श्रीकृष्ण और गोवर्धन पर्वत लीला: गिरिराज पूजन प्रसंग | Shri Krishna Govardhan Leela in Hindi भगवान श्री कृष्ण की अलौकिक गोवर्धन पर्वत धारण लीला और इंद्र देव का अहंकार भंग प्रसंग। जानिए गोवर्धन पूजा, अन्नकूट उत्सव, 56 भोग और इसका आध्यात्मिक महत्व। भगवान श्री कृष्ण की अलौकिक लीला: गोवर्धन पर्वत धारण और इंद्र का अहंकार भंग हिंदू धर्म, श्रीमद्भागवत महापुराण और ब्रज साहित्य में भगवान श्री कृष्ण (Shri Krishna Leela) की बाल लीलाओं में 'गोवर्धन पर्वत धारण' (Govardhan Leela) का प्रसंग सबसे प्रसिद्ध और फलदायी माना जाता है। यह दिव्य लीला न केवल ब्रजवासियों की रक्षा की कथा है, बल्कि प्रकृति संरक्षण और सच्ची भक्ति का संदेश भी देती है। श्री कृष्ण की सबसे ज्यादा लोकप्रिय लीलाओं में गोवर्धन पूजा और अन्नकूट (Annakut) प्रसंग शीर्ष पर है। 1. इंद्र पूजा का विरोध और गोवर्धन पूजन का संदेश गोकुल और वृंदावन में हर वर्ष कार्तिक मास में ब्रजवासी देवताओं के राजा इन्द्र देव को प्रसन्न करने के लिए विशाल यज्ञ और पूजा का आयोजन करते थे। जब बाल कृष्ण ने नंद बाबा और गोप-ग्वालों से इस पूजा का कारण पूछा, तो नंद बाबा ने बताया कि इंद्र देव जल की वर्षा करते हैं, जिससे घास और अन्न उपजता है। तब नटखट कान्हा ने तर्क दिया कि वर्षा करना तो इंद्र देव का कर्तव्य है। हमें उस गोवर्धन पर्वत और गोधन (गायों) की पूजा करनी चाहिए जो हमें प्रत्यक्ष रूप से फल, फूल, औषधियां और गायों को चारा प्रदान करते हैं। श्रीकृष्ण के समझाने पर समस्त ब्रजवासियों ने इंद्र देव की पूजा रोक दी और गोवर्धन पर्वत तथा गायों की पूजा (गोवर्धन पूजा) शुरू कर दी। 2. इंद्र देव का कोप और ब्रज में मूसलाधार वर्षा अपनी पूजा बंद होने से देवराज इंद्र अत्यंत क्रोधित हो उठे। उन्होंने अपने अहंकार के वश में होकर ब्रजमंडल को नष्ट करने के लिए संवर्तक मेघों (प्रलयकारी बादलों) को आदेश दे दिया। गोकुल में भयंकर मूसलाधार वर्षा, कड़कती बिजली और तूफानी हवाएं चलने लगीं। चारों तरफ जलभराव हो गया और समस्त पशु-पक्षी, बालक तथा ब्रजवासी भय से व्याकुल होकर बाल कृष्ण की शरण में पहुंचे। 3. कनिष्ठिका उंगली पर गोवर्धन पर्वत धारण अपने भक्तों को भयभीत देखकर भगवान श्री कृष्ण मुस्कुराए और समस्त ब्रजवासियों को गोवर्धन पर्वत के पास ले गए। अलौकिक चमत्कार: सात वर्ष के नन्हे बाल कृष्ण ने लीला रचते हुए विशालकाय गोवर्धन पर्वत (गिरिराज जी) को उखाड़ लिया और उसे अपनी बाएं हाथ की सबसे छोटी उंगली (कनिष्ठिका उंगली) पर छत्र की तरह उठा लिया। 7 दिन और 7 रात का आश्रय: बाल कृष्ण ने लगातार सात दिनों तक विशाल पर्वत को बिना हिलाए उठाए रखा। समस्त ब्रजवासी, अपनी गायों और सामान के साथ उस पर्वत के नीचे सुरक्षित आ गए। इंद्र देव ने लगातार सात दिनों तक प्रलयकारी जल बरसाया, लेकिन गोवर्धन पर्वत की छत्रछाया में ब्रज का एक तिनका भी बांका नहीं हुआ। 4. इंद्र का अहंकार भंग और 'गिरिधारी' नाम जब इंद्र देव का जल का भंडार समाप्त हो गया, तो उन्हें अहसास हुआ कि सात वर्ष का यह बालक कोई साधारण मनुष्य नहीं, बल्कि साक्षात परमेश्वर श्री हरि विष्णु हैं। इंद्र देव का अहंकार पूरी तरह टूट गया। वर्षा थम गई और सूर्यदेव प्रकट हुए। इंद्र देव अपने वाहन ऐरावत हाथी पर सवार होकर आए और उन्होंने श्रीकृष्ण के चरणों में गिरकर क्षमा याचना की। कामधेनु गाय द्वारा अभिषेक: सुरभि (कामधेनु) गाय ने अपने दूध से भगवान का अभिषेक किया और इंद्र देव ने बाल कृष्ण को 'गोविंद' तथा 'गिरिधारी' (गिरि यानी पर्वत को धारण करने वाले) नाम से संबोधित किया। 5. अन्नकूट उत्सव और 56 भोग की परंपरा सात दिनों तक लगातार पर्वत उठाए रखने के कारण बाल कृष्ण ने भोजन नहीं किया था। जब संकट टल गया, तो मैया यशोदा और समस्त ब्रजवासियों ने मिलकर भगवान के प्रति प्रेम व्यक्त करने के लिए 56 प्रकार के व्यंजन (56 भोग) बनाकर अर्पित किए। इसी प्रसंग के बाद से हर वर्ष दिवाली के अगले दिन गोवर्धन पूजा और अन्नकूट उत्सव मनाने की परंपरा शुरू हुई।- Shri Krishna
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