शिव, ब्रह्मा और सभी देवताओं का भगवान विष्णु के पास जाकर पृथ्वी से राक्षसी शक्तियों का विनाश करने के लिए प्रार्थना करना

श्री कृष्ण भगवान के जन्म से पूर्व जब धरती राक्षसी शक्तियों और पापियों के आक्रांत से त्राहि त्राहि हो रही थी तब ब्रह्मा ,शिव और सभी देवतागण एकत्र होकर भगवान विष्णु के पास गए और उनसे विनम्र निवेदन कर कहने लगे कि हे प्रभु आप ही इस जगत के जन्म दाता ,पालन कर्ता और संहारक है आप सर्वस्व ज्ञाता है प्रभु , आपको तो पता ही है कि इस समय धरती पर कंस जैसी राक्षसी शक्तियों ने चारों दिशाओं में आतंक फैला रखा है दिनप्रतिदिन धरती पर अधर्म बढ़ता जा रहा है जिसके कारण आपके भक्तों को बहुत ज्यादा कष्ट उठाने पड़ रहे है इसलिए हे प्रभु हम सभी देवता गण आपसे विनती करते है कि अब आप धरती पर अवतार धारण कर राक्षसों और पापियों का विनाश करके धरती पर धर्म की स्थापना करें और अपने भक्तों की रक्षा कर उन्हें कृतार्थ करें।

राजा परीक्षित को कलयुग कहाँ मिला और राजा परीक्षित ने कलयुग के शरण मांगने पर उसको कौन कौन से स्थान दिए

एक दिन राजा परीक्षित वन में आखेट के लिए जाते हैं जहाँ अचानक उनका सामना कली पुरूष (कलयुग) से होता है, जो राजा परीक्षित को कलयुग के गुण बताकर उनसे अपने रहने के लिए स्थान मांगता है। राजा परीक्षित ने उसे पांच स्थान में ही रहने की इजाजत दे दी। जहाँ शराब का सेवन हो, जहां जुआ खेला जाता हो, परस्त्री/परपुरुष गमन , क्लेश-लड़ाई झगड़ा तथा अवैध रूप से अर्जित धन । इतनी इजाजत मिलते ही कलयुग, राजा परीक्षित के मुकुट पर विराजित हो जाता है। क्योंकि राजा परीक्षित उस समय जरासंध का मुकुट धारण किये हुए थे । जब भीम ने जरासंध का वध किया तो नियमानुसार उसका मुकुट उसके पुत्र को मिलना चहिये था परंतु भीम द्वारा मुकुट उसके पुत्र को न देकर अपने राजकोष में रखा जो अवैध धन हुआ । राजा परीक्षित उस समय वही मुकूट धारण किये हुए थे जिस कारण कलयुग, राजा परीक्षित के मुकुट पर बैठ गया। उसके बाद राजा परीक्षित शिकार की तलाश में वन में आगे बढ़े। प्यास से व्याकुल राजा को एक कुटिया दिखाई दी। राजा ने वहां पहुंच कर देखा कि वहां शमीक ऋषि ध्यान में लीन होकर बैठा है राजा ने उस ऋषि से पानी मांगा तो ऋषि ने कोई जवाब नहीं दिया क्योंकि ऋषि ध्यानस्थ थे। राजा ने कलयुग से दुष्प्रेरित होकर इसको अपना अपमान समझा व आश्रम के समीप एक मरा हुआ सर्प पड़ा था जो राजा ने शमीक ऋषि के गले मे डाल दिया। आश्रम के पास खेल रहे बालको ने शमीक ऋषि के किशोर पुत्र श्रृंगी को जाकर सूचित किया । श्रृंगी को जब ज्ञात हुआ कि राजा परीक्षित ने उसके पिता का अपमान किया है तो उसने राजा को श्राप दिया कि जिसने मेरे पिता का अपमान किया है आज से सातवें दिन उसकी तक्षक सर्प के डसने से मृत्यु हो जाएगी। बाद में शमीक ऋषि को ज्ञात हुआ कि उसके पुत्र ने राजा को श्राप दिया तो उसे बहुत बुरा लगा कि राजा परीक्षित तो धर्मात्मा राजा है ये सब तो उसने कलयुग के दुष्प्रभाव में किया , राजा परीक्षित को सूचित करना चाहिए जब राजा हस्तिनापुर अपने महल में आकर जैसे ही मुकुट उतारा, कलयुग का दुष्प्रभाव दूर हुआ तब उनको आत्म गिलानी हुई कि मैंने ये क्या कर दिया जिन महात्मन के गले मे माला डाल कर सम्मान करना चाहिए था उनके गले में मरा हुआ सर्प डाल दिया, धिक्कार है मुझे, मैने तो अपने पूर्वजों की कीर्ति को कलंकित कर दिया है, मैं यह कलंकित जीवन धारण नहीं कर सकता , मैं प्रतिज्ञा करता हूं कि मैं आज से अन्न जल ग्रहण नहीं करूंगा। आमरण अनशन व्रत स्वीकार करता हूं। परीक्षित ने अपने ज्येष्ठ पुत्र को उत्तराधिकारी राजा घोषित कर दिया किन्तु अभी राजमहल में ही थे। द्वारपाल ने आकर सूचित किया कि एक ऋषि आपसे भेंट करना चाहते हैं द्वारपालों की सूचना पर राजा परीक्षित ने आकर देखा ये तो शमिक ऋषि है, परीक्षित ने ऋषि की चरण वन्दना की, उनके चरण पखारे, स्वागत किया, सत्कार किया किन्तु न तो क्षमा याचना करी और न ही इस बात के लिए प्रार्थना की कि आप मुझे कोई दण्ड मत देना अपितु बोले हे ऋषि मैं आपका अपराधी हुँ आप मुझे कठोर से कठोर दण्ड दीजिये ताकि मेरे इस पाप का निराकरण हो सके । ऋषि शमिक ने कहा राजन मैं आपको क्या कठोर दण्ड दूंगा आपके भाग्य ने आपको कठोर दण्ड दे दिया है मेरे पुत्र ने अज्ञानतावश क्रुद्ध होकर के आपको श्राप दिया है । आप सातवें दिन तक्षक नाग द्वारा डसे जाएंगे और आपका देहान्त हो जायेगा तब परीक्षीत ने चैन की साँस ली, हे कृष्ण आपकी बड़ी अहेतुकी कृपा है जो मुझे मेरे किये का दण्ड तत्काल ही दे दिया अब मैं इस राजपाट इस गृहस्थ आश्रम से मुक्त होकर के एकमात्र आपकी भक्ति करूँगा और संसार छोड़ने से पहले जैसा कि श्री उधव जी ने कहा था, श्री शुकदेव जी के मुखारविंद से श्रीमद्भागवत कथा सुनुगा। ये कहकर के चक्करवर्ती सम्राट परीक्षीत ने अपना राजसी वेश त्याग दिया और वानप्रस्थी वेश स्वीकार कर लिया, राजा से राजऋषि बन गये । सभी रिस्तेदारों व प्रजा जनो को अपने पीछे आने से मना किया, उन्हें रोक दिया और स्वयम् गंगा के किनारे-किनारे चल पड़े

श्री कृष्ण भगवान जब गोकुल से मथुरा जाने लगे तो अपनी प्रियतम श्री राधा रानी से उन्होंने क्या कहा और श्री राधा रानी ने भगवान श्री कृष्ण से कौन से दो वचन लिये

श्री कृष्ण भगवान जब गोकुल से मथुरा जाने लगे तब वह मथुरा जाने से पहले श्री राधा से मिलने के लिए उनके पास वन में गए जहाँ पर भगवान श्री कृष्ण ज्यादातर राधा रानी से मिलते थे तब श्री राधे रानी ने उन्हें रोकने का बहुत प्रयास किया लेकिन प्रभु तो प्रभु है उन्होंने कर्म प्रधान का वर्णन करते हुए कहा कि अगर आज मै प्रेम विवश होकर वृंदावन में रुक गया तो जिन कार्यो को पूर्ण करने के लिए मैंने ये अवतार धारण किया है वो कार्य कैसे पूर्ण होंगे और राधे रानी को हर उस बात का उत्तर दिया जो प्रेम में विवश राधे रानी के मुख से निकल रही थी तब बातों बातों में राधे रानी ने कहा कि मैंने सुना है कि आप अपने भक्तों से बहुत प्रेम करते हो तो भगवान श्री कृष्ण ने कहा – बिल्कुल करता हु । फिर राधा ने कहा कि मैंने यह भी सुना है कि आप अपने भक्तों की हर इच्छा को भी पूर्ण करते हो तो प्रभु ने कहा -: हां बिल्कुल करता हूँ । तब श्री राधा ने कहा कि मै भी आपकी भक़्त हूँ और आपसे अत्यंत प्रेम करती हूँ क्या मथुरा जाने से पहले मेरी भी इच्छा पूर्ण करोगे । प्रभु ने कहा हां बिल्कुल करूँगा । तो राधा ने कहा पहले वचन दो की अवश्य पूर्ण करोगे । तब प्रभु ने मै आपको वचन देता हूँ जो मांगोगे वह अवश्य मिलेगा और कहा मांगो जो मांगना है तब राधा ने दो वचन मांगे एक तो यह कि मुझे इस मृत्युलोक छोड़ने से पहले आखरी बार आपकी चरण धुली प्राप्त हो और दूसरा कि आप वृंदावन छोड़कर नही जाओगे मेरे पास बैठकर यही मुरली बजाओगे तब प्रभु ने ध्यान मगन होते हुए कहा जैसी तुम्हारी आज्ञा – प्रभु ने वचन विवश होकर अपने भक़्त को दिए वचन का मान रखते हुए ही आज्ञा शब्द का इस्तेमाल किया ताकि राधा ही उन्हें मथुरा जाने की आज्ञा दे क्योकि राधा के मुख से प्रेम में विवश राधा का हृदय बोल रहा था तब श्री कृष्ण जी राधा की आज्ञा अनुसार वही पर बैठकर मुरली बजाने लगें जैसे ही भगवान श्री कृष्ण जी की मुरली के मधुर स्वर गूँजने लगें उसी समय सभी देवता शिव,ब्रह्मा इंद्र आदि सभी प्रकट हो गए और कहने लगे -: त्राहिमाम त्राहिमाम त्राहिमाम , माता हमारी रक्षा करो , माता हम सभी आपकी संतान है अगर आज आपने प्रभु श्री कृष्ण को प्रेम विवश यहाँ बिठा लिया तो कंस जैसी राक्षसी शक्तियां हमारा नाश कर देगी और संसार मे अधर्म बढ़ जाएगा तब सभी देवताओं का आग्रह स्वीकार कर जगतजननी श्री राधा रानी ने भगवान श्री कृष्ण को मथुरा जाने की आज्ञा दी।

श्री कृष्ण भगवान ने धर्म को बनाया सृष्टि का आधार

भक्तों जैसे किसी भी वस्तु साधन आदि के निर्माण या उसको चलाने के लिए उसका एक आधार बनाया जाता है वैसे ही भगवान श्री कृष्ण ने इस सृष्टि को सही व समानान्तर रूप से चलाने के लिए इसका एक भाग धर्म बनाया है धर्म ही इस सृष्टि का आधार है ओर उसी तरह इस सृष्टि को चलाने के लिए भी भगवान श्री कृष्ण ने माया को भी बनाया है माया भी इस सृष्टि का एक भाग है भगवान श्री कृष्ण द्वारा बनाई गई इस माया का आभास हम कर सकते है लेकिन यह माया हमे तब समझ मे आती है जब समय व्यतीत हो जाता है कोई भी कार्य भगवान द्वारा बनाए गए समय या विधि अनुसार होता है भक्तों विधि का विधान समय के अनुसार पहले ही निश्चित होता है वह किसी मनुष्य या प्राणी के बदलने से नही बदलता और यही समय विधि के अनुसार निरन्तर चलता रहता है जिससे पुराने यगों का अंत और नए युगों का निर्माण होता रहता है इसी तरह प्रत्येक युग मे भगवान का अवतार भी विधि के अनुसार अवश्य होता है यह अवतार भगवान तब धारण करते है जब उस युग मे मनुष्य विज्ञान की चरम सीमा पर पहुँचकर खुद को भगवान से भी सर्वशक्तिमान समझने लग जाता है और उसके द्वारा किए गए कार्यो से धरती पर अधर्म ज्यादा बढ़ जाता है तब भगवान किसी न किसी रूप को धारण कर उन अधर्मियों का नाश कर धर्म की स्थापना करते है और वहीं से एक नए युग का भी प्रारंभ शुरू हो जाता है।

श्री कृष्ण भगवान ने ब्रह्मा का कैसे मान भंग किया और उनको उपदेश देकर क्षमा किया

द्वापर युग मे भगवान श्री कृष्ण अपने बाल सखाओं के साथ वन में गईया चरा रहे थे तो गईया चराते चराते हुए सभी बाल ग्वालों को भूख लगी तो सभी अपने परम सखा श्री कृष्ण कन्हइया को कहने लगे मित्र हमें भूख लगी है चलो भोजन करते है इसलिए सभी जो कुछ अपने अपने घर से लेकर आए थे और कन्हइया जो सभी के लिए अपने घर से माखन भोजन लेकर आए थे सभी एक मण्डली में इक्कठे होकर भोजन और माखन खाने लगे। कन्हइया सबसे पहले अपने बाल सखाओं के मुंह मे भोजन और माखन देते फिर उनके मुख से जो कुछ बचा हुआ कन्हइया के हाथ मे रह जाता उसे खुद खा लेते । यह सब होते हुए ब्रह्मलोक से ब्रह्मा जी भी देख रहे थे । ब्रह्मा जी को बहुत घृणा हुई कि यह कैसा परब्रह्म है जो इन छोटी जाति वालो की झूठन खाकर भी आन्नदित हो रहा है उन्होंने सोचा क्यों ना इस बात की परीक्षा ली जाए कि यह सत्य में परब्रह्म है या नही। ऐसा देख उन्होंने एक योजना बनाई पहले तो वहाँ से गउओं को गायब कर ब्रह्मलोक में ले गए.. और फिर जब कन्हइया उनकी खोज में निकले तो पीछे से ग्वाल बालको को भी गायब कर दिया । कन्हइया को गउओं न मिलने पर वापिस आए तो ग्वाल बालको को वहाँ न पाकर बड़े अचंभित हुए ।श्री कृष्ण ने जब ध्यानमग्न होकर देखा तो सभी ग्वाल और गउएँ ब्रह्मलोक में बैठे है । यह सब देख ब्रह्मा जी का मान भंग करने के लिए भगवान श्री कृष्ण ने अपने आपको कई भागों में विभक्त कर के उन समस्त ग्वाल बालों और गाय बछड़ों का रूप स्वयं धर लिया। ब्रह्मा जी ने तो उन सभी ग्वाल बालको और गउओं को कुछी क्षणों में ब्रह्मलोक पहुचा दिया लेकिन जब सभी ग्वाल और गउएँ पृथ्वी पर लौटकर आए तो थ्यूरी ऑफ रेल्ट्विटी ऑफ टाइम के सिद्धांत के अनुसार इतने में पृथ्वी पर एक साल बीत चुका था यहाँ पृथ्वी पर किसी को भी यह मल्लूम नही हुआ कि यह सभी ग्वाल बाल गउएँ असली नही है परन्तु श्री कृष्ण उनका रूप धरे घूम रहे है जब कुछ ही क्षण बाद ब्रह्मा जी ने पृथ्वी पर देखा कि जिन ग्वाल बालको और गउओं को अभी अभी वह ब्रह्मलोक में छोड़कर आए है वह सब यहाँ श्री कृष्ण के साथ खेल खा रहे है । ब्रह्मा जी यह देख चकरा गए और मन ही मन प्रभु श्री कृष्ण के चरणों का ध्यान किया और कहा प्रभु मुझे सत्य के दर्शन कराओ , प्रभु मुझे सत्य के दर्शन कराओ… तो यह देख ब्रह्मा जी पर भगवान श्री कृष्ण को दया आ गयी और अपनी माया का पर्दा हटाकर ब्रह्मा जी को दिखा कि स्वयं श्री कृष्ण भगवान उन सभी का रूप धरे खेल खा रहे है यह सब देख ब्रह्मा जी को बड़ा पछतावा हुआ और वह त्राहिमाम त्राहिमाम करते हुए कन्हइया के चरणों मे गिर कर क्षमा मांगने लगे । तब श्री कृष्ण कन्हइया ने ब्रह्मा जी को क्षमा करते हुए यह स्मरण कराया कि हे ब्रह्मा देव समस्त प्राणियों के रचनाकार होते हुए भी आपके अंदर से यह उच्च नीच का भेद भाव क्यो नही मिटा आप केवल शरीरों की रचना करते है जब उनमें मेरा ज्योति रूपी तेज आत्मा प्रतिबिंबित हो जाती है तभी उनको जीवन प्राप्त होता है। इसलिए हे ब्रह्मदेव आप अपना कार्य धर्म अर्थात बिना किसी ऊंच नीच,बिना किसी जाति पाति का भेदभाव रखकर सत्यपूर्ण रूप से किजिए।

भस्मासुर कौन था? कैलाश पति शिव शंकर भोले नाथ ने भस्मासुर को क्या वरदान दिया । भस्मासुर ने वरदान मिलने के पश्चात क्या किया ? भगवान विष्णु ने शिव शंकर भोले नाथ की भस्मासुर से कैसे रक्षा की ।

भस्मासुर की कथा हिंदू धर्म की पौराणिक कथाओं में एक गूढ़ और महत्वपूर्ण स्थान रखती है। यह कथा न केवल धर्म और नैतिकता की परंपराओं को उभारती है, बल्कि अहंकार, शक्ति के दुरुपयोग, और ईश्वर की कृपा का महत्व भी बताती है। इस लेख में, हम भस्मासुर के उद्भव, भगवान शिव द्वारा दिए गए वरदान, भस्मासुर के वरदान के बाद किए गए कृत्य, और अंत में भगवान विष्णु द्वारा भगवान शिव की रक्षा की पूरी कहानी को विस्तार से प्रस्तुत करेंगे। इस कथा से जुड़ी सभी घटनाओं को हमने विस्तारपूर्वक लिखने का प्रयास किया गया है।

भस्मासुर का परिचय

भस्मासुर एक पौराणिक असुर था, जो अपनी शक्ति और वैभव बढ़ाने की महत्वाकांक्षा रखता था। उसके अंदर अपनी शक्तियों को लेकर अत्यधिक अहंकार था और वह चाहता था कि वह संपूर्ण ब्रह्मांड में सर्वोच्च बन जाए। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, भस्मासुर को अपने पराक्रम और तपस्या के बल पर ऐसी शक्तियों को प्राप्त करने की इच्छा थी, जो उसे अजेय बना सकें। इसी उद्देश्य से उसने भगवान शिव की घोर तपस्या करने का निश्चय किया।

भस्मासुर की तपस्या

भस्मासुर ने कैलाश पर्वत पर जाकर भगवान शिव की तपस्या आरंभ की। उसकी तपस्या इतनी कठोर थी कि उसने अपने शरीर को कष्ट देकर भगवान शिव को प्रसन्न करने का प्रयास किया। उसकी तपस्या की तीव्रता और निष्ठा से भगवान शिव प्रसन्न हो गए। शिवजी, जो अपने भक्तों की भक्ति से बहुत जल्दी प्रसन्न हो जाते हैं, भस्मासुर के सामने प्रकट हुए और उससे वरदान मांगने को कहा।

भगवान शिव द्वारा भस्मासुर को वरदान

भस्मासुर ने भगवान शिव से एक अत्यंत शक्तिशाली वरदान मांगा। उसने कहा कि उसे ऐसा वरदान चाहिए जिससे वह जिसे चाहे भस्म कर सके। उसने भगवान शिव से यह वरदान मांगा कि वह जिसके सिर पर हाथ रखेगा, वह तुरंत भस्म हो जाएगा। भगवान शिव, जो अपने भक्तों की इच्छाओं को पूरा करने में कभी हिचकिचाते नहीं हैं, ने भस्मासुर की इस मांग को स्वीकार कर लिया और उसे यह वरदान दे दिया।

भस्मासुर का अहंकार

वरदान प्राप्त करने के बाद भस्मासुर के अंदर अहंकार भर गया। उसे लगा कि अब वह पूरी दुनिया में अजेय हो गया है और कोई भी उसे पराजित नहीं कर सकता। उसके मन में यह विचार आया कि अब वह भगवान शिव को भी परास्त कर सकता है और उनकी जगह स्वयं देवताओं के बीच सर्वोच्च स्थान प्राप्त कर सकता है।

भगवान शिव पर भस्मासुर का आक्रमण

भस्मासुर ने अपने वरदान की शक्ति का परीक्षण करने के लिए सबसे पहले भगवान शिव को ही अपना लक्ष्य बनाया। उसने भगवान शिव के सिर पर हाथ रखकर उन्हें भस्म करने की योजना बनाई। जैसे ही भगवान शिव ने भस्मासुर की इस योजना को समझा, उन्होंने वहां से भागने का निर्णय लिया। भस्मासुर ने भी उनका पीछा करना शुरू कर दिया।

भगवान शिव चारों दिशाओं में दौड़ने लगे, परंतु भस्मासुर भी उनके पीछे-पीछे दौड़ता रहा। भगवान शिव ने अपनी जान बचाने के लिए कई स्थानों पर शरण ली, लेकिन भस्मासुर लगातार उनका पीछा करता रहा। इस परिस्थिति ने भगवान शिव को भी चिंतित कर दिया।

भगवान विष्णु की योजना

भगवान शिव की इस कठिन परिस्थिति को देखकर अन्य देवता भी चिंतित हो गए। तब उन्होंने भगवान विष्णु से सहायता की प्रार्थना की। भगवान विष्णु, जो सदा अपने भक्तों और अन्य देवताओं की रक्षा के लिए तत्पर रहते हैं, ने शिवजी की रक्षा के लिए एक योजना बनाई।

भगवान विष्णु ने मोहिनी नामक एक सुंदर स्त्री का रूप धारण किया। मोहिनी का सौंदर्य इतना अद्वितीय था कि उसे देखकर कोई भी मोहित हो सकता था। भगवान विष्णु ने मोहिनी का रूप धारण कर भस्मासुर के सामने प्रकट हुए।

मोहिनी के रूप में भगवान विष्णु और भस्मासुर का मोह

भस्मासुर ने जब मोहिनी को देखा, तो वह तुरंत ही उसके सौंदर्य पर मोहित हो गया। उसने मोहिनी से विवाह करने की इच्छा व्यक्त की। मोहिनी ने उसकी इस इच्छा को स्वीकार किया, लेकिन एक शर्त रखी। उसने कहा कि वह केवल उसी से विवाह करेगी जो उसके साथ नृत्य कर सके। भस्मासुर, जो मोहिनी के सौंदर्य में पूरी तरह डूब चुका था, इस शर्त को स्वीकार कर लिया।

नृत्य के माध्यम से भस्मासुर का विनाश

मोहिनी और भस्मासुर ने नृत्य करना शुरू किया। नृत्य के दौरान मोहिनी ने अपने चालाकी भरे नृत्य से भस्मासुर को अपने हर एक कदम पर फंसाया। वह जो भी मुद्राएं बनाती, भस्मासुर उसकी नकल करता। नृत्य करते-करते मोहिनी ने अपनी चालाकी से भस्मासुर को अपने ही सिर पर हाथ रखने के लिए प्रेरित किया। जैसे ही भस्मासुर ने अपने सिर पर हाथ रखा, वह अपने ही वरदान के प्रभाव से भस्म हो गया।

भगवान शिव की रक्षा

इस प्रकार भगवान विष्णु ने अपनी चतुराई से भगवान शिव की रक्षा की। भस्मासुर का अंत हो गया और देवताओं ने राहत की सांस ली। भगवान शिव ने भगवान विष्णु को धन्यवाद दिया और उनकी इस सहायता के लिए उनकी सराहना की।

नैतिक शिक्षा

भस्मासुर की कथा हमें कई महत्वपूर्ण शिक्षाएं देती है। सबसे पहले, यह कहानी यह सिखाती है कि शक्ति का दुरुपयोग हमेशा विनाशकारी होता है। भस्मासुर ने अपनी शक्ति का दुरुपयोग करने की कोशिश की और इसी कारण उसका अंत हो गया।

दूसरी महत्वपूर्ण शिक्षा यह है कि अहंकार व्यक्ति को पतन की ओर ले जाता है। भस्मासुर का अहंकार ही उसकी विनाशकारी यात्रा का कारण बना। जब व्यक्ति अपनी सीमाओं को भूलकर अपनी शक्ति का दुरुपयोग करता है, तो उसका पतन सुनिश्चित हो जाता है।

तीसरी शिक्षा यह है कि ईश्वर अपने भक्तों की हर परिस्थिति में रक्षा करते हैं। भगवान शिव ने भस्मासुर को वरदान दिया, लेकिन जब वही वरदान उनके लिए खतरा बन गया, तो भगवान विष्णु ने उनकी रक्षा की।

निष्कर्ष

भस्मासुर की कथा हिंदू पौराणिक कथाओं की एक महत्वपूर्ण कथा है, जो जीवन के कई गहरे सत्य और नैतिकता को प्रकट करती है। यह कथा केवल मनोरंजन के लिए नहीं, बल्कि गहरी शिक्षाओं को समझने के लिए है। यह कथा हमें बताती है कि कैसे भगवान अपने भक्तों की रक्षा करते हैं, भले ही वह भक्त स्वयं भगवान के लिए समस्या क्यों न बन जाए।

भगवान शिव और विष्णु की यह लीला हमें यह सिखाती है कि शक्ति का सही उपयोग कितना महत्वपूर्ण है और कैसे अहंकार व्यक्ति को विनाश की ओर ले जाता है। इस कथा में भगवान विष्णु की चतुराई और भगवान शिव की सरलता का अद्भुत समन्वय है, जो यह दर्शाता है कि देवता सदा अपने भक्तों की रक्षा के लिए तत्पर रहते हैं।

पृथ्वी और सभी देवता भगवान विष्णु के पास क्या प्रार्थना करने गए थे? भगवान विष्णु ने सभी देवताओं को क्या आस्वासन दिया और उसके बाद भगवान विष्णु ने क्या किया।

प्रस्तावना

भारतीय पौराणिक कथाओं में अनेक कहानियाँ हैं जो देवताओं और असुरों के बीच संघर्ष और भगवान विष्णु के दैवीय अवतारों के माध्यम से धर्म की स्थापना को दर्शाती हैं। इनमें से एक अत्यंत महत्वपूर्ण कथा वह है जब पृथ्वी देवी (भू देवी) और अन्य सभी देवता भगवान विष्णु के पास जाकर उनसे प्रार्थना करते हैं। यह घटना तब घटित होती है जब पृथ्वी पर अधर्म अपने चरम पर पहुँच जाता है। इस कथा का विवरण विशेष रूप से श्रीमद्भागवत महापुराण और अन्य पौराणिक ग्रंथों में मिलता है। यह लेख इस कथा को विस्तार से वर्णन करेगा, जिसमें पृथ्वी और देवताओं की प्रार्थना, भगवान विष्णु का आश्वासन, और उसके बाद की घटनाओं का वर्णन किया जाएगा।

पृथ्वी पर अधर्म का विस्तार

द्वापर युग के अंत में, पृथ्वी पर अधर्म और अत्याचार अत्यधिक बढ़ गए। राक्षस और दुष्ट राजा अपने प्रजा पर अत्याचार कर रहे थे। धार्मिक कृत्यों में विघ्न डाला जा रहा था, और अधर्म का बोलबाला हो गया था। विशेष रूप से कंस और अन्य दुष्ट राजाओं ने पूरे भारतवर्ष में आतंक फैलाया हुआ था। इन राजाओं ने न केवल सामान्य जनता को परेशान किया, बल्कि ऋषि-मुनियों के यज्ञ और तपस्या में भी विघ्न डाला।

पृथ्वी देवी इस स्थिति से अत्यंत दुःखी हो गईं। उन्होंने महसूस किया कि इस संकट से बाहर निकलने के लिए एक दैवीय हस्तक्षेप की आवश्यकता है। उन्होंने अन्य देवताओं के साथ मिलकर भगवान विष्णु से सहायता की प्रार्थना करने का निर्णय लिया।

पृथ्वी और देवताओं की प्रार्थना

पृथ्वी देवी और समस्त देवता ब्रह्मा जी के नेतृत्व में भगवान विष्णु के परमधाम क्षीरसागर पहुँचे। वहाँ पहुँचकर उन्होंने भगवान विष्णु की स्तुति की और उनसे अपनी समस्याओं का समाधान करने की याचना की। पृथ्वी देवी ने अत्यंत विनम्रता और करुणा से कहा:

“हे भगवन्, आप इस सृष्टि के पालनकर्ता हैं। आप ही के कारण यह संसार सुचारु रूप से संचालित होता है। लेकिन आज पृथ्वी पर अधर्म का साम्राज्य फैल गया है। दुष्ट राक्षस और अत्याचारी राजा धर्म का नाश कर रहे हैं। यज्ञ, तपस्या, और धार्मिक अनुष्ठानों में विघ्न डाला जा रहा है। हे प्रभु, कृपया इस स्थिति को संभालें और पृथ्वी को अधर्म के इस भार से मुक्त करें।”

भगवान विष्णु का आश्वासन

भगवान विष्णु ने पृथ्वी देवी और देवताओं की प्रार्थना को सुनकर उन्हें आश्वासन दिया। उन्होंने कहा:

“हे देवताओं और पृथ्वी देवी, मैं आपकी पीड़ा को समझता हूँ। जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म का विस्तार होता है, तब-तब मैं अवतार लेकर धर्म की स्थापना करता हूँ। मैं स्वयं पृथ्वी पर अवतरित होकर दुष्टों का संहार करूंगा और धर्म की पुनर्स्थापना करूंगा। आप सभी निश्चिंत रहें, मैं शीघ्र ही इस संकट को समाप्त करूंगा।”

भगवान विष्णु ने यह भी कहा कि वे वासुदेव और देवकी के पुत्र के रूप में जन्म लेंगे और कंस तथा अन्य दुष्टों का नाश करेंगे। उन्होंने देवताओं को यह निर्देश दिया कि वे भी अपने अंशों से पृथ्वी पर अवतरित होकर धर्म की स्थापना में सहायता करें।

भगवान विष्णु का श्रीकृष्ण के रूप में अवतार

भगवान विष्णु ने वासुदेव और देवकी के घर में श्रीकृष्ण के रूप में जन्म लेने का निर्णय लिया। मथुरा में कंस ने अत्याचार का साम्राज्य स्थापित कर रखा था। उसे एक भविष्यवाणी के अनुसार अपनी बहन देवकी के आठवें पुत्र से मृत्यु का भय था। इस कारण उसने देवकी के सभी बच्चों को मारने का निर्णय लिया।

भगवान विष्णु ने देवताओं के माध्यम से वासुदेव और देवकी को यह संदेश दिया कि वे उनके आठवें पुत्र के रूप में अवतरित होंगे। देवकी के गर्भ में भगवान विष्णु के रूप में श्रीकृष्ण का अवतार हुआ। उनके जन्म के समय कई चमत्कार हुए। वसुदेव ने नवजात श्रीकृष्ण को गोकुल में नंद और यशोदा के घर पहुंचा दिया।

श्रीकृष्ण की बाल लीलाएं

गोकुल और वृंदावन में श्रीकृष्ण ने अपनी बाल लीलाओं के माध्यम से अनेक राक्षसों का वध किया। उन्होंने पूतना, बकासुर, अघासुर, और अन्य राक्षसों का नाश किया। गोवर्धन पर्वत को उठाकर उन्होंने इंद्र के अहंकार को दूर किया और गोकुलवासियों की रक्षा की। उनकी बाल लीलाएं प्रेम, भक्ति, और धर्म की स्थापना के प्रतीक हैं। उन्होंने अपनी लीलाओं के माध्यम से लोगों को यह संदेश दिया कि प्रेम और भक्ति के माध्यम से भगवान को प्राप्त किया जा सकता है।

कंस का वध

जैसे-जैसे श्रीकृष्ण बड़े हुए, उन्होंने मथुरा जाकर कंस का वध किया। कंस के अत्याचारों से पीड़ित जनता को मुक्ति दिलाई और धर्म की पुनर्स्थापना की। कंस का वध द्वापर युग की एक महत्वपूर्ण घटना थी, जिसने अन्य दुष्ट राजाओं को भी चेतावनी दी। श्रीकृष्ण ने मथुरा को कंस के आतंक से मुक्त किया और वहां धर्म का राज्य स्थापित किया।

महाभारत में श्रीकृष्ण की भूमिका

श्रीकृष्ण ने महाभारत में धर्म की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कौरवों और पांडवों के बीच हुए युद्ध में उन्होंने पांडवों का साथ दिया। युद्ध के दौरान, उन्होंने अर्जुन को भगवद्गीता का उपदेश दिया, जिसमें उन्होंने कर्मयोग, भक्ति योग, और ज्ञान योग की महिमा का वर्णन किया। उन्होंने अर्जुन को यह सिखाया कि अपने धर्म और कर्तव्य का पालन करना ही सच्चा धर्म है।

भगवद्गीता का संदेश

भगवद्गीता में श्रीकृष्ण ने कहा:

“यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥”
(भगवद्गीता, अध्याय 4, श्लोक 7)

अर्थात, “जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म बढ़ता है, तब-तब मैं स्वयं अवतार लेकर धर्म की स्थापना के लिए प्रकट होता हूं।”

इस उपदेश के माध्यम से श्रीकृष्ण ने यह स्पष्ट किया कि जब भी पृथ्वी पर अधर्म बढ़ेगा, वे अवतार लेकर धर्म की स्थापना करेंगे।

देवताओं का योगदान

भगवान विष्णु के अवतार श्रीकृष्ण के साथ अन्य देवताओं ने भी अपने-अपने अंशों से पृथ्वी पर जन्म लिया। पांडवों के रूप में इंद्र, वायु, यम, और अश्विनीकुमारों ने अवतार लिया। उन्होंने धर्म की स्थापना में श्रीकृष्ण का साथ दिया और कौरवों के अधर्म के खिलाफ युद्ध किया। उनके सहयोग से धर्म की पुनर्स्थापना संभव हुई।

निष्कर्ष

पृथ्वी और देवताओं द्वारा भगवान विष्णु से की गई प्रार्थना और उनके आश्वासन का यह विवरण हमें यह सिखाता है कि जब-जब पृथ्वी पर अधर्म बढ़ता है, तब-तब भगवान विष्णु अवतार लेकर धर्म की रक्षा करते हैं। उनकी लीलाएं और भगवद्गीता का उपदेश आज भी मानवता के लिए प्रेरणास्रोत हैं। इस कथा से यह संदेश मिलता है कि धर्म और सत्य की रक्षा के लिए हमेशा प्रयासरत रहना चाहिए और अन्याय के खिलाफ संघर्ष करना चाहिए। भगवान विष्णु के अवतार श्रीकृष्ण ने यह साबित किया कि प्रेम, भक्ति, और धर्म की शक्ति से अधर्म का अंत किया जा सकता है।

भगवान ने धरती पर कितने अवतार धारण किये और कहा किए

भगवान विष्णु ने धरती पर विभिन्न युगों में मानवता के कल्याण के लिए अनेक अवतार धारण किए। उनके इन अवतारों का उद्देश्य अधर्म का नाश और धर्म की स्थापना करना था। विष्णु पुराण और श्रीमद्भागवत महापुराण में दस प्रमुख अवतारों का वर्णन है जिन्हें दशावतार कहा जाता है। इसके अलावा भी अनेक अवतारों का उल्लेख मिलता है। ये अवतार विभिन्न युगों में प्रकट हुए और उन्होंने विविध प्रकार से लोक कल्याण के कार्य किए। यहाँ हम भगवान विष्णु के दस प्रमुख अवतारों और उनके उद्देश्यों का विस्तार से वर्णन करेंगे।

1. मत्स्य अवतार

अवतार की कथा:
सत्य युग में जब हयग्रीव नामक दैत्य ने वेदों को चुरा लिया और पृथ्वी पर अज्ञान फैलाने का प्रयास किया, तब भगवान विष्णु ने मत्स्य (मछली) का अवतार धारण किया। इस अवतार में उन्होंने मनु को एक नाव में बैठाकर वेदों को सुरक्षित रखा और हयग्रीव का वध किया।

उद्देश्य:
मत्स्य अवतार का उद्देश्य वेदों की रक्षा करना और संसार को ज्ञान और धर्म के मार्ग पर पुनः स्थापित करना था। इस अवतार के माध्यम से भगवान ने यह संदेश दिया कि धर्म का संरक्षण आवश्यक है और अज्ञान के अंधकार को ज्ञान के प्रकाश से दूर करना चाहिए।

2. कूर्म अवतार

अवतार की कथा:
देवताओं और दानवों के बीच समुद्र मंथन के समय, मंदराचल पर्वत के डूबने पर भगवान विष्णु ने कूर्म (कछुए) का अवतार धारण किया। इस अवतार में उन्होंने पर्वत को अपनी पीठ पर उठाया और समुद्र मंथन को सफल बनाया, जिससे अमृत, लक्ष्मी और कई अन्य मूल्यवान वस्तुएं प्राप्त हुईं।

उद्देश्य:
कूर्म अवतार का उद्देश्य देवताओं को दानवों पर विजय दिलाना और अमृत प्राप्त कराना था। इस अवतार के माध्यम से भगवान ने बताया कि जब भी संसार में संतुलन बिगड़ता है, तो ईश्वर उस संतुलन को पुनः स्थापित करने के लिए साकार होते हैं।

3. वराह अवतार

अवतार की कथा:
हिरण्याक्ष नामक दैत्य ने पृथ्वी को पाताल लोक में ले जाकर छुपा दिया था। तब भगवान विष्णु ने वराह (सूअर) का अवतार धारण किया और हिरण्याक्ष का वध कर पृथ्वी को पुनः जल से बाहर निकाला।

उद्देश्य:
वराह अवतार का उद्देश्य पृथ्वी को सुरक्षित स्थान पर लाना और अधर्म के नाश के लिए दुष्टों का संहार करना था। इस अवतार से भगवान ने यह संदेश दिया कि वे सृष्टि की रक्षा के लिए किसी भी रूप में आ सकते हैं।

4. नृसिंह अवतार

अवतार की कथा:
हिरण्यकशिपु नामक दैत्य ने अपने पुत्र प्रह्लाद को विष्णु भक्ति के कारण बहुत सताया। उसने अपनी अमरता के गर्व में स्वयं को भगवान से श्रेष्ठ मान लिया। तब भगवान विष्णु ने नृसिंह (आधे सिंह और आधे मानव) का अवतार धारण कर उसे वरदानों के दायरे में रहकर मार डाला।

उद्देश्य:
नृसिंह अवतार का उद्देश्य भक्त प्रह्लाद की रक्षा करना और यह संदेश देना था कि भगवान की भक्ति करने वालों की रक्षा स्वयं ईश्वर करते हैं। इस अवतार ने यह भी स्पष्ट किया कि अहंकार का अंत निश्चित है।

5. वामन अवतार

अवतार की कथा:
बलि नामक असुर राजा ने तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया था। तब भगवान विष्णु ने वामन (बौने ब्राह्मण) का अवतार धारण किया और बलि से भिक्षा में तीन पग भूमि मांगी। अपने विराट रूप में भगवान ने एक पग में स्वर्ग, दूसरे में पृथ्वी और तीसरे पग में बलि के सिर को नाप लिया, जिससे बलि का अभिमान टूट गया।

उद्देश्य:
वामन अवतार का उद्देश्य अधर्मी बलि का गर्व भंग करना और लोकों को पुनः देवताओं को सौंपना था। इस अवतार से भगवान ने यह सिखाया कि अहंकार के विनाश के लिए ईश्वर किसी भी रूप में आ सकते हैं।

6. परशुराम अवतार

अवतार की कथा:
क्षत्रियों के अत्याचारों से पीड़ित पृथ्वी को मुक्ति दिलाने के लिए भगवान विष्णु ने परशुराम के रूप में अवतार लिया। उन्होंने 21 बार पृथ्वी को क्षत्रियों से मुक्त किया और धर्म की स्थापना की।

उद्देश्य:
परशुराम अवतार का उद्देश्य अधर्मी क्षत्रियों का संहार कर धर्म और न्याय की स्थापना करना था। इस अवतार के माध्यम से भगवान ने यह संदेश दिया कि जब भी अधर्म बढ़ता है, तब ईश्वर स्वयं उसका नाश करने के लिए प्रकट होते हैं।

7. राम अवतार

अवतार की कथा:
त्रेता युग में जब राक्षस राजा रावण ने अधर्म और आतंक का साम्राज्य स्थापित कर लिया था, तब भगवान विष्णु ने राम के रूप में अवतार लिया। राम ने अपने धर्म और मर्यादा के पालन से रावण का वध कर धर्म की पुनः स्थापना की।

उद्देश्य:
राम अवतार का उद्देश्य अधर्म का नाश और धर्म की स्थापना करना था। राम ने अपने आदर्श आचरण से यह संदेश दिया कि मर्यादा और धर्म के पालन से ही समाज में शांति और सद्भाव बना रह सकता है।

8. कृष्ण अवतार

अवतार की कथा:
द्वापर युग में जब कंस, जरासंध और अन्य अधर्मी शक्तियों ने अत्याचार फैलाया, तब भगवान विष्णु ने कृष्ण के रूप में अवतार लिया। उन्होंने महाभारत के युद्ध में अर्जुन को गीता का उपदेश देकर धर्म की रक्षा की और कंस तथा अन्य अधर्मियों का वध किया।

उद्देश्य:
कृष्ण अवतार का उद्देश्य अधर्मियों का विनाश और धर्म की पुनः स्थापना करना था। गीता के उपदेश के माध्यम से उन्होंने कर्म, भक्ति और ज्ञान के मार्ग को स्पष्ट किया।

9. बुद्ध अवतार

अवतार की कथा:
कलियुग के प्रारंभ में जब धर्म के नाम पर हिंसा और पाखंड बढ़ गया, तब भगवान विष्णु ने गौतम बुद्ध के रूप में अवतार लिया। उन्होंने अहिंसा, करुणा और सत्य का संदेश दिया और लोगों को धर्म के वास्तविक स्वरूप का ज्ञान कराया।

उद्देश्य:
बुद्ध अवतार का उद्देश्य लोगों को अहिंसा और करुणा का मार्ग दिखाना था। इस अवतार से भगवान ने यह सिखाया कि धर्म के नाम पर हिंसा अनुचित है और सत्य, अहिंसा और करुणा ही धर्म के सच्चे मार्ग हैं।

10. कल्कि अवतार (आने वाला अवतार)

अवतार की कथा:
शास्त्रों में उल्लेख है कि कलियुग के अंत में जब अधर्म और पाप अपने चरम पर होंगे, तब भगवान विष्णु कल्कि के रूप में अवतार लेंगे। वे एक घोड़े पर सवार होकर प्रकट होंगे और संसार को अधर्मियों से मुक्त कर धर्म की स्थापना करेंगे।

उद्देश्य:
कल्कि अवतार का उद्देश्य अधर्मियों का संहार और धर्म की पुनः स्थापना करना होगा। यह अवतार यह संदेश देगा कि जब भी अधर्म अत्यधिक बढ़ता है, तब ईश्वर का अवतरण होता है और वे धर्म की स्थापना करते हैं।

अन्य अवतार

भगवान विष्णु के अन्य अवतारों का भी उल्लेख पुराणों में मिलता है, जिनमें हयग्रीव, दत्तात्रेय, नर-नारायण, और कपिल मुनि के अवतार प्रमुख हैं। इन अवतारों का उद्देश्य विभिन्न युगों में धर्म की स्थापना और अधर्म का नाश करना था।

निष्कर्ष

भगवान विष्णु के अवतारों का उद्देश्य सदैव लोक कल्याण, धर्म की रक्षा और अधर्म का नाश करना रहा है। उनके दशावतारों में हर अवतार एक विशेष उद्देश्य के लिए हुआ और प्रत्येक अवतार ने जीवन के विभिन्न पहलुओं को उजागर किया। इन अवतारों से यह संदेश मिलता है कि जब भी धर्म की हानि होती है और अधर्म बढ़ता है, तब भगवान अवतार लेकर सृष्टि को संतुलित करते हैं। ये अवतार हमें यह भी सिखाते हैं कि धर्म, सत्य, अहिंसा, करुणा और ज्ञान के मार्ग पर चलकर ही मानवता का कल्याण संभव है।

श्री नारायण भगवान ने नारद मुनि का कैसे मान भंग किया

एक समय की बात है श्री भगवान नारायण अपनी शेष नाग सईया पर ध्यान मगन लेटे हुए थे । उसी समय नारद मुनि नारायण नारायण करते हुए वहाँ पहुँचे और श्री नारायण भगवान को प्रणाम किया । लेकिन नारायण भगवान ध्यानमग्न ही लेटे रहे । लेकिन जब नारदमुनि काफी समय तक श्री नारायण नारायण नाम का जाप रहे तब काफी समय बाद नारायण भगवान ने अपने ध्यानमग्न से आँखे खोली । तो नारदमुनि ने नारायण भगवान से पूछा – प्रभुवर आप कहा ध्यानमग्न थे जो आपके परमभक्त को भी इंतजार करना पड़ा । तब नारायण भगवान जी बोले – है एक किसान जो आपसे भी बड़ा भक़्त है मेरा ध्यान उसी की ऒर ध्यान था मेरा । नारद को बड़ा आश्चर्य हुआ और बोला मै पूरा दिन इस ब्रह्मांड में नारायण नारायण करते हुए घूमता रहता हूँ । आपका मुझसे बड़ा भक़्त कौन हो सकता । तब नारायण भगवान जी बोले – नारद अगर तम्हें संदेह है तो मै अभी तुम्हारा संदेह दूर किए देता हूँ नारद तुम एक कार्य करो मै तुम्हें एक दीपक देता हूँ तुमने इस दीपक को हाथों में लेकर पूरा दिन इस ब्रह्माण्ड का भृमण करना है और इस दीपक को बुझने नही देना है । तब यह निश्चित हो जाएगा कि आप और किसान में से मेरा कौन बड़ा भक़्त है । यह सुनते ही नारद जी ने दीपक लिया और उसके चारों तरफ हाथों से ओट करकर हवा आदि से बचाव करते हुए ब्रह्माण्ड का भृमण करने लगे । शाम को नारदमुनि जब नारायण भगवान जी के पास पहुँचे और उनसे बोले देखों प्रभु आपका सबसे बड़ा भक़्त मै ही हूँ मैने दीपक को बुझने नही दिया। तब नारायण भगवान जी बोले – अच्छा नारद तुम ये बताओ जब तुम भृमण कर रहे तो मेरा कितनी बार तुमने स्मरण किया । नारद बोले – प्रभु एक बार भी नही ….नारायण जी बोले मेरा स्मरण क्यो नही किया नारद…. तब नारद ने कहा स्मरण कैसे करता प्रभु मेरा ध्यान तो दीपक की तरफ था मैने उसको भुजने नही देना था । तब नारायण भगवान जी बोले तो हो गया निश्चित कि आपसे बड़ा भक़्त मेरा किसान है जो पूरा दिन मेरा दिया हुआ कर्म ( कार्य ) को भी करता है और सुबह शाम दो वक़्त मेरा नाम भी स्मरण करता है।

ब्रह्मा जी को दर्शन देकर भगवान विष्णु ने क्या उपदेश दिया था और इस उपदेश का क्या उद्देश्य था

भगवान विष्णु द्वारा ब्रह्मा जी को दिए गए उपदेश का उल्लेख प्रमुख रूप से विष्णु पुराण, श्रीमद्भागवत महापुराण और अन्य वैदिक ग्रंथों में मिलता है। यह उपदेश न केवल सृष्टि के आरंभ के समय ब्रह्मा जी के लिए मार्गदर्शन के रूप में था, बल्कि यह समस्त मानव जाति के लिए धर्म, ज्ञान, कर्म, भक्ति और मोक्ष का मार्ग भी स्पष्ट करता है। इस उपदेश के उद्देश्य सृष्टि के निर्माण और संचालन में धर्म और नैतिकता की स्थापना तथा जीवों के लिए जीवन के सही मार्ग की स्थापना करना था। निम्नलिखित विवरण में भगवान विष्णु के उपदेश का विशद वर्णन और उसके उद्देश्य पर विस्तृत चर्चा की गई है।

उपदेश का प्रसंग

सृष्टि के आरंभ में जब ब्रह्मा जी ने सृष्टि रचना का विचार किया, तो उन्हें यह अनुभव हुआ कि यह कार्य अत्यंत कठिन और जटिल है। उन्हें इस बात की चिंता हुई कि किस प्रकार से वे इस महान कार्य को संपन्न करेंगे। उन्होंने ध्यान किया और भगवान विष्णु का स्मरण किया। उनकी प्रार्थना सुनकर भगवान विष्णु प्रकट हुए और उन्होंने ब्रह्मा जी को सृष्टि रचना के संबंध में उपदेश दिया।

भगवान विष्णु का उपदेश

भगवान विष्णु ने ब्रह्मा जी को जो उपदेश दिया, वह अनेक महत्वपूर्ण विषयों पर आधारित था। इन विषयों में सृष्टि रचना का रहस्य, धर्म का महत्व, कर्म और उसका फल, माया का प्रभाव, सदाचार, भक्ति, ज्ञान, और मोक्ष आदि प्रमुख हैं। भगवान विष्णु के इस उपदेश में जीवन के मूलभूत सिद्धांत और धर्म के मार्ग को विस्तार से समझाया गया है।

1. सृष्टि रचना का रहस्य

भगवान विष्णु ने ब्रह्मा जी को बताया कि सृष्टि रचना एक चक्र है जो अनादि और अनंत है। उन्होंने बताया कि यह चक्र उनके ही संकल्प से चलता है और इसमें ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों की भूमिका होती है। ब्रह्मा जी सृजन के कारक हैं, विष्णु पालनकर्ता हैं, और शिव संहारक हैं। सृष्टि का यह चक्र अनवरत चलता रहता है और यह भगवान की माया से आवृत है।

2. धर्म का महत्व

भगवान विष्णु ने कहा कि धर्म ही सृष्टि का आधार है। धर्म के बिना सृष्टि का संचालन असंभव है। धर्म ही वह मार्ग है जो जीव को सत्य की ओर ले जाता है। धर्म का पालन करते हुए जीव अपने कर्तव्यों का पालन कर सकता है और जीवन में संतुलन और समृद्धि पा सकता है। उन्होंने बताया कि धर्म के दस प्रमुख अंग हैं: सत्य, अहिंसा, तप, शौच, इंद्रियनिग्रह, दान, दया, क्षमा, आत्मसंयम, और वैराग्य।

3. भगवान की भक्ति

भगवान विष्णु ने ब्रह्मा जी को बताया कि भक्ति ही मोक्ष का मार्ग है। उन्होंने समझाया कि सृष्टि के समस्त जीव उनके ही अंश हैं और उन्हें भगवान की भक्ति में लीन रहना चाहिए। भक्ति के माध्यम से जीव भगवान के समीप पहुँच सकते हैं और जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त हो सकते हैं।

4. कर्म और उसका फल

भगवान विष्णु ने ब्रह्मा जी को कर्म सिद्धांत के बारे में विस्तार से बताया। उन्होंने कहा कि हर जीव अपने कर्मों के अनुसार ही फल पाता है। अच्छा कर्म अच्छे फल देता है और बुरा कर्म बुरे फल की ओर ले जाता है। यह सृष्टि का अटल नियम है। उन्होंने यह भी कहा कि कर्म करते समय फल की चिंता नहीं करनी चाहिए, बल्कि निःस्वार्थ भाव से अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए।

5. माया का प्रभाव

भगवान विष्णु ने ब्रह्मा जी को माया के प्रभाव के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि माया के कारण जीव आत्मा से भिन्न होकर संसार के भौतिक सुखों में लिप्त हो जाता है। माया ही जीव को असत्य में उलझाए रखती है और उसे ईश्वर की भक्ति और सच्चे ज्ञान से दूर करती है। माया से मुक्ति पाने के लिए ज्ञान और भक्ति का सहारा लेना चाहिए।

6. सदाचार और साधना

भगवान विष्णु ने कहा कि सदाचार और साधना ही आत्मा की शुद्धि का मार्ग है। उन्होंने ब्रह्मा जी को यह भी कहा कि आत्मज्ञान प्राप्त करने के लिए साधना अत्यंत आवश्यक है। सदाचार, यम-नियम, ध्यान और तप से मनुष्य अपने अंतःकरण को शुद्ध कर सकता है और भगवान की कृपा प्राप्त कर सकता है।

7. सृष्टि की नियति

भगवान विष्णु ने ब्रह्मा जी को सृष्टि की अनिवार्यता और अनंतता के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि सृष्टि का निर्माण, पालन और संहार अनिवार्य प्रक्रियाएं हैं जो उनके ही संकल्प से संचालित होती हैं। इस चक्र को कोई भी नहीं रोक सकता। यह सृष्टि एक दिन समाप्त होगी और फिर से नई सृष्टि का आरंभ होगा।

उपदेश का उद्देश्य

भगवान विष्णु के इस उपदेश का उद्देश्य ब्रह्मा जी को सृष्टि रचना के कार्य में प्रेरित करना और उन्हें सृष्टि के संचालन में धर्म और नैतिकता की स्थापना के लिए मार्गदर्शन देना था। इसके अलावा, इस उपदेश का उद्देश्य समस्त जीवों को जीवन के सही मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करना था ताकि वे अपने जीवन को सार्थक बना सकें और मोक्ष प्राप्त कर सकें।

1. सृष्टि संचालन में धर्म की स्थापना

भगवान विष्णु का उपदेश ब्रह्मा जी को सृष्टि संचालन में धर्म की स्थापना के लिए था। उन्होंने बताया कि धर्म ही सृष्टि को संतुलित और सुव्यवस्थित रखता है। धर्म के बिना सृष्टि में अराजकता और अशांति फैल जाएगी। इसलिए ब्रह्मा जी को यह निर्देश दिया गया कि वे सृष्टि में धर्म की स्थापना करें।

2. जीवन के पथ की दिशा

यह उपदेश मनुष्यों को जीवन के सही पथ पर चलने के लिए दिशा प्रदान करता है। इसमें यह बताया गया है कि कैसे मनुष्य अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए धर्म, कर्म और भक्ति के माध्यम से अपने जीवन को सार्थक बना सकते हैं और मोक्ष प्राप्त कर सकते हैं।

3. भक्ति और ज्ञान का महत्व

भगवान विष्णु ने इस उपदेश के माध्यम से भक्ति और ज्ञान के महत्व को भी उजागर किया। उन्होंने बताया कि भक्ति और ज्ञान ही मोक्ष का मार्ग है। भक्ति के बिना जीव माया के बंधनों में फंसा रहता है और ज्ञान के बिना उसे सच्चे मार्ग का पता नहीं चलता।

4. माया से मुक्ति

इस उपदेश का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य माया के प्रभाव से जीवों को मुक्त करना था। भगवान विष्णु ने बताया कि माया के बंधनों से मुक्त होकर ही जीव अपने सच्चे स्वरूप को पहचान सकते हैं और भगवान की भक्ति में लीन होकर मोक्ष प्राप्त कर सकते हैं।

निष्कर्ष

भगवान विष्णु का ब्रह्मा जी को दिया गया यह उपदेश न केवल सृष्टि के निर्माण के समय के लिए था, बल्कि यह समस्त मानव जाति के लिए एक मार्गदर्शक है। यह उपदेश जीवन के उन मूलभूत सिद्धांतों को उजागर करता है जो आत्मा की शुद्धि और मोक्ष की प्राप्ति के लिए आवश्यक हैं। धर्म, कर्म, भक्ति, ज्ञान और माया से मुक्ति के मार्ग को स्पष्ट करते हुए यह उपदेश जीवों को उनके कर्तव्यों के प्रति जागरूक करता है और उन्हें जीवन के सही पथ पर चलने के लिए प्रेरित करता है। इस उपदेश का पालन करके जीव अपने जीवन को सार्थक बना सकते हैं और ईश्वर की कृपा प्राप्त कर सकते हैं।