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श्री कृष्ण लीला: सुदामा मिलन और सच्चे प्रेम की कथा (Krishna Sudama Milan Story in Hindi) द्वापर युग में जब नटखट यशोदा नंदन (Yashoda Nandan) संदीपनि आश्रम से शिक्षा पूर्ण कर किशोरावस्था के उस पड़ाव पर थे जहाँ वे ब्रज और मथुरा की लीलाओं के बाद द्वारकाधीश (Dwarkadhish) बनने जा रहे थे, तब उनकी जीवन गाथा की सबसे भावपूर्ण घटना घटी। गरीब ब्राह्मण सुदामा की व्याकुलता उज्जैन के आश्रम में लीलाधर श्री कृष्ण (Leeladhar Shri Krishna) और सुदामा परम मित्र थे। वर्षों बाद जहाँ श्री कृष्ण (Shri Krishna) द्वारका के राजा बन चुके थे, वहीं सुदामा घोर दरिद्रता का जीवन व्यतीत कर रहे थे। सुदामा की पत्नी सुशीला ने अत्यंत संकोच के साथ उनसे कहा, "हे स्वामी! आपके मित्र तो स्वयं बांके बिहारी (Bankey Bihari) और त्रिभुवन के स्वामी हैं। आप एक बार द्वारका जाकर उनसे भेंट क्यों नहीं करते?" पत्नी के आग्रह पर सुदामा द्वारका जाने के लिए तैयार हो गए। परंतु अपने प्रिय मित्र नंदलाल (Nandlal) के लिए भेंट में ले जाने हेतु घर में केवल चार मुट्ठी भुने हुए कच्चे चावल (चावल के पोहे) ही थे, जिन्हें एक फटे कपड़े में बाँधकर सुदामा नंगे पैर द्वारका की ओर निकल पड़े। द्वारकाधीश का मित्र प्रेम जब सुदामा द्वारका पहुँचे, तो राजमहल के द्वारपालों ने उनके जीर्ण-शीर्ण वस्त्र देखकर उन्हें रोक दिया। जब सुदामा ने कहा कि वे कृष्ण भगवान (Krishna Bhagwan) के बाल-सखा हैं, तो द्वारपाल ने जाकर प्रभु को संदेश दिया। "सुदामा आए हैं" सुनते ही माखनचोर (Makhan Chor) बिना पादुका पहने ही राजसिंहासन से उठे और नंगे पाँव दौड़ते हुए राजद्वार पर पहुँचे। भगवान श्री कृष्ण (Bhagwan Shri Krishna) ने अपने दरिद्र मित्र को गले से लगा लिया। यह दृश्य देखकर संपूर्ण द्वारकापुरी स्तब्ध रह गई। आँसुओं से धोए चरण प्रभु अपने मित्र को आदरपूर्वक अपने महल में ले गए और उन्हें अपने सोने के सिंहासन पर बिठाया। जब लड्डू गोपाल (Laddoo Gopal) ने मित्र के काँटों भरे फटे पैर देखे, तो उनका हृदय द्रवित हो उठा। उन्होंने चरण धोने के लिए लाया गया जल-प्रांत भी नहीं छुआ और अपने नेत्रों से बहती अश्रु-धारा (आँसुओं) से ही सुदामा के चरण पखार दिए। दो मुट्ठी चावल और तीनों लोकों का दान सुदामा लज्जावश अपनी चावल की पोटली छिपा रहे थे, परंतु सर्वज्ञ लीलाधर (Leeladhar) ने मुस्कुराते हुए वह पोटली छीन ली। प्रभु ने बड़े प्रेम से एक मुट्ठी चावल खाया और सुदामा को एक लोक का वैभव दे दिया। जैसे ही उन्होंने दूसरी मुट्ठी चावल खाई, सुदामा को दूसरे लोक की संपत्ति सौंप दी। जब प्रभु तीसरी मुट्ठी खाने लगे, तो रुक्मिणी जी ने उनका हाथ थाम लिया। बिना कुछ माँगे जब सुदामा अपने गाँव लौटे, तो उन्होंने देखा कि उनकी टूटी झोपड़ी की जगह एक विशाल स्वर्ण महल खड़ा है और उनका परिवार राजसी वस्त्रों में है। सुदामा प्रभु के निष्काम प्रेम को याद कर भाव-विभोर हो गए। यह कृष्ण सुदामा मिलन की कहानी (Krishna Sudama Story in Hindi) सिखाती है कि ईश्वर की दृष्टि में कोई अमीर या गरीब नहीं होता, वे केवल निष्छल प्रेम और भक्ति के भूखे हैं। Shri Krishna Leela in Hindi / श्री कृष्ण लीला Krishna Sudama Milan Story in Hindi / कृष्ण सुदामा मिलन की कहानी Bhagwan Shri Krishna Ki Story / भगवान श्री कृष्ण की कहानी Dwarkadhish & Bankey Bihari / द्वारकाधीश और बांके बिहारी Laddoo Gopal & Yashoda Nandan / लड्डू गोपाल और यशोदा नंदन Jai Shree Krishna & Makhan Chor / जय श्री कृष्णा और माखनचोर- Shri Krishna
