श्री कृष्ण वंश , श्री राम वंश….Shri Krishna Vansh , Shri Ram Vansh

जिस वंश में कृष्ण प्रकट हुए वह यदुवंश कहलाता है। यह यदु वंश सोम अर्थात् चन्द्रलोक के देव से चला आ रहा है। राजवंशी क्षत्रियों के दो मुख्य कुल हैं-एक चन्द्रलोक के राजा से अवतरित है (चन्द्रवंशी) तथा दूसरा सूर्य के राजा से अवतरित (सूर्यवंशी) है। जब जब भगवान् अवतरित होते हैं, तब प्रायः वे …

श्री राधाकृष्ण प्रेम कथा….shri radhakrishna love story

श्री राधा जी को जब यह पता चला कि कृष्ण पूरे गोकुल में माखन चोर कहलाता है तो उन्हें बहुत बुरा लगा, उन्होंने कृष्ण को चोरी छोड़ देने का बहुत आग्रह किया। पर जब कृष्ण अपनी माँ की ही नहीं सुनते तो अपनी प्रियतमा की कंहा सुनते । उन्होंने माखन चोरी की अपनी लीला को …

धर्म….Religion

भक्तों जैसे किसी भी वस्तु साधन आदि के निर्माण के लिए या उसको चलाने के लिए उसका एक आधार बनाया जाता है वैसे ही भगवान श्री कृष्ण ने इस ब्रह्माण्ड को सही व समानान्तर रूप से चलाने के लिए इसका एक भाग धर्म बनाया है धर्म ही इस ब्रह्माण्ड का आधार है ओर उसी तरह …

हमे किसकी पूजा करनी चाहिए…..Who should we worship

प्रभु भक्तों अगर पूजा करनी है तो भगवान श्री कृष्ण की पूजा करें क्योकि भगवान श्री कृष्ण ही सर्वशक्तिमान है जो लोग भिन्न भिन्न देवताओं व पितरों की पूजा करते है वह उन देवताओं पितरों की पूजा से मनवांछित फल तो प्राप्त कर सकते है लेकिन भगवान श्री कृष्ण को प्राप्त नही कर सकते । …

गंगा कैसे प्रकट हुई….how did ganga appear

गंगावतरण – अंशुमान ने गंगा जी को लाने के लिए वर्षों तक घोर तपस्या की, परन्तु उन्हें सफलता प्राप्त नहीं हुई। अंशुमान के पुत्र दिलीप ने भी वैसी ही तपस्या की, परन्तु उन्हें भी सफलता नहीं मिली। समय आने पर उनकी भी मृत्यु हो गई। दिलीप के पुत्र भागीरथ ने भी बड़ी तपस्या की। उनकी …

श्री राम कथा , राम चरित्र , सीता हरण , रावण वध , लव – कुश चरित्र….Shri Ram Katha, Ram Charitra, Sita Haran, Ravana Vadh, Luv-Kush Charitra

खटवांग के पुत्र दीर्घबाहु, दीर्घबाहु के पुत्र रघु, रघु के पुत्र अज और अज के पुत्र दशरथ हुए। देवताओं की प्रार्थना पर साक्षात् परब्रह्म श्रीहरि अपने अंशांश से चार रूप धारण करके राजा दशरथ के पुत्र हुए। उनके नाम थे – राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न । जब ये युवा हो गए तब विश्वामित्र जी …

नारद जी कौन थे नारद जी किसके पुत्र थे नारद जी किसका भजन करते है….Who was Narad ji, whose son was Narad ji, whom does Narad ji worship

एक बार की बात है कि जब श्री वेदव्यास जी वेदों का विभाजन कर रहे थे तो श्री नारद जी वहाँ पधारें। नारद जी को आया देख उनके • स्वागत के लिए श्री वेद व्यास जी उठकर खड़े हो गए। उन्होंने देवताओं द्वारा सम्मानित देवर्षि नारद जी की पूजा अर्चना की। व्यास जी बोले- नारद …

वासुदेव देवकी विवाह , कंस द्वारा देवकी की हत्या का प्रयास, वासुदेव का कंस को वचन देना….Marriage of Vasudeva Devaki, Kansa’s attempt to kill Devaki, Vasudeva’s promise to Kansa

एक बार शूरसेन के पुत्र वसुदेव देवकी को ब्याह कर अपनी नवपरिणीता पत्नी के साथ रथ पर चढ़कर अपने घर जा रहे थे । देवकी के पिता, देवक, ने प्रचुर दहेज दिया था, क्योंकि वह अपनी पुत्री को अत्यधिक चाहता था। उसने सैकड़ों रथ दिये थे, जो पूर्णतया स्वर्णमण्डित थे। उस समय उग्रसेन का पुत्र …

कामनाओं की पूर्ति के लिए किन देवताओं की पूजा करें…..Which gods should be worshiped for the fulfillment of wishes

मनुष्य को अपनी इच्छा पूरी करने के लिए घर मे निम्नलिखित देवताओं की उपासना करनी चाहिए :जिस व्यक्ति को ब्रह्मतेज की आवश्यकता हो उसे बृहस्पति जी की उपासना करनी चाहिए। जिस व्यक्ति को सन्तान की इच्छा हो उसे प्रजापतियों की उपासना करनी चाहिए। जिस व्यक्ति को लक्ष्मी की इच्छा हो उसे कुबेर और वरुण की …

श्री कृष्ण गोवर्धन लीला , श्री कृष्ण गिरिराज धरण , श्री कृष्ण ने इंद्र का अहंकार तोड़ा….Shri Krishna Govardhan Leela, Shri Krishna Giriraj Dharan, Shri Krishna broke the ego of Indra –

भगवान श्री कृष्ण ने चौपाल में जाकर नंदरॉय, उपन्द आदि गोपों को स्पष्ट शब्दों में कह दिया, बाबा आज से ब्रज में देवराज इंद्र की पूजा नहीं होगी बल्कि गिरिराज गोवर्धन की पूजा होगी। यदि आप लोगों ने मेरी बात नहीं मानी तो वृन्दावन छोड़कर चला जाऊँगा फिर कभी लौट कर नहीं आऊँगा। श्रीकृष्ण का …

श्री कृष्ण भगवान ने गोवर्धन लीला क्यो की….Why Lord Krishna performed Govardhan Leela

भगवान श्रीकृष्ण की अत्यंत प्रिय नैमित्तिक लीला होती है *श्री गोवर्धन लीला*। गोवर्धन लीला के दो कारण है एक है अतंरंग कारण और दूसरा बह्या कारण। बाह्या करण में भगवान श्री कृष्ण अपने भक्त समुदाय को, पूरे संसार को ये संदेश देना चाहते हैं कि जो वैष्णव हैं, मेरी पूजा करते हैं उसे अन्य अन्य …

श्री राधेकृष्ण प्रेम लीला….Shri Radhekrishna Prem Leela

एक बार श्री कृष्ण और श्री राधा जी एक वन में खेल रहे थे। भगवान श्री कृष्ण और राधा जी दोनों वहाँ पर अकेले थे। इस बीच श्री कृष्ण जी ने राधा जी को एक बरगद के पेड़ के पीछे ले जाकर उनकी आँखों को अपनी पीतांबर से बांध कर उनको वही पर खड़े रहने …

देवासुर संग्राम कहानी , देवताओं और दैत्यों के बीच संग्राम की कहानी…Devasur Sangram story , the story of the battle between the gods and the demons

देवासुर संग्राम पहले भी कई बार हुआ एक बार दानवों और दैत्यों को अमृत न मिलने का अपार दुःख हुआ तथा उनका क्रोध बढ़ गया । वे अपने-अपने अस्त्र-शस्त्र लेकर देवताओं से युद्ध करने लगे। देवताओं और दैत्यों में भीषण संग्राम होने लगा, जिसे इतिहास में देवासुर संग्राम कहते हैं। रणभूमि में रथियों के साथ …

श्री कृष्ण नामकरण , श्री कृष्ण बाल लीला , श्री कृष्ण माखन चोरी लीला…Shri Krishna Namkaran, Shri Krishna Bal Leela, Shri Krishna Makhan Chori Leela

एक दिन यदुवंशियों के कुल पुरोहित श्री गर्गाचार्य नन्दबाबा के घर पधारे। उन्हें देखकर नन्दबाबा ने खड़े होकर उनके चरणों में प्रणाम किया। उन्होंने गर्गाचार्य जी से निवदेन किया कि मेरे इन दोनों बालकों का नामकरण संस्कार गर्गाचार्य जी ने कहा- यह रोहिणी का पुत्र है । इसलिए इसका एक नाम रौहिणेय और दूसरा नाम …

श्री कृष्ण ने राक्षसी पूतना का वध कैसे किया और पूतना का पूर्व जन्म….How Shri Krishna killed the demonic Putna and the previous birth of Putna

पूतना नाम की एक बड़ी क्रूर राक्षसी थी। उसका एक ही काम था, बच्चों को मारना । कंस की आज्ञा से एक दिन वह नन्दबाबा के गोकुल के पास जाकर उसने अपने को एक सुन्दर युवती में परिवर्तित कर लिया और गोकुल में प्रवेश कर गई । वह अनायास ही नन्दबाबा के घर में घुस …

श्री कृष्ण भगवान का जन्म कब हुआ श्री कृष्ण भगवान की माता कौन थी श्री कृष्ण जी ने किस कारण अवतार लिया…When was Lord Krishna born, who was the mother of Lord Krishna, why did Lord Krishna incarnate

कंस स्वयं बली था और उसे मगध नरेश जरासंध की सहायता बड़ा प्राप्त थी। इसके अतिरिक्त उसके साथी थेप्रलम्बासुर, बकासुर, चाणूर, तृणावर्त, अधासुर, मुष्टिक, अरिष्टासुर, द्विविद, पूतना, केशी, और धेनुक तथा बाणासुर और भौमासुर आदि बहुत से दैत्य राजा उसके सहायक थे । इनको साथ लेकर वह यदुवंशियों को नष्ट करने लगा। वे लोग भयभीत …

श्री कृष्ण भगवान की शक्तियां , गुण…..powers, qualities of God Shri Krishna

भगवान की माया ने स्वयं के काल, कर्म और स्वभाव को स्वीकार किया है। काल के तीन गुणों में क्षोभ पैदा हुआ। स्वभाव ने उन्हें रूपान्तर कर दिया। कर्म ने महत्तत्व को जन्म दिया। रजोगुण तमोगुण की वृद्धि होने पर महत्तत्व का विकार हुआ। इससे क्रिया, ज्ञान और द्रव्य रूपत्त्व, त्तम का प्रधान विकार हुआ। …

श्री कृष्ण भगवान का शरीर….body of god shri krishna

पुरुषोत्तम भगवान संसार की उत्पत्ति, पालन और प्रलय की लीलाओं को करने हेतु सत्व, रज और तमोगुण रूपी तीन शक्तियों को स्वीकार कर ब्रह्मा, विष्णु और महेश का रूप धारण करते हैं। पंच महाभूतों से इन शरीरों का निर्माण करके इनमें जीव रूप से शयन करते हैं और पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच प्राण प्राण …

भगवान का प्रकट होना…god appearing

प्रभु भक्तों ब्रह्मा जी ने बताया कि भगवान नारायण के पास सत्व, रज और तम तीन शक्तियाँ हैं। उन्होंने पृथ्वी को जल से ऊपर लाने के लिए वराह का शरीर धारण किया । जब हिरण्याक्ष आदि देव भगवान से युद्ध करने आया तो उन्होंने अपनी दाढ़ी से उसके टुकड़े-टुकड़े करके मार गिराया। भगवान ने रुचि …

श्री मद्भागवत…..Shri Madbhagavad

प्रिय भक्तों भागवत का वर्णन इस प्रकार है कि कल्प में सत्यवती के गर्भ से व्यास के रूप में भगवान ने प्रकट होकर भागवत पुराण की रचना की थी । इसी भागवत पुराण में सर्ग, विसर्ग, स्थान, पोषण, अति, मन्वन्तर, इशानु, निरोध, मुक्ति, आश्रय इन दस विषयों का वर्णन है । भगवान की प्रेरणा से …

श्री कृष्ण भगवान द्वारा बनाई गई सृष्टि का वर्णन…Description of the creation created by God of shri krishna

प्यारे भक्तों सृष्टि का वर्णन इस प्रकार है। कि विराट भगवान जब ब्रह्माण्ड को छेदकर प्रकट हुए तो रहने के लिए स्थान को तलाशने लगे । तब उन्होंने जल की सृष्टि की। विराट पुरुष के नर से उत्पन्न होने के कारण जल का नाम नार पड़ा। एक हज़ार वर्षों तक नगर में रहने के कारण उनका नाम नारायण पड़ा । नारायण ने योग निद्रा से जागकर अपनी माया से अपने स्वर्णमय वीर्य को तीन भागों में बाँटा, जिनके नाम अधिदेव, अध्यात्म और अधिभूत थे । विराट पुरुष के हिलने-डुलने से उनके शरीर में स्थित आकाश से इन्द्रिय बल, मनोबल और शरीर बल की उत्पत्ति हुई। इन सबका स्वामी प्राण उत्पन्न हुआ। मुख से तालु और तालु से रसनेन्द्रिय प्रकट हुई । बोलने की इच्छा होने पर वाक् इन्द्रिय प्रकट हुई जिसके अधिष्ठाता देवता अग्नि हैं। जिसका विषय बोलना है प्रकट हुई। सूँघने की इच्छा होने पर “नाक” ध्राणेन्द्रिय उत्पन्न हुई। गन्ध को फैलाने हेतु वायुदेव प्रकट हुए । देखने की इच्छा होने पर नेत्रों के छिद्र जिनका अधिष्ठाता सूर्य हैं नेत्रेन्द्रिय प्रकट हुई । इन्हीं से रूप का ग्रहण होने लगा। सुनने की इच्छा होने पर कान प्रकट हुए। उष्णता, शीतलता, कोमलता और भारीपन जानने के लिए शरीर में चर्म प्रकट हुआ। जिसके चारों ओर रोम छिद्र उत्पन्न हुए | त्वचा इन्द्रिय शरीर के चारों ओर लिपट गई। कर्म करने की इच्छा से हाथ उग आए । ग्रहण करने की शक्ति हस्तेन्द्रिय तथा अधिदेवता इन्द्र प्रकट हुए। ग्रहण रूप कर्म भी प्रकट हुआ। आने-जाने की इच्छा होने पर पैर उग आए । चरणों के साथ ही चरण इन्द्रिय के साथ ही उसके अधिष्ठाता के रूप में वहाँ स्वयं यज्ञ पुरुष भगवान विष्णु स्थित हो गए। उन्हीं से चलना रूप कर्म प्रकट हुआ। सन्तान, रति और स्वर्ग की कामना हेतु लिंग का निर्माण हुआ | उपस्योन्द्रिय और प्रजापति आदि हुए। मलत्याग की इच्छा होने पर गुदा द्वार का निर्माण हुआ। पायुन्द्रिय और मित्र देवता प्रकट हुए। अपान द्वारा एक शरीर से दूसरे शरीर में जाने की इच्छा से नाभिद्वार प्रकट हुआ। उसी से अपान और मृत्यु देवता प्रकट हुए। इन दोनों के आश्रय से ही प्राण और अपान का विछोह होने से मृत्यु होती है। माया का विचार करने हेतु हृदय की उत्पत्ति हुई। इसी प्रकार आकाश, जल और वायु इन तीनों से प्राणों की उत्पत्ति हुई। अन्न, जल ग्रहण करने हेतु कोख, आंतों और नाड़ियों का निर्माण हुआ। विराट पुरुष के शरीर में पृथ्वी, जल, तेज से सात धातुएँ ९. त्वचा, २. चर्म, ३, मांस, ४. हड्डियाँ, ५. मज्जा, मेद, ७. रुधिर प्रकट हुई। भक्तों इस प्रकार श्री शुकदेव जी ने इस सृष्टि का वर्णन किया है….Dear devotees, the description of the universe is as follows. That when Virat God appeared after piercing the universe, he started searching for a place to live. Then he created water. Water was named Nar because of Virat Purush being born from a man. He was named Narayan because of his stay in the city for a thousand years. Narayan awoke from yog nidra by his illusion and divided his golden semen into three parts, whose names were Adhidev, Adhyatma and Adhibhuta. Due to the movement of the giant man, the sense force, mental force and physical force originated from the sky located in his body. The master of all these was born Prana. From the mouth came the palate and from the palate the sense organs appeared. When there was a desire to speak, the speech organ appeared whose presiding deity is Agni. The subject of which to speak has appeared. When there was a desire to smell, the “nose” olfactory organ arose. Vayudev appeared to spread the smell. When there was a desire to see, the holes of the eyes, whose presiding deity is the sun, appeared. It was from these that the form began to be eclipsed. Ears appeared when there was a desire to hear. To know the heat, coldness, softness and heaviness, the skin appeared on the body. Around which hair follicles arose. The skin wrapped around the sense body. Hands raised with the desire to act. Hastendriya and the presiding deity Indra appeared. Karma also appeared in the form of eclipse. Legs sprang up when there was a desire to move. Along with the feet, along with the senses of the feet, Lord Vishnu himself, the Yagya Purush, was situated there as its presiding deity. It was through them that the form and form of action appeared. Linga was created for the desire of children, night and heaven. Subsyndriya and Prajapati etc. happened. When there is a desire for excreta, the anus was formed. Payundriya and Mitra appeared. Nabhidwar appeared due to Apana’s desire to move from one body to another. From that the gods Apan and Mrityu appeared. Due to the separation of prana and apana from the shelter of these two, death occurs. The heart originated to think of Maya. Similarly, life originated from these three sky, water and air. Womb, intestines and nerves were formed to receive food and water. Earth, water, seven metals in the body of Virat Purush 9. skin, 2. Skin, 3, Meat, 4. Bones, 5. Marrow, fat, 7. Blood appeared. Devotees, this is how Shri Shukdev ji has described this creation

ब्रह्मा द्वारा भगवान की तपस्या कर सृष्टि निर्माण करना….Creating the universe by doing penance to God through Brahma

भक्तों ब्रह्माजी की निष्कपट तपस्या से प्रसन्न होकर आदिदेव भगवान ने उन्हें दर्शन देकर अपना रूप प्रकट किया और आत्मतत्व के ज्ञान के लिए सत्य परमार्थ वस्तु का जो उपदेश दिया उसे सुनो – ब्रह्माजी ने अपने जन्म स्थान कमल पर बैठकर सृष्टि की रचना करने का विचार किया । तब प्रलय के समुद्र में …

ब्रह्मा जी को विष्णु भगवान के द्वारा प्राप्त हुआ वैदिक ज्ञान…Brahma ji received Vedic knowledge from Lord Vishnu

एक बार जब सभी देवताओं ने श्रीभगवान् की स्तुति पुरुष-सूक्त द्वारा कर ली, तो उन्हें कोई उत्तर नहीं मिला। अतः ब्रह्माजी स्वयं ध्यान करने में लग गए और तब भगवान् विष्णु ने उन्हें एक सन्देश भेजा। ब्रह्मा ने इस सन्देश को देवताओं तक प्रेषित कर दिया। वैदिक ज्ञान प्राप्त करने की यही विधि है। यह वैदिक ज्ञान सर्वप्रथम श्रीभगवान् से ब्रह्मा को हृदय के माध्यम से प्राप्त होता है। जैसाकि श्रीमद्भागवत के प्रारम्भ में कहा गया है; तेने ब्रह्म हृदा य आदि कवये- वेदों का दिव्य ज्ञान हृदय के द्वारा ब्रह्मा तक प्रेषित हुआ। उसी प्रकार यहाँ भी केवल ब्रह्मा ही भगवान् विष्णु द्वारा प्रेषित सन्देश को समझ पाये और उन्होंने तुरन्त कार्यवाही के लिए देवताओं को प्रसारित कर दिया। यह सन्देश इस प्रकार था। भगवान् शीघ्र ही अपनी परम शक्तियों सहित पृथ्वी पर प्रकट होंगे और जब तक वे पृथ्वी लोक में असुरों के संहार तथा भक्तों के संस्थापन का उद्देश्य पूरा करने के लिए रहेंगे, तब तक देवताओं को भी उनकी सहायता के लिए वहीं रहना होगा। उन्हें तुरन्त उस यदुवंश में जन्म ग्रहण करना होगा जिसमें यथासमय भगवान् भी प्रकट होंगे। भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं वसुदेव के पुत्र रूप में प्रकट होंगे। उनके प्रकट होने के पूर्व सारे देवताओं को अपनी-अपनी पत्नियों सहित संसार भर के विभिन्न पवित्र परिवारों में भगवान् को उनके कार्य में सहायता पहुँचाने के लिए प्रकट होना चाहिए। यहाँ पर तत्प्रियार्थम् शब्द अत्यन्त उपयुक्त है, जिसका अर्थ है कि देवताओं को चाहिए कि भगवान् को प्रसन्न करने के लिए इस पृथ्वी पर प्रकट हों। दूसरे शब्दों में, कोई भी जीव, जो भगवान् को प्रसन्न करने के लिए ही जीवित रहता है, वह देवता है। देवताओं को यह जानकारी भी दी गई कि भगवान् कृष्ण के अवतार के पूर्व पृथ्वी पर भगवान् कृष्ण का पूर्ण अंश, अनन्त, प्रकट होगा, जो अपने लाखों फनों से ब्रह्माण्डों को धारण किए हुए है। उन्हें यह भी सूचित किया गया कि विष्णु की बहिरंगा शक्ति (माया) भी, जिससे समस्त बद्धजीव आकृष्ट होते हैं, परमेश्वर के आदेश के अन्तर्गत उनकी प्रयोजन-सिद्धि के लिए प्रकट होगी। समस्त देवताओं तथा भूमि को भी मधुर वचनों से आदेश तथा सान्त्वना देने के पश्चात् समस्त प्रजापतियों के पिता ब्रह्माजी अपने धाम, सर्वोच्च लोक ब्रह्मलोक, को चले गये।….Once all the demigods praised the Supreme Personality of Godhead through the purusha-sukta, they could not find any answer. So Brahma himself started meditating and then Lord Vishnu sent him a message. Brahma sent this message to the deities. This is the method of acquiring Vedic knowledge. This Vedic knowledge is first received from the Supreme Lord Brahma through the heart. As stated in the beginning of Srimad Bhagavatam; Tene brahma hridaya ya adi kavye – The divine knowledge of the Vedas was transmitted to Brahma through the heart. Similarly here also only Brahma could understand the message sent by Lord Vishnu and he immediately broadcast it to the deities for action. This message was like this. The Lord will soon appear on earth with His supreme energies, and the demigods will also have to remain there to assist Him as long as He remains in the earthly world to fulfill the purpose of killing the demons and establishing the devotees. He would immediately have to take birth in that Yaduvansh in which God would also appear in due course. Lord Krishna himself will appear as the son of Vasudev. Before His appearance, all the demigods should appear with their respective wives in various pious families around the world to help the Lord in His work. Here the word tatpriyartham is most appropriate, which means that the demigods should appear on this earth to please the Lord. In other words, any living being who lives only to please the Lord is a demigod. The demigods were also informed that before the incarnation of Lord Krishna, the eternal part of Lord Krishna, who is upholding the universes with his millions of hoods, would appear on earth. He was also informed that the external energy (māyā) of Vishnu, to which all conditioned souls are attracted, would also appear under the order of the Supreme Lord for his purpose. After commanding and comforting all the gods and the earth with sweet words, Brahma, the father of all Prajapatis, went to his abode, the supreme world, Brahmaloka

प्रत्येक व्यक्ति सत्य की खोज में और सत्य है भगवान श्री कृष्ण…..Everyone is in search of truth and truth is lord shri krishna

भक्तों प्रत्येक व्यक्ति सत्य की खोज में लगा है। यही जीवन को दार्शनिक रीति है। देवतागण जानकारी देते हैं कि परम सत्य कृष्ण ही हैं। जो पूर्णत: कृष्णभावनाभावित हो जाता है, वह परम सत्य को प्राप्त कर सकता है। कृष्ण ही परम सत्य है। शाश्वत काल की तीन अवस्थाओं में सत्य हैं, सापेक्ष सत्य नहीं । काल भूत, वर्तमान तथा भविष्य में विभाजित है। भौतिक जगत में प्रत्येक वस्तु परम काल द्वाराभूत, वर्तमान तथा भविष्य के द्वारा नियंत्रित हो रही है; किन्तु सृष्टि के पूर्व कृष्ण विद्यमान थे; सृष्टि के हो जाने पर प्रत्येक वस्तु कृष्ण पर आश्रित है और जब यह सृष्टि समाप्त होगी, तो कृष्ण बचे रहेंगे। अतः वे सभी परिस्थितियों में परम सत्य हैं। यदि भौतिक जगत में सत्य है, तो यह परम सत्य से उद्भूत है। यदि इस भौतिक जगत में कहीं वैभव है, तो इस के स्रोत कृष्ण ही हैं। यदि संसार में कुछ ख्याति है, तो कृष्ण ही उसके कारण हैं। यदि संसार में कोई बल (शक्ति) है, तो इस शक्ति के कारण कृष्ण हैं। यदि संसार में कोई ज्ञान तथा शिक्षा है, तो उसके कारण स्वरूप कृष्ण हैं। इस तरह कृष्ण सारे सत्यों के स्रोत हैं। ……Devotees, everyone is engaged in the search for truth. This is the philosophical way of life. The deities inform that Krishna is the ultimate truth. One who becomes fully Krishna conscious can attain the Absolute Truth. Krishna is the ultimate truth. There is truth in the three states of eternal time, not relative truth. Tense is divided into past, present and future. Everything in the material world is governed by the past, present and future by the Supreme; But Krishna existed before the creation; Everything is dependent on Krishna when the creation is done and when this creation ends, Krishna will remain. Therefore He is the Absolute Truth in all circumstances. If there is truth in the material world, it emanates from the Absolute Truth. If there is any opulence in this material world, then its source is Krishna. If there is some fame in the world, Krishna is the reason for it. If there is any force (Shakti) in the world, then Krishna is the cause of this Shakti. If there is any knowledge and education in the world, Krishna is the cause of it. Thus Krishna is the source of all truths…

EXTREME DEVOTION TO LORD VISHNU BY YASHODA

Shri Krishna Devotees Mata Yashoda had a very strict devotion to Lord Vishnu, when Mother Yashoda was a woman named Dhara in her previous birth, then Lord Vishnu, pleased with her devotion, appeared to her in the form of a quadrilateral and gave Goddess Dhara the desired boon. When asked to ask, Goddess Dhara asked Lord Vishnu KHe expressed his desire to receive him in the form of a son, then Lord Vishnu gave him the desired boon and while giving the boon, he uttered Taastu-Tastu-Taastu thrice with his mouth. Lord Vishnu gave a boon to Goddess Dhara, but when he remembered after giving the boon, he saw that there is no one like me in this whole universe and came out of his mouth thrice to make the word true. He decided to become the son of Goddess Dhara for three births…..श्री कृष्ण भक्तों माता यशोदा ने भगवान विष्णु की अत्यंत कठोर भक्त्ति की थी, जब माता यशोदा अपने पूर्व जन्म में धरा नाम की स्त्री थी तब भगवान विष्णु ने उनकी भक्त्ति से प्रसन्न होकर उन्हें चतुर्भुज रूप में दर्शन दिए और देवी धरा को मनवांछित वर मांगने को कहा तब देवी धरा ने श्री विष्णु भगवान के सम्मुख उनको ही पुत्र रूप में प्राप्त करने की इच्छा प्रकट की तब विष्णु भगवान ने उन्हें मनवांछित वर दे दिया और वर देते समय अपने मुख से तीन बार तथास्तु – तथास्तु – तथास्तु का उच्चरण कर दिया। श्री विष्णु भगवान ने देवी धरा को वर तो दे दिया किन्तु जब वर देने के बाद स्मरण किया तो देखा कि इस पूर्ण ब्रह्माण्ड में मेरे समान तो कोई है ही नही और अपने मुख से तीन बार निकले तथास्तु शब्द को सत्य करने के लिए विष्णु भगवान ने देवी धरा का तीन जन्मों तक पुत्र बनने का निश्चय कर लिया

श्री कृष्ण भगवान का शिशु रूप में गोकुल आगमन – Lord Krishna’s arrival in Gokul as an infant

Devotees, when Lord Shri Krishna came to Gokul in the form of an infant, there was a very grand celebration, all the residents of Gokul were filled with joy because Nanda Baba had received a son after a long time and the head of Nanda Gokul and other surrounding villages and cowherds. The Nand ji gave gold ornaments and one lakh cows in the joy of son’s birthHe was not satisfied even after receiving the gifts of Gokul and other villagers. Seeing the beautiful face of Shri Krishna, his mind was getting eager to see Shri Krishna again and again. Was resting on Krishna’s side, whoever once saw the face of Shri Krishna, he was the sameIt is said that Gokul and other villagers had not seen any newborn baby in such a grand form, and how the complete God himself had incarnated on earth…..भक्तों जब भगवान श्री कृष्ण शिशु रूप में गोकुल आये थे तो बहुत ही भव्य उत्सव हुआ था सभी गोकुल वासी हर्षोउल्लास से भर गए थे क्योकि नंद बाबा को बहुत समय पश्चात पुत्र की प्राप्ति हुई थी और नंद गोकुल व अन्य आसपास के गांवों व गवालो के मुखिया थे नंद जी ने पुत्र जन्म की खुशी में स्वर्ण आभूषण व एक लाख गऊओं का दान किया था गोकुल व अन्य गांव वासियों की भेटों को प्राप्त कर कर भी तृप्ति नही हुई थी श्री कृष्ण के अति सुन्दर मुख को देखकर उनका मन बार बार श्री कृष्ण को देखने के लिए लालायित हो रहा था सभी की नजर पालने में झूल रहे श्री कृष्ण की ओर ही टिकी हुई थी जो भी श्री कृष्ण के मुख को एक बार देख लेता वो वही खड़ा रह जाता वहाँ से हटता ही नही कहते है कि इतना भव्य रूप गोकुल व अन्य गांव वासियों ने किसी भी नवजात शिशु का नही देखा था और होता भी कैसे स्वयं पूर्ण भगवान ने धरती पर अवतार धारण किया था

ब्रह्माण्ड ॐ शब्द से बना है…The universe is made of the word Om

श्री कृष्ण भक्तों यह पूरा ब्रह्मांड भगवान श्री कृष्ण ने ॐ शब्द से बनाया हुआ है भगवान श्री कृष्ण के मुख से निकल रहे इस ॐ शब्द में कोटि सूर्य और चंद्रमा , अंगिनत तारे , करोड़ो आकाशगंगाए व ग्रह आदि है जोकि उनके ही संकल्प मात्र से उतपन्न और नष्ट होते रहते है अर्थात …

भगवान श्री कृष्ण के जन्म से पूर्व इस धरती पर क्या हो रहा था…What was happening on this earth before the birth of Lord Shri Krishna..

श्री कृष्ण भगवान के जन्म से पूर्व जब धरती राक्षसी शक्तियों और पापियों के आक्रांत से त्राहि त्राहि हो रही थी तब ब्रह्मा ,शिव और सभी देवतागण एकत्र होकर भगवान विष्णु के पास गए और उनसे विनम्र निवेदन कर कहने लगे कि हे प्रभु आप ही इस जगत के जन्म दाता ,पालन कर्ता और संहारक …

श्री कृष्ण भगवान ने इस ब्रह्माण्ड को चलाने के लिए धर्म को बनाया आधार -Lord Krishna made religion the basis for running this universe

भक्तों जैसे किसी भी वस्तु साधन आदि के निर्माण के लिए या उसको चलाने के लिए उसका एक आधार बनाया जाता है वैसे ही भगवान श्री कृष्ण ने इस ब्रह्माण्ड को सही व समानान्तर रूप से चलाने के लिए इसका एक भाग धर्म बनाया है धर्म ही इस ब्रह्माण्ड का आधार है ओर उसी तरह …

श्री कृष्ण भगवान का मथुरा जाने से पहले अपनी प्रियतम राधा जी से अनोखा मिलन…Lord Krishna’s unique meeting with his beloved Radha before going to Mathura

जब भगवान श्री कृष्ण गोकुल से मथुरा जाने लगे तब वह मथुरा जाने से पहले श्री राधा से मिलने के लिए गए तब श्री राधे रानी ने उन्हें रोकने का बहुत प्रयास किया लेकिन प्रभु तो प्रभु है उन्होंने कर्म प्रधान का वर्णन करते हुए कहा कि अगर आज मै प्रेम विवश होकर वृंदावन में …

श्री नारायण भगवान ने किस प्रकार नारद जी का अहंकार तोड़ा…How Lord Narayan broke the ego of Narad ji

एक बार भगवान नारायण अपनी शेष नाग सईया पर ध्यान मगन लेटे हुए थे । उसी समय नारद मुनि नारायण नारायण करते हुए वहाँ पहुँचे और नारायण भगवान को प्रणाम किया । लेकिन नारायण भगवान ध्यानमग्न ही रहे । जब नारदमुनि काफी समय तक नारायण भजन करते रहे तब काफी समय बाद नारायण भगवान ने …

भगवान श्री कृष्ण ने ब्रह्मा का कैसे मान भंग किया और फिर उनको उपदेश दिया वर्णन…Description of how Lord Shri Krishna disrespected Brahma and then preached to him

एक बार द्वापर युग मे भगवान श्री कृष्ण अपने बाल सखाओं के साथ वन में गईया चरा रहे थे तो गईया चराते चराते हुए सभी बाल ग्वालों को भूख लगी तो सभी अपने परम सखा श्री कृष्ण कन्हइया को कहने लगे मित्र हमें भूख लगी है चलो भोजन करते है इसलिए सभी जो कुछ अपने …

भगवान श्री कृष्ण हमेशा अपने भक्तों की कैसे रक्षा करते है इस वर्णन में देखिए…See in this description how Lord Shri Krishna always protects his devotees

भक्तों भगवान श्री कृष्ण अपने भक्तों की हमेशा रक्षा करते है इसका प्रमाण यह है कि जब भस्मासुर ने शिव जी से किसी के भी ऊपर हाथ रखकर उसको भस्म करने का वरदान प्राप्त किया तो भस्मासुर ने वरदान प्राप्त कर सबसे पहले पार्वती माता पर ही कुदृष्टि डाल दी । ऐसा देख शिव जी …

यशोदा और नंद जी का पूर्व जन्म….Previous birth of Yashoda and Nand ji

भक्तों यशोदा मईया अपने पूर्व जन्म में धरा नाम की स्त्री और नंद द्रोण नाम के राजा थे जब इनको सत्य का ज्ञान हुआ तब ये दोनों अपने राज पाठ को छोड़कर विष्णु भगवान के तप हेतु वन में एक कुटिया बनाकर रहने लगे द्रोण और धरा दिन रात भगवान विष्णु का ध्यान करते और …

पृथ्वी, ब्रह्मा, शिव और अन्य देवताओं का भगवान विष्णु के पास जाकर प्रार्थना करना – Prithvi, Brahma, Shiva and other deities approach Lord Vishnu to pray

एक बार यह संसार ऐसे राजाओं की अनावश्यक सैनिक शक्ति से बोझिल हो गया, जो वास्तव में असुर थे, किन्तु अपने आपको राजा मान रहे थे। तब सारा संसार विक्षुब्ध हो उठा और पृथ्वी की अधिष्ठात्री देवी, जिसे भूमि कहते हैं, इन आसुरी राजाओं से उत्पन्न अपनी विपदाओं को बताने के लिए ब्रह्माजी के पास …

देवताओं और असुरों का अमृत के लिए समुद्र मंथन करना – Devas and Asuras churning the ocean for nectar

जब असुरों ने देवताओं पर विजय प्राप्त कर ली तो उस समय दुर्वासा ऋषि के शाप से तीनों लोक और स्वयं इन्द्र भी श्रीहीन हो गए। इस पर समस्त देवता सुमेरु पर्वत के शिखर पर ब्रह्माजी के पास गए। ब्रह्माजी ने देखा कि सब देवता श्रीहीन हो गए हैं और असुर फल-फूल रहे हैं। ब्रह्माजी …

श्री कृष्ण जी की यज्ञ पत्नियों पर कृपा – Shri Ji Krishna’s Yagya Gratitude to the Wives

…एक बार श्री कृष्ण भगवान और श्री बलराम, ग्वाल बालों के साथ गौएँ चरा रहे थे • तब भूखे ग्वाल बालों ने भगवान श्री कृष्ण से प्रार्थना की- हमें बहुत ज़ोर से भूख सता रही है। इसे शान्त करने का कोई उपाय बताइए । तब श्री कृष्ण बोले यहाँ से थोड़े ही दूर पर वेद …

श्री कृष्ण द्वारा गोवर्धन धारण और इंद्र यज्ञ निवारण – Govardhan Dharan by Shri Krishna and Prevention of Indra Yagya

श्री कृष्ण बलराम जी के साथ वृन्दावन में तरह-तरह की लीलाएँ करते रहते थे। उन्होनें एक दिन देखा कि सब गोप इन्द्र यज्ञ की तैयारी कर रहे हैं। श्री कृष्ण ने नन्दबाबा से पूछा- सब लोग किस चीज़ की तैयारी कर रहे हैं? नन्द बाबा बोले- बेटा! भगवान इन्द्र वर्षा करने वाले सम्पूर्ण सुरवसागर मेघों …