother was bitten by a snake. Due to this he died. I used to roam alone. One day I got knowledge in satsang. I went to the north for penance and sitting under a Peepal tree, I gradually got engrossed in the meditation of Lord Narayan. After some time I saw God. Sri Bhagavan told me that it is very difficult to attain peace of mind and salvation. But I am pleased with your penance and tell you the means of attaining salvation through the path of devotion and knowledge, then I adopted the activities told by Shri Bhagwan in my life. I died when the time came. By the grace of God, I attained salvation.Narad ji told Vyas ji that once when Lord Kshir was sleeping in the ocean, then Brahmaji, sitting on that lotus, entered the lotus stem to get the end of the lotus stem from the lotus that appeared from the navel of the Lord, but Brahma ji did not get the end of that stick, at the time when Brahma ji got the end of the lotus stickWhen he was searching, I entered his heart by the breath of Brahma ji under the influence of my luckDue to not getting the end of the rod, Brahma ji returned disappointed and started standing on that lotus and looked around, then he remembered God again, then he heard the word “do penance”, then Brahma ji sat on that lotus in yoga nidra. Then after one thousand Chaturyugi passed, Brahmaji’s eyes opened from YognidraHe had the desire to create the universe again.Then Brahmaji revealed me with his senses along with Marichi etc. sages. Since then I used to roam freely in all the three worlds without any hindrance.

वासुदेव देवकी विवाह , कंस द्वारा देवकी की हत्या का प्रयास, वासुदेव का कंस को वचन देना….Marriage of Vasudeva Devaki, Kansa’s attempt to kill Devaki, Vasudeva’s promise to Kansa

एक बार शूरसेन के पुत्र वसुदेव देवकी को ब्याह कर अपनी नवपरिणीता पत्नी के साथ रथ पर चढ़कर अपने घर जा रहे थे । देवकी के पिता, देवक, ने प्रचुर दहेज दिया था, क्योंकि वह अपनी पुत्री को अत्यधिक चाहता था। उसने सैकड़ों रथ दिये थे, जो पूर्णतया स्वर्णमण्डित थे। उस समय उग्रसेन का पुत्र कंस अपनी चचेरी बहन देवकी को प्रसन्न करने के लिए वसुदेव के रथ के घोड़ों की रास स्वेच्छा से अपने हाथ में लेकर हाँकने लगा था। वैदिक सभ्यता की प्रथानुसार जब कन्या का ब्याह होता है, तो उसका भाई अपनी बहन तथा अपने बहनोई को उनके घर ले जाता है। नवविवाहिता कन्या को अपने पिता के परिवार का विछोह न खले, इसलिए भाई उसके साथ तब तक जाता है जब तक वह अपनी ससुराल न पहुँच जाये। देवक ने जो पूरा दहेज दिया था वह इस प्रकार था: स्वर्णहारों से मण्डित ४०० हाथी, १५,००० सुसज्जित घोड़े तथा १,८०० रथ। उसने अपनी पुत्री के साथ जाने के लिए २०० सुन्दर बालिकाएँ भी भेजने की व्यवस्था की थी। क्षत्रियों की विवाह-प्रणाली, जो भारत में अब भी प्रचलित है, बताती है कि जब क्षत्रिय का विवाह हो, तो दुलहिन के अतिरिक्त उस की कुछ दर्जन तरुण सहेलियाँ भी राजा के घर जाँये। रानी की अनुचरियाँ दासी कहलाती हैं, किन्तु वास्तव में वे रानी की सहेलियों की तरह कार्य करती हैं। यह प्रथा अनादि काल से प्रचलित है और कम से कम ५००० वर्ष पूर्व भगवान् कृष्ण के अवतार के भी पहले से खोजी जा सकती है। इस प्रकार वसुदेव अपनी पत्नी देवकी के साथ दो सौ सुन्दर कन्याएँ श्री लेते आये । जब दूल्हा तथा दुलहन रथ में जा रहे थे, तो इस शुभ मुहूर्त की जानकारी देने के लिए अनेक प्रकार के बाजे बज रहे थे। शंख, बिगुल, ढोल तथा मृदंग एकसाथ मिलकर मधुर संगीत (समूह वादन) की ध्वनि उत्पन्न कर रहे थे। जुलूस अत्यन्त मनोहर ढंग से निकल रहा था और कंस रथ को हाँक रहा था। तभी आकाश से अचानक एक आश्चर्यजनक ध्वनि गूँजी जिसने विशेष रूप से कंस को उद्बोधित किया, “हे कंस! तुम कितने मूर्ख हो! तुम अपनी बहन तथा बहनोई का रथ हाँक रहे हो किन्तु तुम यह नही जानते कि तुम्हारी इसी बहन की आठवीं सन्तान तुम्हारा वध करेगी । आकाशवाणी के सुनते ही कंस ने देवकी के केश पकड़ लिए ओर उसे अपनी तलवार से मारना चाहा किन्तु वासुदेव ने कंस को रोक दिया और समझाते हुए कहा कि यदि यह आकाशवाणी सत्य है तो मै तुम्हे वचन देता हूँ कि मै स्वयं देवकी की आठवीं सन्तान आपको सोंप दूँगा……Once Shursen’s son Vasudev was going to his home after marrying Devaki with his newly wedded wife on a chariot. Devaki’s father, Devaka, had given a rich dowry because he was very fond of his daughter. He had given hundreds of chariots, which were completely gold plated. At that time, Kansa, the son of Ugrasena, voluntarily took the reins of Vasudev’s chariot in his hands to please his sister Devaki. According to the custom of Vedic civilization, when a girl is married, her brother takes his sister and his brother-in-law to their house. The newly married girl does not want to be separated from her father’s family, so the brother accompanies her until she reaches her in-laws’ place. The entire dowry given by Devaka was as follows: 400 elephants adorned with gold ornaments, 15,000 well-equipped horses and 1,800 chariots. He had also arranged to send 200 beautiful girls to accompany his daughter. The marriage system of the Kshatriyas, which is still prevalent in India, states that when a Kshatriya is married, apart from the bride, a few dozen of her young friends should also go to the king’s house. The concubines of the queen are called dasis, but in reality they act like the queen’s friends. This practice has been prevalent since time immemorial and can be traced back at least 5000 years before the incarnation of Lord Krishna. In this way Vasudev brought two hundred beautiful girls with his wife Devaki. When the bride and groom were going in the chariot, various musical instruments were played to announce the auspicious time. Conch shell, bugle, drum and mridang together were producing the sound of melodious music (group playing). The procession was going out very gracefully and Kansa was driving the chariot. Then suddenly a wonderful sound resounded from the sky which specially addressed Kansa, “O Kansa! How foolish you are! You are driving the chariot of your sister and brother-in-law, but you do not know that the eighth child of your own sister will kill you.” Will doOn hearing the Akashvani, Kansa grabbed Devaki’s hair and wanted to kill her with his sword, but Vasudev stopped Kansa and explained that if this Akashvani is true, then I promise you that I myself will hand over the eighth child of Devaki to you. Will giv

कामनाओं की पूर्ति के लिए किन देवताओं की पूजा करें…..Which gods should be worshiped for the fulfillment of wishes

मनुष्य को अपनी इच्छा पूरी करने के लिए घर मे निम्नलिखित देवताओं की उपासना करनी चाहिए :जिस व्यक्ति को ब्रह्मतेज की आवश्यकता हो उसे बृहस्पति जी की उपासना करनी चाहिए। जिस व्यक्ति को सन्तान की इच्छा हो उसे प्रजापतियों की उपासना करनी चाहिए। जिस व्यक्ति को लक्ष्मी की इच्छा हो उसे कुबेर और वरुण की उपासना करनी चाहिए। जिस व्यक्ति को स्वर्ग की इच्छा हो उसे अदिति के पुत्र देवताओं की उपासना करनी चाहिए। जिस प्राणी को राज्य की अभिलाषा हो उसे विश्वदेवों की उपासना करनी चाहिए। जिस व्यक्ति को सबका स्वामी बनने की इच्छा हो उसे ब्रह्माजी की उपासना करनी चाहिए। जिस प्राणी को विद्या प्राप्त करने की इच्छा हो उसे भगवान शंकर की उपासना करनी चाहिए । पति-पत्नी में प्रेम बनाए रखने के लिए पार्वती जी की उपासना करनी चाहिए । धर्म की उपार्जना के लिए विष्णु भगवान की उपासना. करनी चाहिए। मोक्ष की प्राप्ति के लिए भक्तियोग द्वारा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम की उपासना करनी चाहिए। भोगों की प्राप्ति के लिए चन्द्रमा की और निष्कामता की प्राप्ति के लिए परम पुरुष नारायण की उपासना करनी चाहिए ।…….Man should worship the following deities at home to fulfill his desire The person who needs Brahmatej should worship Brihaspati ji. The person who wishes to have children should worship Prajapatis. The person who desires Lakshmi should worship Kubera and Varuna. One who desires heaven should worship the gods, the sons of Aditi. The creature who has the desire of the kingdom should worship the world gods. The person who wants to become the master of all should worship Lord Brahma. The creature who has the desire to get knowledge should worship Lord Shankar. To maintain love between husband and wife, one should worship Goddess Parvati. Worship of Lord Vishnu to earn Dharma. Should do To attain salvation, one should worship Lord Shri Ram, the Supreme Personality of Godhead, through Bhakti Yoga. For the attainment of pleasures, the moon should be worshiped and for the attainment of desirelessness, the supreme man Narayan should be worshipped.

श्री कृष्ण गोवर्धन लीला , श्री कृष्ण गिरिराज धरण , श्री कृष्ण ने इंद्र का अहंकार तोड़ा….Shri Krishna Govardhan Leela, Shri Krishna Giriraj Dharan, Shri Krishna broke the ego of Indra –

भगवान श्री कृष्ण ने चौपाल में जाकर नंदरॉय, उपन्द आदि गोपों को स्पष्ट शब्दों में कह दिया, बाबा आज से ब्रज में देवराज इंद्र की पूजा नहीं होगी बल्कि गिरिराज गोवर्धन की पूजा होगी। यदि आप लोगों ने मेरी बात नहीं मानी तो वृन्दावन छोड़कर चला जाऊँगा फिर कभी लौट कर नहीं आऊँगा। श्रीकृष्ण का रूठना तो उनको गवारा था ही नहीं इसलिए सभी एक स्वर में बोले नहीं नहीं कान्हा जैसा तुम बोलोगे वैसा ही करेंगे। किंतु इस बार तो कर लेने दें सारी सामग्री जा चुकी है, गोवर्धन की पूजा अलग सामग्री लेकर कर लेंगे कान्हा ने कहा नहीं नहीं इसी सामग्री से ही गोवर्धन की पूजा करनी है, गिरिराज गोवर्धन मुझे अत्यंत प्रिय है और देवराज इंद्र की पूजा आज और अभी से बंद करनी है। सभी ब्रजवासी सहमत हो गए और सारी भोज्य सामग्री लेकर गोवर्धन की तलहटी में जाकर गिरिराज की पूजा करी। जब देवराज इन्द्र को ज्ञात हुआ कि ब्रजवासियों ने उसकी पूजा बंद कर दी है तो तत्काल संवर्तक बदल को आदेश दिया कि जाओ प्रलयकारी वर्षा करो। उन ब्रजवासियों ने उस कृष्ण के कहने से हमारी पूजा बंद की है अब हम ब्रजवासियों को जीवित नहीं छोड़ेंगे। चारों तरफ़ भीषण वर्षा होने लगी सभी ब्रजवासी दौड़ कर नन्द भवन आए और कहने लगे हे कन्हैया आपके कहने से हमने इन्द्र की पूजा बंद करी थी अब आप ही इन्द्र के कोप से हमें बचाओ।भगवान श्रीकृष्ण ने कहा ब्रजवासियों डरने की कोई बात नहीं है, इन्हीं गिरिराज की पूजा करने से इन्द्र रुष्ट हुआ है अब ये गिरिराज ही आपकी रक्षा करेंगे ऐसा कहकर भगवान श्रीकृष्ण ने वामहस्त की कनिष्ठका अंगुली के नाख़ून के ऊपर गिरिराज गोवर्धन को धारण कर लिया। सभी ब्रजवासी अपने सामान सहित उसके नीचे आ गए। इन्द्र ने वायुदेव को आदेश दिया कि जाओ इस पर्वत को गिरा दो ताकि ब्रजवासियों की दबकर मृत्यु हो जाए और स्वयं भी वज्रपात करने लगा। सात दिन सात रात तक मुसलाधार वर्षा, तेज वायु और वज्रपात लगातार चलता रहा। चारों ओर ब्रजमंडल में सागर बन गया किन्तु गोवर्धन के नीचे पानी नहीं भरा क्योंकि भगवान ने वासुकी सर्प को आदेश दिया था जिससे वासुकी सर्प गोवर्धन के चारों ओर लिपट गया था जिससे पानी नहीं भरा। अब भगवान ने अपना सौंदर्य बढ़ाना शुरू किया। वैसे तो भगवान अद्भुत सुन्दर हैं किन्तु सुंदरता नामक गुण का इतना विस्तार किया कि जो जहां देख रहा था, वहीं देखता रह गया, पलक झपकते नहीं बनी। भगवान का इतना सुंदर स्वरूप कि सभी ब्रजवासी सात दिन सात रात बिना भूख प्यास के केवल भगवान श्री कृष्ण को देखते रहे। किसी को फ़ुरसत ही नहीं हुई कि वहाँ से दृष्टि हटा सकें। तत्पश्चात् भगवान श्री कृष्ण ने अगस्त ऋषि का स्मरण किया कि आइए मैंने पूर्वकाल में आपको जल पिलाने का वचन दिया था अब जल पीने का अवसर आ गया है, व्रजमंडल में सागर तुल्य जल भरा हुआ है इसे पी जाओ अगस्त ऋषि आए और एक ही घूँट में सारा जल पी गये। थोड़ी ही देर में वहाँ पर धूल उड़ने लगी। इंद्र देखकर हैरान रह गया। वासुकी सर्प भी चला गया। भगवान श्री कृष्ण के कहने पर सभी ब्रजवासी गोवर्धन के नीचे से बाहर आ गये और भगवान श्री कृष्ण ने गिरिराज गोवर्धन को यथास्थल विराजमान कए …….Lord Shri Krishna went to the chaupal and told the Gopas like Nandaroy, Upand etc. in clear words, Baba, from today onwards Devraj Indra will not be worshiped in Braj, but Giriraj Govardhan will be worshipped. If you people do not listen to me, then I will leave Vrindavan and will never come back again. He could not tolerate the anger of Shri Krishna, so everyone said in one voice, no, no, Kanha, as you say, you will do as you say. But let’s do it this time, all the material is gone, we will worship Govardhan with different material. to be closed from All the Brajvasis agreed and went to the foothills of Govardhan and worshiped Giriraj with all the food items. When Devraj Indra came to know that the Brajvasis had stopped worshiping him, he immediately ordered Samvartak Badal to go and cause catastrophic rain. Those Brajvasis have stopped worshiping us at the behest of that Krishna, now we will not leave Brajvasis alive. It started raining heavily all around and all the people of Braj came running to Nand Bhawan and said, O Kanhaiya, we had stopped worshiping Indra because of your saying, now you only save us from the wrath of IndraLord Shri Krishna said Brajvasis have nothing to fear, Indra got angry by worshiping this Giriraj, now only this Giriraj will protect you, saying that Lord Krishna put Giriraj Govardhan on the nail of the little finger of his left hand. All the residents of Braj along with their belongings came under him. Indra ordered Vayudev to go and demolish this mountain so that the Brajvasis would die under pressure and he himself started thunderbolts. Torrential rain, strong wind and thunderclap continued continuously for seven days and seven nights. The ocean was formed all around in Brajmandal but the water did not fill below Govardhan because God had ordered Vasuki snake which wrapped around Govardhan so that water did not fill. Now God started increasing his beauty. Although God is amazingly beautiful, but he expanded the quality called beauty so much that wherever he was looking, he kept looking there, he did not blink an eye. Such a beautiful form of God that all the people of Braj kept looking only at Lord Shri Krishna for seven days and seven nights without hunger and thirst. No one had time to take his eyes off from there. After that Lord Shri Krishna remembered Agastya Rishi that come, I had promised to give you water in the past, now the opportunity has come to drink water, Vrajmandal is full of ocean like water, drink it Agastya Rishi came and in one gulp Drank all the water. In a short while dust started flying there. Indra was surprised to see. Vasuki the snake also went away. At the behest of Lord Shri Krishna, all the Brajvasis came out from under Govardhan and Lord Shri Krishna made Giriraj Govardhan sit at its place..