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Raman Kumar s/o Rajbir Singh
Jagadhri, Yamunanagar, Haryana, India
Mob No:- 09466660442
Email :- ramankumar407@gmail.com
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  • कुरुक्षेत्र युद्ध: महाभारत का महासंग्राम और धर्मक्षेत्र की गाथा ​कुरुक्षेत्र का युद्ध (Kurukshetra War) प्राचीन भारत का सबसे विनाशकारी और महत्वपूर्ण युद्ध माना जाता है। यह युद्ध कौरवों और पांडवों के बीच हस्तिनापुर के सिंहासन और 'धर्म' की स्थापना के लिए लड़ा गया था। ​1. युद्ध का संक्षिप्त परिचय ​स्थान: कुरुक्षेत्र (वर्तमान हरियाणा, भारत) ​अवधि: 18 दिन ​मुख्य पक्ष: पांडव (5 भाई) और कौरव (100 भाई) ​उद्देश्य: अधर्म का विनाश और धर्म की स्थापना ​2. युद्ध के मुख्य कारण (Main Causes) ​कुरुक्षेत्र युद्ध के पीछे कई सामाजिक और व्यक्तिगत कारण थे: ​राज्य का उत्तराधिकार: धृतराष्ट्र के पुत्र दुर्योधन द्वारा पांडवों को उनका न्यायोचित राज्य देने से इनकार करना। ​द्रौपदी का अपमान: भरी सभा में द्रौपदी का चीर-हरण युद्ध की सबसे बड़ी ज्वाला बना। ​शकुनि की चालें: मामा शकुनि द्वारा रचित द्यूत क्रीड़ा (जुए का खेल) जिसमें पांडव अपना सब कुछ हार गए थे। ​3. श्रीमद्भगवद्गीता का जन्म ​युद्ध के मैदान में जब अर्जुन अपने ही परिजनों को सामने देखकर विचलित हो गए, तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें जो उपदेश दिया, वही श्रीमद्भगवद्गीता कहलाया। ​"कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन" — फल की चिंता किए बिना अपना कर्तव्य करो। 5. कुरुक्षेत्र युद्ध के परिणाम ​यह युद्ध इतिहास का सबसे रक्तरंजित युद्ध था, जिसके परिणाम दूरगामी थे: ​पांडवों की विजय: धर्म की जीत हुई और युधिष्ठिर हस्तिनापुर के सम्राट बने। ​विनाश: लगभग समस्त क्षत्रिय वंश का नाश हो गया। ​कलियुग का प्रारंभ: कृष्ण के वैकुंठ प्रस्थान और इस युद्ध के अंत के साथ ही द्वापर युग समाप्त हुआ और कलियुग की शुरुआत हुई। निष्कर्ष: कुरुक्षेत्र का युद्ध हमें सिखाता है कि सत्य और धर्म के मार्ग पर चलने वालों की अंत में विजय निश्चित है, चाहे सामने कितनी ही बड़ी सेना क्यों न हो। यह युद्ध आज भी हमें अपने भीतर के विकारों से लड़ने की प्रेरणा देता है।
  • सुदामा चरित: कृष्ण और सुदामा की अटूट मित्रता की प्रेरणादायक कहानी ​सुदामा चरित मुख्य रूप से श्रीमद्भागवत पुराण के 10वें स्कंध में वर्णित है। यह कहानी हमें सिखाती है कि ईश्वर के लिए भक्त की भावना सर्वोपरि है, उसकी धन-दौलत नहीं। ​1. सुदामा कौन थे? (Who was Sudama?) ​सुदामा, भगवान श्रीकृष्ण के बचपन के मित्र और सहपाठी थे। दोनों ने ऋषि सांदीपनि के आश्रम में साथ में शिक्षा ग्रहण की थी। सुदामा एक अत्यंत निर्धन ब्राह्मण थे, लेकिन वे संतोषी स्वभाव के और भगवान के परम भक्त थे। ​2. सुदामा चरित के मुख्य प्रसंग ​सुदामा चरित की कथा कई भावनात्मक पड़ावों से गुजरती है: ​द्वारका की यात्रा: अपनी पत्नी सुशीला के आग्रह पर, सुदामा अपनी गरीबी से मुक्ति पाने के लिए नहीं, बल्कि अपने सखा कृष्ण से मिलने के लिए द्वारका की यात्रा पर निकलते हैं। ​उपहार में 'तंदुल' (चावल): सुदामा के पास कृष्ण को देने के लिए कुछ नहीं था, इसलिए वे एक फटे कपड़े में बांधकर मुट्ठी भर कच्चे चावल (तंदुल) ले गए। ​कृष्ण द्वारा स्वागत: जब कृष्ण को पता चला कि उनका मित्र सुदामा द्वार पर खड़ा है, तो वे नंगे पैर उन्हें लेने दौड़े। उन्होंने सुदामा के पैर अपने आंसुओं से धोए, जो सच्ची मित्रता की पराकाष्ठा है। ​3. तीन मुट्ठी चावल का रहस्य ​सुदामा चरित में 'तीन मुट्ठी चावल' का प्रसंग अत्यंत महत्वपूर्ण है: ​पहली मुट्ठी: कृष्ण ने पहली मुट्ठी खाते ही सुदामा को धरती का सारा वैभव दे दिया। ​दूसरी मुट्ठी: दूसरी मुट्ठी खाते ही सुदामा को स्वर्ग लोक की संपत्ति सौंप दी। ​तीसरी मुट्ठी: जब कृष्ण तीसरी मुट्ठी खाने लगे, तो रुक्मणी ने उनका हाथ पकड़ लिया, क्योंकि वह सुदामा को वैकुंठ का स्वामी बनाने जा रहे थे। ​4. सुदामा चरित की सीख (Lessons from Sudama Charitra) ​सच्ची मित्रता: मित्रता में अमीरी-गरीबी का कोई स्थान नहीं होता। ​श्रद्धा और विश्वास: भगवान अपने भक्त की पुकार सुने बिना नहीं रहते। ​संतोषम परम सुखम: सुदामा ने अभाव में भी कभी भगवान से शिकायत नहीं की। ​5. प्रमुख कवियों द्वारा वर्णन ​हिंदी साहित्य में नरोत्तम दास द्वारा रचित 'सुदामा चरित' काव्य सबसे प्रसिद्ध है। उनकी पंक्तियाँ आज भी लोगों के हृदय को छू लेती हैं: ​"देखि सुदामा की दीन दसा, करुना करिके करुनानिधि रोये।" निष्कर्ष (Conclusion) ​सुदामा चरित हमें भौतिकता से ऊपर उठकर आत्मिक प्रेम की ओर ले जाता है। यह कथा युगों-युगों तक मानव जाति को विनम्रता और निस्वार्थ प्रेम की सीख देती रहेगी। यदि आप भक्ति और अध्यात्म में रुचि रखते हैं, तो सुदामा चरित का अध्ययन आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकता है।
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